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अरविंद केजरीवाल दिल्‍ली CM की कुर्सी छोड़ते हैं तो राबड़ी मॉडल चुनेंगे या मांझी मॉडल?

केजरीवाल यह अच्छी तरह समझते हैं कि वह अगर दिल्ली में सीएम बने रहने पर अड़े रहे तो लेने के देने भी पड़ सकते हैं. क्योंकि प्रशासनिक गतिरोध पैदा होने पर उपराज्यपाल केंद्र को दिल्ली में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा भेज सकते हैं. केजरीवाल को अंत में एक सबसे विश्‍वसनीय शख्‍स को ढूंढकर अपनी खड़ाऊं सौंपनी होगी, जिसे वह सिंहासन पर रखकर सरकार चला सके.

क्या अरविंद केजरीवाल अपनी पत्नी सुनीता केजरीवाल को बनाएंगे सीएम, आतिशी और सौरभ भारद्वाज क्या अरविंद केजरीवाल अपनी पत्नी सुनीता केजरीवाल को बनाएंगे सीएम, आतिशी और सौरभ भारद्वाज
संयम श्रीवास्तव
  • नई दिल्ली,
  • 22 मार्च 2024,
  • अपडेटेड 8:49 PM IST

अरविंद केजरीवाल को PMLA कोर्ट से राहत नहीं मिल सकी है. उन्‍हें 6 दिन यानी 28 मार्च तक के लिए ईडी की रिमांड पर भेज दिया गया है. आगे भी अगर बेल नहीं मिलती है तो लंबे समय के लिए जेल जाना होगा. संविधान विशेषज्ञों की मानें तो राज्य के मुख्यमंत्री के स्वत: इस्तीफे को अनिवार्य करने वाला कोई विशिष्ट कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है. पर भविष्य में व्यवहारिक दिक्कतों को देखते हुए ही बिहार के पूर्व सीएम लालू प्रसाद यादव हों या अभी हाल ही में झारखंड के सीएम हेमंत सोरेने को रिजाइन करना पड़ा था. केजरीवाल यह अच्छी तरह समझते हैं कि वह अगर सीएम बने रहने पर अड़े रहे तो लेने के देने भी पड़ सकते हैं. क्योंकि प्रशासनिक गतिरोध पैदा होने पर उपराज्यपाल केंद्र को दिल्ली में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा भेज सकते हैं. इसलिये संभावना यही है कि अरविंद केजरीवाद बहुत जल्दी इस्तीफा देकर अपने किसी विश्‍वस्‍त व्‍यक्ति को गद्दी सौंप दें. यही उनके और उनकी पार्टी के लिए सबसे मुफीद लग रहा है. अब बात आती है कि केजरीवाल किसे सीएम बनाना पसंद करते हैं? केजरीवाल के सामने 2 मॉडल हैं. दोनों के अपने फायदे और नुकसान हैं. 

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1-मांझी मॉडल अपनाने में खतरा है

अरविंद केजरीवाल के सामने मांझी मॉडल है.बिहार में एक बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रिजाइन करके अपने सबसे खास मंत्री जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया था. नीतीश कुमार ने सोचा था कि वे उनके इशारे पर काम करेंगे. पर मांझी ने कुर्सी संभालते ही अपने तेवर बदल दिए. जल्द ही नीतीश कुमार को अपना फैसला बदलना पड़ा. और मांझी को हटाने के लिए उन्हें कड़ी मशक्कत करनी पड़ी. जाहिर है कि अरविंद केजरीवाल भी नहीं चाहेंगे कि वो अपने किसी सहयोगी को मुख्यमंत्री कुर्सी पर बैठाएं जो बाद में उनके हाथ से निकल जाए. 

शायद इसलिए वो अपने मंत्रीमंडलीय सहयोगियों आतिशी और सौरभ भारद्वाज को इतनी जल्दी सीएम बनाने के लिए राजी नहीं होने वाले हैं. जिस तरह आम आदमी पार्टी से शांति भूषण, प्रशांत भूषण, कूमार विश्वास,योगेंद्र यादव आदि जैसे दर्जनों लोगों को बाहर का रास्ता केवल इसलिए दिखाया गया ताकि कोई उनके लिए खतरा न बन सके. आम आदमी पार्टी की पुरानी घटनाओं को सोचते हुए ऐसा नहीं लगता है कि अरविंद केजरीवाल आतिशी या सौरभ जैसे अपने किसी तेज तर्रार मंत्रमंडलीय सहयोगी को सीएम का ताज सौंपने वाले हैं. वैसे भी देश का इतिहास रहा है कि जीतन राम मांझी, पनीर सेल्वम, रामप्रकाश गुप्ता, मनमोहन सिंह जैसे लोगों को गद्दी सौंपी जाती है जिनसे टॉप लीडरशिप को कोई खतरा न पैदा हो. 

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हालांकि मांझी मॉडल का इस्तेमाल अभी हाल ही में भ्रष्टाचार के ही आरोप में रिजाइन करने वाले झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने मजबूरी में किया है. हेमंत  सोरेने चाहते थे कि उनके बाद उनकी पत्नी कल्पना सोरेन झारखंड की बागडोर संभाले. पर परिवार में सत्ता के कई केंद्र होने के चलते उनके इस फैसले पर मुहर नहीं लग सकी. दरअसल उनकी भाभी सीता सोरेन और छोटे भाई बसंत सोरेन भी अपने को सीएम पद का दावेदार मान रहे थे. हेमंत जानते थे कि भाभी या भाई को सीएम बना देने के बाद पार्टी में उनका नंबर हमेशा के लिए काट दिया जाएगा. इसलिए उन्हें अपने सबसे विश्वस्त सहयोगी चंपई सोरेन को सीएम बहुत मजबूरी में बनाना पड़ा. लेकिन अरविंद केजरीवाल के साथ ऐसी मुसीबत नहीं है. आम आदमी पार्टी में वे सर्वे सर्वा हैं. उन्होंने पार्टी में खुद को वन मैन शो बना रखा है. इसलिए अगर वो सुनीता केजरीवाल का नाम पेश करते हैं तो कोई विरोध नहीं होने वाला है. पर ऐसा करना नहीं चाहेंगे.

