बंगाल की सियासत और हिंसा का गहरा रिश्ता है. आखिर क्या कारण हैं कि बंगाल में जब भी चुनाव आते हैं या फिर जब भी सियासत की बात होती है तब खून बहता है, रक्त बहता है. कितने कार्यकर्ता, कितने नेता हिंसा का शिकार हो रहे हैं. कितने आम लोग उसकी चपेट में आ रहे हैं. ये सारी चीजें बंगाल में क्यों होती हैं? इसका अंत आखिर कब होने वाला है? माओत्से तुंग ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है. पश्चिम बंगाल ने इसे राजनीति की शायद पहली शर्त ही मान लिया. आंकड़े और इतिहास बताते हैं कि इसे एक ऐसा राज्य कहा जा सकता है, जहां हिंसात्मक राजनीतिक के विरोध में भी हिंसा ही सबसे जरूरी हथियार बन जाती है. राजनीतिक रिवाज रक्त-रंजित दिखते हैं. सामाजिक सरोकार रक्त रंजित दिखते हैं. व्यक्तिगत अधिकार रक्त-रंजित दिखते हैं. स्थिति ये है कि सत्ता बदलती है लेकिन पश्चिम बंगाल का रक्त-चरित्र नहीं बदलता. देखें श्वेतपत्र, श्वेता सिंह के साथ.