
तीन दिन पहले खबर आई कि मिस्र गाजा के साथ अपनी राफा सीमा पर अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा रहा है. कारण यह है कि मिस्र सोच रहा है कि अगर इजरायल के दबाव में गाजा से चलकर उसके देश में फिलिस्तीनी घुस गए तो उनकी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था का क्या होगा. दरअसल अर्थव्यवस्था और सुरक्षा तो एक बहाना है. मिस्र ही नहीं दुनिया का कोई भी मुस्लिम देश इन्हें शरण नहीं देना चाहता है और न ही इन्हें सिटिजनशिप देता है. मिस्र के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी किया कि इतने सारे फिलिस्तीनियों को उनके घरों से निकालना अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा और देश के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का जोखिम.
1-मिस्र की हां में हां तुर्की भी मिला रहा
मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अलसीसी कहते हैं कि गाजा में फिलिस्तिनियों को डटे रहना चाहिए ताकि उनकी जमीन पर उनका हक बना रहे. मिस्र की हां में हां दुनिया के कई मुस्लिम देश मिला रहे हैं. तुर्की के विदेश मंत्री हाकन फ़िदान कहते हैं कि वह मिस्र की बात से पूरी तरह सहमत हैं. मिस्र के विदेश मंत्री समेह शौकरी धमकी भरे अंदाज में कहते हैं कि वह राफा गेट पर इंतजार कर रहे अमेरिकी नागरिकों सहित गाजा में फंसे विदेशी नागरिकों को तब तक निकलने की अनुमति नहीं देंगे जब तक कि इज़रायल हेल्प ट्रूप को भेजने की अनुमति नहीं देता.
इजरायल-हमास के बीच 7 अक्टूबर से भीषण युद्ध चल रहा है. गाजा में दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए हैं. मंगलवार की रात एक मिसाइल गिरने से गाजा के अस्पताल में करीब 500 लोगों के मरने की आशंका है. गाजा में भदगड़ का माहौल है. गाजा से बड़ी संख्या में लोग घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जा रहे हैं. पर आस पास का कोई भी मुस्लिम देश या अरब देश इन लोगों को अपने देश में घुसने नहीं दे रहे हैं.
2-अरब देशों का केवल दिखावे का समर्थन
अरब देश वैसे तो फिलिस्तिनियों को नागरिकता या शरण न देने के पीछे कई कारण देते हैं पर सबसे बड़ा कारण उन्हें अपने देश की डेमोग्रेफी गड़बड़ होने की आशंका ही रहती है. जार्डन ने लाखों फिलिस्तिनियों को अपने देश में शरण दी बाद में वे जार्डन के शाह के ही दुश्मन हो गए. भारत भी पूर्वोत्तर के कई राज्यों में शरणार्थियों के चलते कई समस्याएं पैदा हुईं हैं.
अरब देश फिलिस्तीनियों को काम के लिए तो स्वीकार रहे हैं, पर ऐसे काम ही देना पसंद करते हैं जो निम्न स्तर के हैं और उनके अपने देश के लोग वो काम करना पसंद नहीं करते. लेबनान में बहुत सी ऐसी नौकरियां हैं, जिनके लिए फिलिस्तीनी नागरिकों को कतई नहीं लिया जाता. ये ऐसी नौकरिया हैं जिनमें पैसे ज्यादा हैं और सम्मान भी.बाकी अरब देशों में भी फिलिस्तीनियों के साथ किसी न किसी तरह का फर्क किया जाता है.
3-ईसाई देश ईसाइयों को शरण देते हैं तो मुस्लिम देश मुसलमानों को शरण क्यों नहीं दे सकते
सीरिया संकट के समय भी शरणार्थियों को मध्य एशिया में जगह नहीं मिली. अधिकतर इस्लामी देश इन्हें अपने यहां शरण देने को तैयार नहीं थे. यूरोप पहुंच रहे शरणार्थियों को बहुत से देशों ने शरण दिया.हालांकि पूर्वी यूरोप के देशों को धर्म के आधार पर शरणार्थियों को चुनने का विरोध भी हुआ. स्लोवाकिया , पोलैंड, बुल्गारिया आदि देशों ने खुलकर कहा कि उन्हें ईसाई शरणार्थी मंजूर होंगे पर मुस्लिम नहीं.तत्कालीन पोलिश प्रधान मंत्री इवा कोपाकज़ ने पोलैंड को एक ईसाई देश बताते हुए कहा था कि ईसाइयों की मदद करना उनकी विशेष जिम्मेदारी है.बल्गेरियाई प्रधान मंत्री ने भी कहा था कि उनके देश में "मुसलमानों के खिलाफ कुछ भी नहीं है", लेकिन मुस्लिम शरणार्थियों को स्वीकार करने से देश की धार्मिक संरचना में बदलाव आ सकता है.एस्टोनियाई ने भी मुस्लिम प्रवासियों को लेने के खिलाफ तर्क देते हुए कहा, "आखिरकार, हम ईसाई संस्कृति से संबंधित देश हैं. चेक राष्ट्रपति मिलोस ज़ेमन ने कहा था कि शरणार्थी "पूरी तरह से अलग सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से" ये उपयुक्त नहीं होगा.
