
उत्तराखंड में यूनिफॉर्म सिविल कोड कानून बनने की राह पर है.कानून का ड्रॉफ्ट तैयार हो गया जिसे रविवार शाम उत्तराखंड कैबिनेट से मंजूरी भी मिल गई. संभवना है कि 6 फरवरी को विधानसभा में इसे पेश किया जा सकता है.इस बीच खबर आ रही है कि देहरादून के काजी ने उत्तराखंड सरकार को यूसीसी लागू करने पर अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी है. दूसरी ओर उत्तराखंड कांग्रेस के बड़े नेताओं ने भी यूसीसी लागू करने के लिए राज्य सरकार की तीखी आलोचना की है. सवाल यह उठता है कि यूसीसी का विरोध केवल बीजेपी का विरोध करने से क्या आम जनता के मन में बीजेपी के लिए नफरत पैदा हो सकेगी? इस कानून का विरोध किसी खास धर्म के अधिकारों में कटौती करने के चलते नहीं होना चाहिए. उत्तराखंड का यूसीसी कानून बहुत से सुधार लेकर आ रहा है जो हर जाति-धर्म के लोगों के फायेदमंद साबित होने वाला है.यह तय है जिस तरह राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में जाने का विरोध करके विपक्ष बुरी तरह फंस गया उसी तरह यूसीसी का विरोध करके विपक्ष खुद बीजेपी की रणनीति में ट्रैप होने वाला है.
राम मंदिर उद्घाटन के मौके को आम आदमी पार्टी ने जिस तरह डील किया है उसी पूरे विपक्ष को सीख लेनी चाहिए. आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल देश के पीएम के सबसे बड़े विरोधी की छवि बरकरार रखते हुए भी राम मंदिर मुद्दे पर सकारात्म रुख अपनाया. खुद अयोध्या नहीं गए पर विरोध के नाम पर ऐसे तीर भी नहीं चलाए कि किसी हिंदू की भावना उनके खिलाफ उद्वेलित हो. यूसीसी के मुद्दे पर विपक्ष को अरविंद केजरीवाल की ही राह पकड़नी चाहिए तभी वो जनता के बीच बीजेपी से मुकाबला करने का माद्दा पैदा कर सकेंगे.यूसीसी के नाम पर जिस तरह उत्तराखंड सरकार को धमकी दी जा रही है या जिस तरह आंख मूंदकर इस कानून का विरोध किया जा रहा है उससे उत्तराखंड की जनता उल्टे विपक्ष को ही टार्गेट पर ले सकती है.
UCC के नाम पर देहरादून के शहर काजी की सरकार को चेतावनी, बीजेपी की रणनीति है विपक्ष को ट्रैप करना
उत्तराखंड में यूनिफॉर्म सिविल कोड पर राजनीति शुरू हो गई है. शायद बीजेपी भी यही चाहती है कि यूसीसी का जमकर विरोध हो . क्योंकि अगर विरोध नहीं हुआ तो बीजेपी को इस कानून के लाने का जो मकसद था वो पूरा नहीं होगा. बीजेपी चाहती है कि जब विरोध होगा तो कानून पर बहस होगी. इसके बाद बीजेपी आम लोगों के बीच कहेगी क्या किसी पुरुष को चार शादी करने अधिकार मिलना जरूरी है. बहुत से लोग यह कहते हुए मिल जाएंगे कि आखिर कितने लोग 4 शादियां करते हैं? पर यह कोई नहीं बताता कि मर्दों को 4 शादियां करने के अधिकार के चलते स्त्रियां किस ट्रॉमा में जीती हैं. उन्हें आजीवन यह डर सताता है कि अगर उनका पति दूसरी शादी कर लेता है तो उनका क्या होगा. उन्हें तो भरण पोषण मांगने का भी अधिकार नहीं है. देहरादून शहर काजी का यह कहना कि सरकार भले ही यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू कर ले,पर इसके परिणाम की जिम्मेदारी भी सरकार की होगी.माना जा रहा है कि इस प्रकार के बयान के जरिए मुद्दे को भड़काने की कोशिश की गई है. जिससे सीधे-सीधे फायदा बीजेपी को ही होने वाला है.
कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि सीएम धामी की सरकार ध्रुवीकरण करना चाहती है. लोकसभा चुनाव को लेकर इस प्रकार की योजना पर काम किया जा रहा है.पूर्व सीएम और सीनियर कांग्रेस नेता हरीश रावत ने कहा है कि सरकार ने कानून बनाने की शक्तियों का दुरुपयोग किया है. उन्होंने कहा कि केंद्र ने यूनिफॉर्म सिविल कोड के मसले पर राज्य सरकार को मोहरा बनाया है. उन्होंने मांग की, यूनिफॉर्म सिविल कोड पर केंद्र सरकार कानून बनाए. सवाल यह उठता है कि कांग्रेस नेता समझते हैं कि बीजेपी इस मुद्दे पर आम लोगों का ध्रुवीकरण करना चाहती है . भाई जब यह बात समझ रहे हो तो फिर विरोध करके मुद्दे को क्यों हवा दे रहे हो?
