
भारतीय जनता पार्टी में संवैधानिक पदों पर जितनी भी नियुक्तियां होती हैं उनके पीछे दूर की दृष्टि होती है. बिना किसी प्रायोजन के भारतीय जनता पार्टी में पिछले कुछ सालों से कोई फैसला नहीं होता है, चाहे पार्टी को इसके लिए कोई कुर्बानी ही क्यों न देनी पड़े. हालांकि चीफ मिनिस्टर की नियुक्ति का पहले भी कोई न कोई आधार ही रहता था. कांग्रेस के समय की बात हो या अब बीजेपी के समय की बात हो, सीएम के चुनाव में जाति महत्वपूर्ण हुआ करता रहा है . पर भारतीय जनता पार्टी में आज की तारीख में सीएम चुनते वक्त जाति के अलावा और कई मानदंडों का ध्यान रखा जाता है. विशेषकर दिल्ली राजधानी है और यहां विपक्ष में अरविंद केजरीवाल जैसा दमदार व्यक्ति है, इसलिए यहां के सीएम का चुनाव और भी महत्वपूर्ण हो जाता है. आइये देखते हैं कि दिल्ली सीएम का चुनाव करते हुए भारतीय जनता पार्टी किन मानदंडों को परख रही है?
1-जाति-समुदाय दिल्ली में भी सबसे महत्वपूर्ण
दिल्ली में भी सीएम का चुनाव हों या पार्टी को विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों के लिए प्रत्याशी ढूढने की बात हो कोई भी पार्टी फैसले करते समय जातियों को जरूर ध्यान रखती है. हालांकि एक बात यह भी सत्य है कि अन्य राज्यों की तुलना में दिल्ली में कम से कम जाति को लेकर राजनीति कम हुई है. इंडियन एक्सप्रेस अपने सूत्रों के आधार पर लिखता है कि बीजेपी मुख्यमंत्री के अलावा उपमुख्यमंत्री, दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष और मंत्री परिषद की संरचना शामिल कम से कम सात सदस्यों की नियुक्ति में जातियों को बैलेंस कर सकती है. उदाहरण के लिए, ब्राह्मण मतदाताओं ने भाजपा की जीत में योगदान दिया है, इसलिए इस समुदाय को निश्चित रूप से किसी महत्वपूर्ण पद पर समायोजित किया जाएगा. यही स्थिति जाट और पंजाबी मतदाताओं के साथ भी है, इसलिए मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री इन समुदायों से हो सकते हैं.
एक्सप्रेस के अनुसार प्रवेश साहिब सिंह (जाट), जिन्होंने नई दिल्ली से आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल को हराया, विजेंद्र गुप्ता (बनिया), पवन शर्मा (ब्राह्मण), पूर्व कांग्रेसी मंत्री अरविंदर सिंह लवली ( सिख), गांधी नगर; राज कुमार चौहान (दलित), जो कांग्रेस सरकार में मंत्री रह चुके हैं, मंगोलपुरी; रेखा गुप्ता (बनिया), शालीमार बाग; शिखा रॉय जिन्होंने ग्रेटर कैलाश में सौरभ भारद्वाज को हराकर उलट फेर किया; हरीश खुराना (पंजाबी खत्री), अजय महावर (बनिया), जितेंद्र महाजन (बनिया) और सतीश उपाध्याय (ब्राह्मण), जिन्होंने मालवीय नगर में सोमनाथ भारती को हराया को कुछ न कुछ पद मिलने की संभावना है.
2-आरएसएस की कृपा
दिल्ली विधानसभा चुनावों में आरएसएस ने बहुत मेहनत की है. बताया जा रहा है कि करीब 50 हजार ड्राइंग रूम मीटिंगों के जरिए आरएसएस ने माहौल को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. दलितों के वोट के लिए संघ कार्यकर्ताओं ने जी तोड़ मेहनत की है. एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार आरएसएस और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के बीच अगले कुछ दिनों में आगे की रणनीति तय करने के लिए मीटिंग होने की संभावना है.
