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मोहन भागवत ने यूं ही नहीं दी 'हम 2 हमारे 3' की सलाह, क्यों है समय की जरूरत । opinion

देश की जनसंख्या वृद्धि दर आश्चर्यजनक रूप से बहुत तेजी से कम हुई है. हमारी अर्थव्यवस्था को बूम अब तक मिला है उसके पीछे कहीं न कहीं हमारी जनसंख्या भी उसका कारण रही है. आश्चर्य यह है कि मोहन भागवत की देश की जनसंख्या बढाने वाली बात का विरोध असदुद्दीन ओवैसी , कांग्रेस और समाजवादी पार्टी क्यों कर रही है?

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत
संयम श्रीवास्तव
  • नई दिल्ली,
  • 04 दिसंबर 2024,
  • अपडेटेड 1:04 PM IST

भारत में जनसंख्या वृद्धि को हमेशा से देश के पिछड़ेपन और गरीबी का मुख्य कारण माना जाता रहा है. एक ऐसे देश में जहां बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए तमाम उपाय किए जा रहे हों, जहां अब तक हम दो हमारे 2 के नारे लगते रहे हों वहां अचानक कोई अगर यह तर्क देने लगे कि कम से कम 3 बच्चे जरूर होना चाहिए तो जाहिर है कि बहुत से लोग चौंक जाएंगे.  RSS प्रमुख मोहन भागवत ने 1 दिसम्बर को नागपुर में एक सार्वजनिक कायर्क्रम में कहा, कि जनसंख्या में गिरावट चिंता का विषय है. आधुनिक जनसंख्या शास्त्र कहता है कि जब किसी समाज की जनसंख्या का टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 से नीचे चला जाता है तो वह समाज पृथ्वी से खत्म हो जाता है, उसे कोई नहीं मारेगा. कोई संकट न होने पर भी वह समाज नष्ट हो जाता है... अनेक भाषाएं और समाज नष्ट हो गये. आश्चर्य है कि मोहन भागवत के इस बयान का विरोध असदुद्दीन ओवैसी , कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने किया है. जिन्हें हमेशा से डर रहा है कि बीजेपी सरकार जनसंख्या नियंत्रण के बहाने अल्पसंख्यकों की आबादी पर नियंत्रण लगानी चाहती है. पर भागवत की बातों को यूं ही हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए. भारत की जनसंख्या वृद्धि दर जिस तेजी से घट रही है उससे न केवल डेमोग्रेफी बल्कि समाजिक और आर्थिक समस्याएं भी सामने आने का खतरा तेजी से बढ़ रहा है. आइए समझते हैं कैसे ये हो सकता है.

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1- टीएफआर का कम होना क्यों खतरनाक है?

आरएसएस प्रमुख कहते हैं कि TFR  (टोटल फर्टिलिटी रेट ) 2.1 से नीचे नहीं जाना चाहिए, हमारे देश की जनसंख्या नीति 1998 या 2002 में तय की गई थी. लेकिन इसमें यह भी कहा गया है कि किसी समाज का TFR 2.1 से कम नहीं होना चाहिए. इस टीएफआर रेट पर तो इन्सान जन्म नही ले सकता, इसलिये हमे दो से ज्यादा तीन की जरुरत है यही जनसंख्या विज्ञान कहता है.

यदि किसी समाज का TFR 2.1 होगा तभी वह अपनी वर्तमान जनसंख्या बरकरार रख पाएगा. भारत में यह आँकड़ा 2.1 से नीचे आ चुका है. ऐसे में यह चिंता का विषय होना चाहिए. आंकड़े बताते हैं कि मुस्लिमों को छोड़ कर देश के किसी भी धर्म की महिलाओं का TFR 2.1 नहीं है. यही कारण है कि हिन्दू, सिख और जैन धर्म 2 से नीचे आ चुके हैं. और इनके खत्म हो जाने का खतरा मंडराने लगा है. वर्तमान में मुस्लिमों का ही देश में TFR 2.1 के स्तर से ऊपर 2.36 है. जापान के पूर्व प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के एक वरिष्ठ सलाहकार ने हाल ही में कहा था कि यदि जापान में जन्म दर नहीं सुधरा तो देश एक दिन गायब हो जाएगा. चीन का भी यही हाल है. चीन ने समस्या को भांपते हुए 1979 में शुरू किए गए एक बच्चा नियम पर 2016 में रोक लगा दिया था.

