
योगी आदित्यनाथ जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तो उनके पास प्रशासनिक अनुभव न होने की बातें हो रही थीं. तब भी जबकि उनके पास लंबा राजनीतिक अनुभव था. वो गोरखपुर लोकसभा सीट से पांचवी बार सांसद बने थे.
2022 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले उनके मोदी-शाह से मतभेद और तनावपूर्ण रिश्तों की भी खूब चर्चा रही. लेकिन, योगी आदित्यनाथ ने डंके की चोट पर सत्ता में वापसी की - और उसके बाद से योगी आदित्यनाथ के समर्थक उनको देश का प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हैं.
लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने एक शिगूफा छोड़ा था, जिस पर काफी चर्चा भी हुई थी. अरविंद केजरीवाल का दावा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 75 साल के हो जाने के बाद उनके कैबिनेट साथी अमित शाह प्रधानमंत्री बन जाएंगे, और योगी आदित्यनाथ को यूपी के मुख्यमंत्री पद से हटा दिया जाएगा.
और अब महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के शिवसेना साथी संजय राउत ने भी वैसा ही शिगूफा छेड़ा है. मोदी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर दौरे को लेकर संजय राउत ने दावा किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सितंबर में रिटायर हो जाएंगे. सितंबर का जिक्र संजय राउत ने मोदी के बर्थडे के कारण किया होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बर्थडे 17 सितंबर को होता है, जब वो 75 साल के हो जाएंगे. मोदी ने 30 मार्च को नागपुर का दौरा किया था.
अपने राजनीतिक बयान में संजय राउत कहते हैं, प्रधानमंत्री मोदी पिछले 10-11 साल में RSS मुख्यालय नहीं गए थे... अब वहां मोहन भागवत को टाटा, बाय-बाय कहने गये थे. संजय राउत का ये भी दावा है कि आरएसएस भी देश के नेतृत्व में बदलाव चाहता है, इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी को बुलाया गया था.
अब यही चर्चा बहसों में योगी आदित्यनाथ पर पहुंच जाती है, क्योंकि जब भी मोदी के उत्तराधिकारी की बात होती है बीजेपी के समर्थकों का एक तबका योगी-योगी करने लगता है - लेकिन यही सवाल जब योगी आदित्यनाथ के सामने लाया जाता है, तो वो पूरी बहस अलग दिशा में ही मोड़ देते हैं.
योगी आदित्यनाथ कह रहे हैं कि राजनीति में लंबी पारी खेलने का उनका कोई इरादा नहीं है नहीं करने वाले हैं, और एक दिन अपने मठ लौट जाएंगे - सवाल ये है कि योगी आदित्यनाथ आखिर क्या संदेश दे रहे हैं, और ये संदेश किसके लिए है?
क्या योगी की राजनीति यूपी तक ही सीमित है
न्यूज एजेंसी पीटीआई की तरफ से योगी आदित्यनाथ से भविष्य के उनके राजनीतिक प्लान के बारे में कई सवाल पूछे जाते हैं. आरएसएस आपको पसंद करता है... मोदी जी आपको पसंद करते हैं... आपको उपयोगी कहते हैं... देश का एक बड़ा तबका आपको प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है... कभी न कभी, तो इसके बारे में क्या कहेंगे आप?
सवालों के जवाब में योगी आदित्यनाथ ने जो कुछ कहा है, उसका लब्बोलुआब यही लग रहा है राजनीति उनके लिए कोई पूर्णकालिक पेशा नहीं है - और एक दिन वो अपने मठ लौट जाएंगे.
बहुत अच्छी बात है, लेकिन क्या योगी आदित्यनाथ लखनऊ से ही गोरखपुर के मठ लौट जाएंगे या दिल्ली पहुंचने के बाद. दिल्ली तो वो पहले भी आते जाते रहे हैं, गोरखपुर के सांसद के रूप में, लेकिन काफी दिनों से उनके समर्थक योगी आदित्यनाथ को देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखते आ रहे हैं. बीच बीच में ऐसे सर्वे भी हुए हैं जिनमें लोग योगी आदित्यनाथ और अमित शाह दोनो को अपने अपने हिसाब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तराधिकारी बताते रहते हैं.
योगी आदित्यनाथ का कहना है, 'मैं उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री हूं... और पार्टी ने मुझे राज्य के लोगों की सेवा करने के लिए यहां रखा है.'