आरएसएस, जिसकी भूमिका मुख्यमंत्री के चयन में केवल एडवाइजरी के तौर पर सीमित होती है. पर संघ कई कारकों के आधार पर सुझाव देगा, जिसमें किसी विशेष जाति या समुदाय के मतदाताओं द्वारा भाजपा को दिए गए समर्थन को भी ध्यान में रखा जाएगा. एक बीजेपी नेता के अनुसार आरएसएस चाहता है कि करीब 55 वर्ष आयु वाले स्वच्छ छवि का नेता जिसके पास संगठनात्मक अनुभव भी हो उसे सीएम बनाया जाए. इसके साथ ही सरकार या विधानसभा में किसी महत्वपूर्ण पद के लिए कम से कम एक महिला नेता को चुना जाना तय है.
इस तरह देखा जाए तो प्रवेश वर्मा कई मानदंडों पर खरे उतरते हैं. वर्मा भी संघ के कार्यकर्ता रह चुके हैं. वहीं पवन शर्मा भी एक प्रमुख दावेदार हैं. न केवल वे आरएसएस के करीबी हैं और दिल्ली भाजपा में संगठन महासचिव के रूप में सेवा कर चुके हैं, बल्कि वे दिल्ली भाजपा के पुराने नेतृत्व के साथ भी घनिष्ठ संबंध रखते हैं.
3-वो जो यूपी और हरियाणा और राजस्थान को साधने में सक्षम
दिल्ली का सीएम जो भी बनेगा उससे उम्मीद की जा रही है कि वो हरियाणा , पश्चिमी यूपी और राजस्थान में भी प्रभावी हो. इस आधार पर देखा जाए तो राजस्थान में ब्राह्मण मुख्यमंत्री, यूपी में ठाकुर और हरियाणा में ओबीसी है. इसलिए कम से कम ब्राह्मण और ठाकुर तो बनने से रहे. महाराष्ट्र में भी अभी कुछ दिन पहले ही देवेंद्र फडणवीस के रूप में एक और ब्राह्मण को ताज मिला है इसलिए इतना तो तय है कि दिल्ली में कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बनने जा रहा है.
एक्सप्रेस एक बीजेपी नेता के हवाले से लिखता है कि एक जाट नेता दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में उभर सकता है क्योंकि आम तौर पर यह धारणा बन चुकी है जाट समुदाय भाजपा से नाराज हैं. जाट समझते हैं कि बीजेपी में अब उनके लिए जगह नहीं रह गई है. इस धारणा को तोड़ने के लिए बीजेपी दिल्ली में किसी जाट नेता को मुख्यमंत्री बना सकती है. अगर ऐसा होता है तो प्रवेश वर्मा की लॉटरी लग सकती है.
4-तेजतर्रार नेता, लो प्रोफाइल रहकर काम करने में सक्षम
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की दुर्गति के पीछे प्रशासनिक अक्षमता भी रही है. दिल्ली में सुशासन को पटरी पर लाने के लिए किसी तेजतर्रार सीएम की जरूरत होगी. जो पार्टी की नीतियों को हंड्रेड परसेंट एग्जिक्यूट कर सके. भाजपा की सुशासन पर जोर देने की नीति के चलते अरविंदर सिंह लवली और राजकुमार चौहान जैसे नेताओं को, जो कांग्रेस सरकार में मंत्री रह चुके हैं, साथ ही दशकों का नगरपालिका और विधायी अनुभव रखने वाले विजेंद्र गुप्ता को भी दावेदार बनती है. ठीक उसी तरह जैसे रेखा गुप्ता और शिखा रॉय जैसों का नाम भी आगे आ रहा है. दरअसल इन नामों में बहुत से लोगों को बहुत से पदों के लिए एडजेस्ट किया जा सकता है.