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2- बूढ़ा होता भारत देश की अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक है

पर पिछले तीन दशकों में जिस तरह का आर्थिक विकास और विश्व में जो सम्मान भारत को मिला है  उसमें कहीं न कहीं भारत की जनसंख्या की भी अहम भूमिका रही है. दरअसल जनसंख्या दर जब बढ़ रही होती है तो समाज में कार्य करने वाली आबादी की बहुतायत होती है. इसलिए सस्ता श्रम आसानी से उपलब्ध होता है और उद्योग धंधों के विकसित होने का भरपूर मौका मिलता है. सर्वे बताते हैं कि 2022 से 2050 के दौरान भारत की आबादी 18% बढ़ जाएगी. जबकि, बुजुर्गों की आबादी 134% बढ़ने का अनुमान है, वहीं, 80 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की आबादी 279% तक बढ़ सकती है. चिंता की बात ये है कि बुजुर्ग बढ़ेंगे तो डिपेंडेंसी रेशियो भी बढ़ेगी. 2021 तक हर 100 कामकाजी लोगों पर 16 बुजुर्ग निर्भर हैं.

भारत तीसरी बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था बनने जा रहा, इसकी सबसे बड़ी वजह उसके युवाओं की ताकत है. एक तरफ जर्मनी और जापान में जहां वर्किंग पॉपुलेशन यानी काम करने लायक जनसंख्‍या में तेजी से गिरावट आ रही, वहीं भारत में इसके आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं. चीन की अर्थव्यवस्था को पछाड़ने के लिए हमारा युवा रहना बहुत जरूरी है. चीन की जनसंख्या भी बहुत तेजी से बूढ़ी हो रही है. कहा जा रहा है कि चीन अमीर होने से पहले ही बूढ़ा होने जा रहा है. चीन की इस दशा से हमें सीखने की जरूरत है.  ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट के अनुसार, साल 2022 तक जापान में वर्किंग पॉपुलेशन जहां 58 फीसदी के आसपास रह गई, वहीं जर्मनी में यह आंकड़ा 63 फीसदी के आसपास रहा, जो लगातार घटता ही जा रहा है. इसके मुकाबले भारत में वर्किंग पॉपुलेशन 67 फीसदी पहुंच गई, जो अभी बढ़ती ही जा रही.पर अगले 2 दशकों में यह स्थिति नहीं रहेगी.  

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3- व्यवहारिक पहलू भी है

इससे बढ़कर और भी समस्याएं हैं जिनके चलते मोहन भागवत की चिंता जायज लगती है. दरअसल भारत में टीएफआर की दर 2.1 से नीचे चला जाना और भी मामले में खतरनाक हो ता जा रहा है. दरअसल भारत में जिनके पास अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने और ठीक तरह से बच्चों के पालन पोषण की सामर्थ्य है उनका टीएफआर तो एक से भी कम हो चुका है. और जिन लोगों के पास अपने बच्चों के लालन पालन के लिए बिल्कुल भी सामर्थ्य नहीं है वो लोग अब भी तीन से चार बच्चे पैदा कर रहे हैं. इसलिए देश में अकुशल वर्ग की तेजी से जनसंख्या बढ़ रही है. यही कारण रहा कि आज से दो दशक पहले ही सिंगापुर जैसे देशों में जनसंख्या विस्फोट के बावजूद आबादी नियंत्रण वाली योजनाओं को खत्म कर दिया गया. उसके पीछे यही कारण है कि सरकार चाहकर भी सभी गरीब बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा और अच्छा खान पान उपलब्ध नहीं करवा पाती हैं. नतीजा ये होता है कि देश में अकुशल लोगों की जनसंख्या बढ़ती जाती है.

4- कांग्रेस, सपा और ओवैसी को चिंता क्यों है?

इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि मोहन भागवत की इस चिंता के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक को हिंदुओं की घटती आबादी भी दिख रही हो.जाहिर है कि जिस तरह हिंदू, बौद्ध,जैन और सिख धर्म की महिलाओं की टीएफआर कम हुआ है उससे उनकी आबादी के बहुत तेजी से कम होने की आशंका बढ़ गई है. जाहिर है कि देश की डेमोग्राफी के गड़बड़ होने की चिंता संघ को होगी. कांग्रेस-समाजवादी पार्टी और ओवैसी की चिंता यही है कि कहीं इस विचार को बढ़ाने के बहाने संघ आगे चलकर डेमोग्रेफी चेंज होने के नाम पर कुछ ऐसा न करे जिससे अल्पसंख्यकों की आबादी नियंत्रण मुद्दा बन जाए.

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