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पवार और उद्धव से लेकर मायावती तक, वे 5 नेता जिनके लिए बहुत बुरा रहा 2024 | Opinion

देश में ऐसे भी नेता हैं जिन्हें लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों में बहुत बड़ी उम्मीद दिखाई पड़ी, लेकिन उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में लगा जैसे दुनिया ही उजड़ गई हो.

साल 2024 ने ऐसे कई नेताओं के लिए जिंदगी भर का जख्म दे गया. साल 2024 ने ऐसे कई नेताओं के लिए जिंदगी भर का जख्म दे गया.
मृगांक शेखर
  • नई दिल्ली,
  • 30 दिसंबर 2024,
  • अपडेटेड 11:16 AM IST

हर साल कुछ लोगों के लिए अच्छा होता है तो कइयों के लिए बहुत बुरा साबित होता है. समाज के हर फील्ड से लेकर राजनीति तक नजारा एक जैसा ही देखने को मिलता है - ऐसे में जबकि हम नये साल की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं, 2024 की मीठी और कड़वी यादें दिमाग में एक साथ घूम जाती हैं. 

देश की राजनीति में ये साल कई नेताओं के लिए मिला-जुला अनुभव लेकर भी आया, जबकि कुछ नेताओं के पैरों तले जमीन ही खिसक गई. क्षेत्रीय राजनीति से लेकर दलित राजनीति के क्षेत्र में भी ये सब देखने को मिला है. 

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ऐसे भी नेता हैं जिन्हें लोकसभा चुनाव नतीजों में बहुत बड़ी उम्मीद दिखाई पड़ी, लेकिन उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में लगा जैसे दुनिया ही उजड़ गई हो.

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके एकनाथ शिंदे तो ऐसे नेताओं में शुमार हैं, जिनकी राजनीति में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. 2022 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने एकनाथ शिंदे के लिए लोकसभा चुनाव के नतीजे अच्छे नहीं थे, लेकिन विधानसभा चुनाव के रिजल्ट तो निराश करने वाले ही रहे. हालात ऐसे बने कि वो हर मुमकिन कोशिश करके भी डिप्टी सीएम ही बन पाये - लेकिन, वो शरद पवार और उद्धव ठाकरे जैसे नेताओं से तो बेहतर पोजीशन में ही हैं, जिनका सबकुछ लुट चुका है. 

1. शरद पवार के पास तो सिर्फ बारामती का गढ़ ही बचा है

महाराष्ट्र के दिग्गज नेता माने जाने वाले शरद पवार ने एक बार उद्धव ठाकरे की नेतृत्व क्षमता को लेकर ऐसी बात कही थी, जो उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवालिया निशान समझा गया था. शरद पवार का कहना था कि शिवसेना में बगावत से पहले उन्होंने उद्धव ठाकरे को आगाह किया था, लेकिन वो नहीं समझ पाये. ज्यादा दिन नहीं बीते, और शरद पवार के साथ भी बिल्कुल वही सब देखा गया जो उद्धव ठाकरे के साथ हुआ था. 

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लोकसभा चुनाव से पहले शिवसेना और एनसीपी के टूट जाने से महाविकास आघाड़ी के नेता सदमे में थे, लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद हर कोई गलतफहमी का शिकार हो गया - और हकीकत विधानसभा चुनाव में सामने आ गई. 

बारामती लोकसभा सीट पर सुप्रिया सुले की जीत के बाद शरद पवार को लगा कि अजित पवार को तो वो यूं ही निपटा देंगे, लेकिन बीजेपी के साथ मिलकर भतीजे ने ऐसा खेल खेला कि 'खेला' ही हो गया. भतीजे अजित पवार ने चाचा शरद पवार को विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पछाड़ दिया. 

देखा जाये तो शरद पवार ने बारामती का गढ़ बचा तो लिया है, लेकिन अपने विधानसभा क्षेत्र में जीत हासिल कर अजित पवार ने वहां भी सेंध लगा ही दी है. 

2. उद्धव ठाकरे तो जैसे कहीं के नहीं रह गये हैं

उद्धव ठाकरे के महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनने में शरद पवार की भी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है, लेकिन 2024 में उनको मुख्यमंत्री पद का चेहरा न बनने देने में भी एनसीपी नेता का ही बड़ा रोल रहा. उद्धव ठाकरे चाहते थे कि उनको महाविकास आघाड़ी का मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया जाये, लेकिन न तो शरद पवार को ये मंजूर था, न राहुल गांधी को. लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में कांग्रेस के सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बाद तो कांग्रेस को ऐसा लगना भी स्वाभाविक था. 

