
बहुजन समाज पार्टी की रणनीति को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता जा रहा है. पहले चरण की वोटिंग तक बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने ऐसी फिजा बनाई कि लोग यह कहने के लिए मजबूर हो गए कि उन्होंने बीजेपी उम्मीदवारों को धूल चटा देने की रणनीति बनाई है. पर तीसरा चरण आते-आते जो तस्वीर बन कर उभर रही है उससे लगता है कि उन्होंने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों की भी जड़ खोदने की पूरी तैयारी कर ली है. सोमवार को खबर आई है कि बीएसपी ने जौनपुर से अपनी प्रत्याशी श्रीकला रेड्डी को ड्रॉप कर दिया है. श्रीकला रेड्डी की जगह बीएसपी का टिकट निवर्तमान सांसद श्याम सिंह यादव को ही एक बार फिर से दे दिया गया है. श्रीकला रेड्डी बाहुबली नेता धनंजय सिंह की पत्नी हैं. हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि धनंजय सिंह खुद ही चुनाव लड़ने से पीछे हट गए. हो सकता है कि यह बात सही हो. पर चूंकि बीएसपी ने और भी कई जगहों से अपने प्रत्याशियों को बदला है इसलिए बीएसपी पर सवाल तो उठेंगे ही. धनंजय सिंह की पत्नी का टिकट कटने से बीजेपी ही नहीं समाजवादी पार्टी को भी फायदा हो सकता है. इसलिए यह कहना बहुत मुश्किल है बीएसपी सुप्रीमो मायावती किसे टार्गेट कर ही हैं और किसके साथ फ्रेंडली मैच खेलना चाहती हैं.
पहले बीजेपी को किया परेशान
कुछ महीनों पहले तक बीएसपी को बीजेपी की बी टीम कहकर टारगेट किया जाता रहा है. पर बीएसपी ने इस बार के लोकसभा चुनावों में ऐसा गेम खेला कि बीजेपी को छठी का दूध याद आ गया. बीएसपी ने ऐसे उम्मीदवार खड़े किए कि बीजेपी के उम्मीदवारों के लिए मुश्किल खड़ी हो गई है. वेस्ट यूपी की कम से कम एक दर्जन सीटों पर बीएसपी के उ्म्मीदवार बीजेपी के कोर वोटर्स हैं. वेस्ट यूपी में सहारनपुर, अमरोहा और कन्नौज को छोड़कर बीएसपी ने कहीं से भी ऐसे उम्मीदवार नहीं खड़े किए हैं जो बीजेपी को फायदा पहुंचा सके. मेरठ , बिजनौर, गौतमबुद्धनगर, गाजियाबाद, कैराना , मुजफ्फरनगर, बागपत आदि में बीएसपी ने ऐसे कैंडिडेट तय किए हैं जिससे केवल बीजेपी को नुकसान हुआ. इसी तरह पूर्वी यूपी में भी घोसी , चंदौली, बस्ती और आजमगढ़ में ऐसे कैंडिडेट खड़े किए जिससे बीजेपी को पसीने आ गए. हालांकि बाद में आजमगढ़ का प्रत्याशी बदल दिया गया. जिससे संदेह बीएसपी पर संदेह होना स्वभाविक हो गया.
23 टिकट मुस्लिम समुदाय को देकर इंडिया गठबंधन को मुश्किल में डाला
ऐसे समय में जब समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम कैंडिडेट से दूरी बनाई है, बीएसपी ने दूसरा चरण बीतते मुस्लिम उम्मीदवारों को झड़ी लगा दी. बसपा ने अब तक घोषित उम्मीदवारों में से महिला उम्मीदवारों सहित मुस्लिम समुदाय से 23 उम्मीदवारों को टिकट दिया है. इस चुनाव में यूपी में किसी भी प्रमुख दावेदार द्वारा मैदान में उतारे गए मुस्लिम उम्मीदवारों की यह अब तक की सबसे अधिक संख्या है.
बहुजन समाज पार्टी ने अखिलेश यादव के निर्वाचन क्षेत्र कन्नौज के अलावा,बदायूं, आजमगढ़ और फिरोजाबाद से मुस्लिम कैंडिडेट उतारा है .जाहिर है कि ये चारों सीटें मुलायम सिंह यादव की फैमिली की खास सीटें हैं. जहां से अखिलेश यादव को जीत मिलती रही है. इसके ठीक विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के खिलाफ भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारा है. जाहिर है कि इन लोगों को आंशिक ही सही बीएसपी के इस फैसले से मदद तो मिलेगी ही. बदायूं में, जहां अखिलेश के चचेरे भाई और शिवपाल सिंह यादव के बेटे आदित्य यादव मैदान में हैं, बसपा ने मुस्लिम खान को मैदान में उतारा है.फिरोजाबाद में बसपा ने पहले उतारे गए अपने उम्मीदवार सत्येन्द्र जैन की जगह चौधरी बशीर को उम्मीदवार बनाया है. वरिष्ठ सपा नेता और अखिलेश के चाचा रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय इस सीट से पार्टी के उम्मीदवार हैं. कन्नौज से बसपा ने इमरान बिन जफर को अपना उम्मीदवार बनाया है. मुस्लिम बहुल आज़मगढ़ निर्वाचन क्षेत्र में, बसपा ने हाल ही में अपने उम्मीदवार भीम राजभर, पूर्व राज्य पार्टी अध्यक्ष, की जगह पसमांदा (पिछड़ी) मुस्लिम महिला सबीहा अंसारी को मैदान में उतारा है.वर्तमान में भाजपा के कब्जे वाले समाजवादी पार्टी (सपा) के इस गढ़ में, सपा ने पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव को मैदान में उतारा है.