यहां सवाल ये उठता है कि क्या योगी आदित्यनाथ की राजनीति सिर्फ उत्तर प्रदेश तक ही सीमित है? देश भर में होने वाले चुनावों में बीजेपी के सारे मुख्यमंत्री चुनाव कैंपेन में हिस्सा लेते हैं, लेकिन हेडलाइन तो योगी आदित्यनाथ ही बनाते हैं. और हर जगह उनकी मौजूदगी का अलग अलग महत्व होता है. 2018 के छत्तीसगढ़ चुनाव में योगी आदित्यनाथ पहुंचे तो तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह ने उनके पैर छुए थे, जबकि वो बीजेपी के मुख्यमंत्रियों में सबसे जूनियर और कम उम्र के थे.
योगी आदित्यनाथ जब 'बंटेंगे तो कटेंगे' नारा देते हैं, तो झारखंड और हरियाणा से लेकर महाराष्ट्र तक गूंजता है. वो बांग्लादेश से लेकर बलूचिस्तान तक, अतंर्राष्ट्रीय मसलों पर अपनी राय देते हैं, और उसे हाथों हाथ लिया जाता है - फिर कैसे मान लिया जाये कि वो यूपी तक ही सीमित हैं, और आगे भी रहना चाहते हैं?
राजनीति में कोई समय सीमा होती है क्या
योगी आदित्यनाथ का ये कहना कि राजनीति उनके लिए कोई फुल-टाइम जॉब नहीं है. सही है.
योगी आदित्यनाथ का ये कहना भी कि वो यूपी के मुख्यमंत्री के रूप में काम जरूर कर रहे हैं, लेकिन वास्तविकता में वो एक योगी ही हैं. ये भी ठीक है.
योगी आदित्यनाथ का ये कहना कि जैसे जीवन के बाकी फील्ड में एक समय सीमा होती है, राजनीति में भी बिल्कुल वही बात लागू होती है. ये भी बिल्कुल ठीक है.
लेकिन, सवाल उठता है कि योगी आदित्यनाथ के बयान को कैसे लिया जाये? कैसे समझा जाये?
जो कुछ भी योगी आदित्यनाथ ने कहा है, वो राजनीतिक रूप से दुरुस्त तो है ही - मजबूरी की बात अलग है, लेकिन राजनीति में कोई समय सीमा होती है क्या?
चुनावी हार पर हार. आपराधिक मामले में सजा हो जाने, चुनाव लड़ने पर पाबंदी लग जाने के बाद भी, जमानत पर छूटे हुए नेता सक्रिय राजनीति से खुद को अलग कहां कर पा रहे हैं. सेहत सही न होने के बावजूद, कोई चुनाव कैंपेन में जा रहा है, तो कोई धरना-प्रदर्शन में भी समर्थन देने पहुंच जाता है.
लेकिन, योगी आदित्यनाथ का अपना पॉलिटिकल दर्शन है. अपने भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं पर साफ साफ कहते हैं, हम लोग जिस समय तक हैं... हैं... काम कर रहे हैं... इसकी भी एक समय सीमा होगी.
और बात जब प्रधानमंत्री बनने की आती है तो कहना होता है, मैं यूं तो एक संन्यासी हूं... योगी हूं, राजनीति मेरी प्राथमिकता नहीं है... हां, फिलहाल मुझे उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई जिसका मैं निर्वहन कर रहा हूं... अगली बार जिसे ये कार्य सौंपा जाएगा, वो करेगा... मैं फिर अपने मठ लौट जाउंगा.
क्या ऐसा ही होगा? कहते हैं, मनुष्य जो सोचता है, शायद ही हो पाता है. लेकिन, क्या संन्यासी जो सोचता है, उसके साथ क्या होता है? योगी जो सोचता है, उसके साथ क्या होता है?
बेशक वो संन्यासी हैं. बेशक वो योगी हैं. बेशक वो गोरक्षपीठ के महंत हैं, लेकिन उनका बयान तो और साधु-संतों की तरह तो लिया नहीं जाएगा - पेशा वो भले न मानते हों, लेकिन फुलटाइम राजनीति में तो हैं ही - लिहाजा, उनका ये बयान भी राजनीतिक ही माना जाएगा.