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शरद पवार की तरह उद्धव ठाकरे ने भी बेटे आदित्य ठाकरे की वर्ली विधानसभा सीट जरूर बचा ली है, लेकिन वहां राज ठाकरे का उम्मीदवार वोट नहीं काटता तो आदित्य ठाकरे का जीत पाना मुश्किल होता. ये बात अलग है राज ठाकरे के बेटे अमित ठाकरे अपने पहले ही चुनाव में हार गये.

उद्धव ठाकरे और शरद पवार दोनो ही एक जैसी स्थिति में पहुंच गये हैं - ले देकर बीएमसी चुनावों से थोड़ी बहुत उम्मीद है, वरना लगता तो ऐसा है जैसे कहीं के नहीं रहे. 

3. मायावती की राजनीतिक जमीन काफी सिकुड़ चुकी है

2022 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी का प्रदर्शन तो कांग्रेस से भी बुरा था. कांग्रेस के दो विधायक तो बीएसपी का सिर्फ एक ही विधायक बचा है - और लोकसभा में तो 2014 की ही तरह फिर से जीरो बैलेंस खाता हो गया है. 

देश की दलित राजनीति में हाल तक जो मुकाम मायावती ने हासिल किया है, वो बहुतों को नसीब नहीं हुआ है - लेकिन उससे भी बड़ी सच्चाई ये है कि मायावती की राजनीति भी करीब करीब खत्म होती नजर आ रही है. 

मायावती कभी भी उपचुनावों के पक्ष में नहीं रही हैं, लेकिन नगीना सीट पर भीम आर्मी वाले चंद्रशेखर आजाद की जीत और बीएसपी की जमानत जब्त हो जाने के बाद उनको बीएसपी के जनाधार की फिक्र जरूर हुई, लेकिन यूपी की 9 विधानसभा सीटों के उपचुनाव के नतीजे ने तो उससे भी ज्यादा निराश किया है. 

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उपचुनाव में दो सीटों पर तो बीएसपी के उम्मीदवार पांचवें स्थान पर पहुंच गये, जबकि चंद्रशेखर की पार्टी वाले तीसरे स्थान पर पाये गये थे. मायावती ने आकाश आनंद को भी मोर्चे पर तैनात किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. 

और आंबेडकर के मुद्दे पर जारी विवाद के बीच मायावती का रवैया भी बीएसपी की सेहत के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं लगती. कांग्रेस पर हमला बोलकर मायावती बीजेपी को भी फायदा पहुंचा रही हैं - बीएसपी के भविष्य की राजनीति किसी भी मायने में कोई उम्मीद तो नहीं ही जगा रही है. 

4. नवीन पटनायक के लिए वापसी तो असंभव लगती है

2024 के विधानसभा चुनावों से पहले तक बरसों से नवीन पटनायक का ओडिशा में एकछत्र राज देखने को मिल रहा था, लेकिन जिस बीजेपी के साथ वो लगातार 10 साल नजर आये, उसी ने उनको ओडिशा से बेदखल कर दिया. 

ओडिशा में अब तो नहीं लगता कि बीजेडी सत्ता में वापसी कर पाएगी - और इस हिसाब से 2024 तो नवीन पटनायक के लिए सबसे बुरा साल ही साबित हुआ. 

5. महबूबा मुफ्ती की राजनीति भी बर्बादी की कगार पर पहुंच गई है 

जम्मू-कश्मीर में धारा 370 खत्म होने के बाद अब्दुल्ला परिवार और मुफ्ती परिवार दोनो की राजनीति करीब करीब एक ही मोड़ पर पहुंच चुकी थी, लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव में तो महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी जैसे बर्बाद ही हो गई. 

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जो महबूबा मुफ्ती बीजेपी की मदद से जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री बनी थीं, वो 2024 आते आते सूबे की सियासत में हाशिये पर पहुंच चुकी हैं - और जिस हिसाब से उमर अब्दुल्ला सरकार चला रहे हैं, पीडीपी के फिर से खड़े होने की कम ही उम्मीद लगती है. चमत्कार की बात और है, और वो तो कभी भी किसी के भी साथ हो सकता है. 

2024 में बर्बाद होने वाले नेताओं की फेहरिस्त में कई और भी नाम शुमार हैं. मसलन, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे जगनमोहन रेड्डी, लोक जनशक्ति पार्टी पर काबिज होकर केंद्र में मंत्री बने पशुपति कुमार पारस और शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल - और इन सबका आने वाला भविष्य जैसा भी हो, फिलहाल तो अंधेरा ही नजर आ रहा है. 

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