भारत गठबंधन के हिस्से के रूप में चुनाव लड़ते हुए, सपा और कांग्रेस यूपी में क्रमशः 62 सीटों और 17 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं. सपा ने अब तक अपने 60 उम्मीदवारों में से केवल चार मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है - रामपुर, संभल, कैराना और ग़ाज़ीपुर में.
इसी तरह कांग्रेस ने अब तक जिन 17 उम्मीदवारों की घोषणा की है, उनमें से केवल दो मुस्लिम उम्मीदवार हैं - पूर्व बसपा सांसद दानिश अली उनकी अमरोहा सीट से और इमरान मसूद सहारनपुर से.
जौनपुर में धनंजय सिंह का टिकट कटने से किसे फायदा
सोमवार की सुबह खबर आती है कि बसपा ने आखिरी वक्त में पूर्व सांसद धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला सिंह का टिकट काट दिया है. अब उनकी जगह निवर्तमान बसपा सांसद श्याम सिंह यादव पार्टी के उम्मीदवार होंगे. वो मंगलवार को यानि नामांकन के आखिरी दिन पर्चा दाखिल करेंगे. जौनपुर में समाजवादी पार्टी से बाबू सिंह कुशवाहा हैं. बाबू सिंह कुशवाहा कभी बीएसपी में बहुत ताकतवर होते थे. अति पिछड़ी जातियों में इनकी अच्छी पैठ है. दूसरी ओर बीजेपी से कृपाशंकर सिंह चुनावी मैदान में हैं. कृपाशंकर सिंह ने मुंबई में जीरो से शुरुआत की और पूर्वाचल के लोगों के नेता बन गए. काफी समय कांग्रेस में रहे. 2021 में बीजेपी में आ गए. ठाकुर बाहुल्य वाली जौनपुर सीट पर उनकी जाति से ठाकुर होने के चलते काफी फायदा मिलने वाला था. पर धनंजय सिंह के अपनी पत्नी को उम्मीदवार बनाने से बीजेपी को काफी नुकसान हो रहा था.
पिछले दो दशक से जौनपुर की राजनीति धनंजय सिंह के इर्द-गिर्द घूमती रही है. लोजपा से जेडीयू होते हुए बसपा से सांसद बनना और फिर सांसद रहते अपने पिता को विधायक बनवा देना धनंजय सिंह के लिए बहुत सामान्य बात होती थी. 2002 में जौनपुर की राजनीति में धनंजय सिंह की एंट्री हुई और आजतक जिले में उनकी हनक बरकरार है पर वो लगातार चुनाव हार रहे हैं. इसका मतलब ये है कि वर्तमान राजनीति में अब वो पहले जितने प्रभावी नहीं रहे है. अब वो अपहरण एवं रंगदारी मांगने के मामले में सजायाफ्ता भी हैं. पर आज भी उनके व्यक्तिगत संबंधों वाले वोट की बड़ी संख्या उनके साथ है. जौनपुर शहर में वाजिदपुर तिराहा पर रहने वाले मोहनलाल प्रजापति कहते हैं कि उनका वोट धनंजय सिंह की पत्नी को ही जाएगा. अगर उनकी पत्नी टिकट कटने के बाद चुनाव नहीं लड़ती हैं तो फिर सोचा जाएगा कि वोट किसे दिया जाए. परिवार कहता है कि धनंजय सिंह ने कभी किसी चीज के लिए कभी किसी को मना नहीं किया है. फिर चाहे वो किसी भी बिरादरी का हो. मदद करने में उन्होंने कभी बिरादरी के आधार पर भेदभाव नहीं किया.
पर कृपाशंकर की सिंह के काफी राहत वाली बात हो सकती है. क्योंकि बीएसपी का टिकट कटने के बाद कृपाशंकर को अपनी जाति के वोट मिलने की संभावना बढ़ गई है. धनंजय की पत्नी के चुनाव मैदान में आने के बाद ठाकुरों का वोट बड़े पैमाने पर बंट रहा था. हालांकि फिर भी करीब 60 से 70 हजार के करीब धनंजय सिंह के अपने वोट हैं जो उन्हें मिलेंगे ही मिलेंगे. जाहिर है वो सारे वोट बीजेपी के ही कटेंगे.