2- राबड़ी मॉडल क्यों है मजबूरी

दूसरा तरीका है कि अरविंद केजरीवाल बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के रस्ते पर चलें. जब 1997 में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते लालू यादव को बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफी देना पड़ा . लालू यादव ने अपने किसी सहयोगी के नाम को आगे बढ़ाने की बजाए अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया था.राबड़ी देवी के मुकाबले अरविंद केजरीवाल की पत्नी बहुत योग्य भी हैं. सुनीता केजरीवाल आईआरएस रही हैं. कई बड़े प्रशासनिक पदों को सुशोभित कर चुकी हैं. 

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लेकिन अरविंद केजरीवाल के लिए अपनी पत्नी को सत्ता सौंपना भी कम मुश्किल नहीं है. अरविंद केजरीवाल अगर अपनी पत्नी को सत्ता सौंपते हैं तो उन पर बीजेपी परिवारवाद का आरोप लगाएगी. अरविंद खुद नहीं चाहेंगे कि उनकी पार्टी में उन पर यह आरोप लगे. जिस  तरह वो अपनी पार्टी को आम आदमी की पार्टी कहते रहे हैं उस छवि पर यह बट्टा लगने का समान होगा. इसके साथ ही अरविंद केजरीवाल यह कभी नहीं चाहेंगे कि उनकी पत्नी भी कानूनी पचड़ों में फंसे. हालांकि जिस तरह अरविंद केजरीवाल शुरूआती दौर के अपने किए कई बातों से पलट गए और फिर भी जनता के चहेते बने रहे उसे देखकर ऐसा नहीं लगता कि पत्नी सुनीता केजरीवाल के सीएम बनाने से उनकी लोकप्रियता पर कोई आंच आने वाली है. अभी तक परिस्थितियों के हिसाब से केजरीवाल के लिए सबसे मुफीद यही है कि जल्दी से जल्दी वो अपनी पत्नी सुनीता केजरीवाल की ताजपोशी करा दें.

क्योंकि भविष्य में उन्हें अपने ऊपर लगे आरोपों से छुटकारा पाने, पार्टी के विस्तार, दिल्ली और पंजाब में शक्ति को अपने हाथ में बनाए रखने के लिए एक योग्य और विश्वसनीय सीएम की जरूरत होगी. अगर पार्टी के किसी योग्य नेता को सीएम पद सौंपते हैं तो उसके भविष्य में बदल जाने की आशंका बनी रहेगी. इसके उलट अगर वो किसी महत्वहीन शख्स को सीएम बनाते हैं तो जाहिर है कि वो उनके ऊपर लगे आरोपों से पाक साफ बचाने में मददगार साबित नहीं होगा.

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3-क्यों जरूरी है केजरीवाल के लिए जल्दी उत्तराधिकारी चुनना

कानून के जानकारों का कहना है कि कानून के मुताबिक, दोषी ठहराए जाने तक अरविंद केजरीवाल दिल्ली के सीएम पद से इस्तीफा देने के लिए बाध्य नहीं हैं. पर राज्यपाल के पास ये पावर होती है कि वह कानून और संविधान के हिसाब से राज्य सरकार न चलने का हवाला देकर सीएम को बर्खास्त कर सके. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दिल्ली के उपराज्यपाल विनय सक्सेना के बीच किस तरह के संबंध हैं ये जगजाहिर है.

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 सीएम को अयोग्य मानने की रूपरेखा देता है, लेकिन पद से हटाने के लिए दोषसिद्धि आवश्यक है. यानी यह साबित करना होगा कि वो दोषी हैं.  दिल्ली एक केंद्रशासित प्रदेश है और ऐसे में उपराज्यपाल विनय सक्सेना की भूमिका काफी अहम हो जाती है. कानून में एलजी को यह अधिकार है कि वह संवैधानिक मशीनरी टूटने या संवैधानिक तंत्र की विफलता का हवाला देकर राष्ट्रपति से राज्य में राष्ट्रपति शासन/राज्यपाल शासन की सिफारिश कर सकते हैं. रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल एक्ट, 1951 के सेक्शन 239 AB में एलजी को यह अधिकार दिया गया है. 

एलजी दिल्ली के शासन से को लेकर अनुच्छेद 239 एए के तहत सरकार को निलंबित करने के लिए राष्ट्रपति को लिख सकते हैं. उपराज्यपाल अनुच्छेद 239एबी के तहत राष्ट्रपति शासन के लिए ‘संवैधानिक मशीनरी की विफलता’ को उचित ठहरा सकते हैं. जिसके बाद अरविंद केजरीवाल को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.इसके बाद दिल्ली पर केंद्र सरकार का नियंत्रण हो जाएगा.

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संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने या इसमें किसी तरह का व्यवधान पैदा होने पर राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है. दो बातों को इसके लिए आधार बनाया जा सकता है. पहला, जब सरकार संविधान के मुताबिक न चल पा रही हो दूसरे जब राज्य सरकार केंद्र सरकार के निर्देशों को लागू करने में विफल रहती है.

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