इन यूरोपीय देशों के तर्क कहीं से भी वाजिब नहीं हो सकते पर जब खुद इस्लामी देश इन्हें शरण नहीं दे रहे तो दुनिया में अन्य धर्मों को मानने वालों से उदारता दिखाने की अपेक्षा कैसे कोई कर सकता है.
4-यूक्रेन के पड़ोसी देशों और भारत से सबक ले सकते हैं मुस्लिम देश
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के अनुसार यूक्रेन-रूस युद्ध से प्रभावित करीब 22 लाख से अधिक लोग यूक्रेन से पलायन कर दूसरे देशों में पहुंचे हैं. करीब 10 लाख लोगों को पोलैंड ने आश्रय दिया है. करीब दो लाख से अधिक लोग यूक्रेन से हंगरी पहुंचे हैं.स्लोवाकिया जैसे देश ने भी डेढ़ लाख से अधिक लोगों को अपने यहां शरण दी है. अरब देशों को देखना चाहिए कि यूक्रेन युद्ध से पीड़ित लोगों को किसी भी पड़ोसी देश ने अपने देश में शरण देने से इनकार नहीं किया. एक बात और देखने वाली है कि इन पड़ोसी देशों की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं है. अरब देशों के मुकाबले इनकी आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब है.
भारत में एनडीए सरकार ने कुछ साल पहले अपने आस पास के देशों में मुश्किल में फंसे हिंदुओं के लिए एक पॉलिसी बनाई. इसके तहत पड़ोस के देशों से आने वाले हर हिंदू को भारतीय सिटीजनशिप देने की बात की गई थी. हालांकि अभी ये कानून लागू नहीं हो सका है पर भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले हिंदुओं को लेकर सॉफ्ट कॉर्नर रखता है. उन्हें हर तरह की सुविधाएं मुहैय्या कराई जाती हैं.उन्हें सिटीजनशिप देने का भी प्रयास होता है.हालांकि भारत में बांग्लादेश युद्ध के समय लाखों मुस्लिम शरणार्थियों का भार भी ढोया है. बांग्लादेश बनने के बाद भी लगातार बांग्लादेशी मुसलमान और रोहिंग्या मुसलमानों का भारत आना जारी रहा है. इन शऱणार्थियों के चलते पूर्वोत्तर का पूरा डेमोग्रेफी ही गड़बड़ हो चुकी है.
5-केवल 20 लाख फिलिस्तीनी, हर इस्लामी देश के जिम्मे 35 हजार
1959 में अरब लीग रिजॉल्यूशन 1547 कहता है फिलिस्तीनियों को 'उनके अपने देश ' की नागरिकता दिलवाने के लिए अरब देश सपोर्ट करेंगे. पर अपने यहां उन्हें न शरण देंगे और न ही नागरिकता. फिलिस्तिनियों को अपने यहां शरण न देने के पीछे अरब देशों के तर्क इतने सतही हैं जो किसी के गले नहीं उतरते. अरब देश ये तर्क देते हैं कि अगर उन्होंने अपने देशों में फिलिस्तीन के लोगों को नागरिक अधिकार देना शुरू कर दिया, तो ये एक तरह से फिलिस्तीन को खत्म करने जैसा होगा. लोग भाग-भागकर बाहर बसने लगेंगे और फिलिस्तीन पर पूरी तरह से इजरायल का कब्जा हो जाएगा.
अरब देशों का तर्क ऐसा है कि लोग भूखों मर जाएं, इजरायल की गोली से मर जाएं. 1959 के बाद से फिलिस्तिनियों की करीब 3 पीढ़ियां बरबाद हो चुकी हैं पर अरब देश अभी तक 6 दशक पुराने रिजॉल्यूशन से चिपके हुए हैं.
अरब देशों को नया रिजॉल्यूशन पास करना चाहिए. अगर फिलिस्तीन नागरिकों की वाकई चिंता है तो हर इस्लामी मुल्क को उन्हें शरण देने के बारे मे सोचना चाहिए. फिलिस्तिनी नागरिकों की कुल संख्या करीब 20 लाख है , अगर 57 इस्लामी देशों में उनका विभाजन कर दिया जाए तो हर इस्लामिक मुल्क के जिम्मे केवल 35 हजार फिलिस्तिनियों का भार ही आएगा.