महिलाओं और बुजुर्ग माता-पिता को मिलने वाले अधिकारों से सबको फायदा
उत्तराखंड में समान नागरिक कानून में ऐसे उपबंध किए गए हैं जिनका फायदा किसी खास जाति या धर्म से नहीं है. यह सबके लिए फायदेमंद होगा. विशेषकर बुजुर्ग माता-पिता के भरण पोषण वाले कानून और बच्चों की जिम्मेदारी जैसे उपबंधों की तारीफ होनी चाहिए. संहिता लागू होने के बाद महिलाओं के अधिकार पुरुषों के बराबर हो जाएंगे. प्रदेश में बहु विवाह पर रोक लगेगी. इसके अलावा संपत्ति में अधिकार पर लड़के और लड़कियों का पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार मिलेगा. मुस्लिम महिलाओं को अब तक गोद लेने का अधिकार नहीं था. पति और पत्नी दोनों को तलाक की प्रक्रियाओं को लेकर समान अधिकार मिलेंगे.कोई भी नेता इन सुधारों का विरोध किस आधार पर कर सकता है? इन सुधारों का असर केवल मुसलमानों पर ही नहीं पड़ने वाला है. कई ऐसा उपबंध हैं जिसके हिंदुओं के लिए भी उतना ही पीड़ादायी होंगे. जैसे अवैध संतानों को भी संपत्ति में अधिकार का मिलने जा रहा है. लिव इन रिलेशनशिप में रहने के लिए रजिस्ट्रेशन को जरूरी हो जाए तो इसमें हिंदू-मुसलमान कहां है?
बताया जा रहा है कि यूसीसी में नौकरीपेशा बेटे की मृत्यु की स्थिति में बुजुर्ग माता- पिता के भरण- पोषण की जिम्मेदारी पत्नी पर दिए जाने का प्रावधान किया जा सकता है. पत्नी को मुआवजा मिलेगा. वहीं, पति की मृत्यु की स्थिति में अगर पत्नी दुबारा शादी करती है तो उसे मिला हुआ मुआवजा माता-पिता को दिया जाएगा. पत्नी की मृत्यु होने की स्थिति में उसके माता-पिता का सहारा नहीं रहने की स्थिति में उनकी देखरेख की जिम्मेदारी पति पर होगी. अनाथ बच्चों के लिए संरक्षण की प्रक्रिया को सरल बनाने से हिंदू-मुसलमान सभी की जिंदगी आसान होने वाली है. पति- पत्नी के बीच विवाद के मामलों में बच्चों की कस्टडी उनके दादा- दादी को दिए जाने का प्रावधान दिया जा सकता है. बच्चों की संख्या निर्धारित करने जैसी व्यवस्था यूसीसी में नहीं है.इसलिए अल्पसंख्यको को डरने की जरूरत नहीं है. संभावना जताई जा रही है कि इस कानून से आदिवासियों को छूट मिल सकती है.
आम आदमी पार्टी के स्टैंड से सीख ले सकती है कांग्रेस
प्नधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता का ज़िक्र करते हुए कहा था कि एक ही परिवार में दो लोगों के अलग-अलग नियम नहीं हो सकते. ऐसी दोहरी व्यवस्था से घर कैसे चल पाएगा? इस भाषण के बाद
अलग-अलग पार्टियों ने इस मुद्दे पर अपनी राय रखी थी. तब आम आदमी पार्टी ने पार्टी ने कहा कि वो ‘सैद्धांतिक रूप से’ समान नागरिक संहिता का समर्थन करती है. आम आदमी पार्टी के नेता संदीप पाठक ने कहा था कि उनकी पार्टी सैद्धांतिक रूप से यूसीसी का समर्थन करती है, संविधान का आर्टिकल 44 भी इसका समर्थन करता है. कांग्रेस और अन्य दलों को आगामी लोकसभा चुनावों में बीजेपी का अगर मुकाबला करना है तो नीतियों और कानूनों का तार्किक विरोध करना होगा. केवल विरोध के नाम पर विरोध करने के चलते ही विपक्ष की गाड़ी चुनावों में बेपटरी हो जा रही है. जबकि आम आदमी पार्टी दिल्ली में अंगद की तरह पैर जमाए हुए है.