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Ashwathama: धरती पर आज भी जीवित है अश्वत्थामा, श्रीकृष्ण के इस श्राप से हुआ था अमर

Kalki 2898 AD Ashwathama: अश्वत्थामा महाभारत का एक ऐसा योद्धा था जिसने अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु का बदला लेने के लिए पांडवों के किले में कोहराम मचा दिया था. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अश्वत्थामा को अमरत्व का वरदान प्राप्त था और वो आज भी पृथ्वी पर कहीं जीवित है.

अश्वत्थामा को अमरत्व का वरदान प्राप्त था और वो आज भी पृथ्वी पर कहीं जीवित है अश्वत्थामा को अमरत्व का वरदान प्राप्त था और वो आज भी पृथ्वी पर कहीं जीवित है
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 30 अप्रैल 2024,
  • अपडेटेड 1:09 PM IST

Ashwathama: कुछ दिन पहले ही फिल्म कल्कि 2898 AD में अमिताभ बच्चन का अश्वत्थामा वाला लुक सामने आया था. सोशल मीडिया में उनके लुक और अश्वत्थामा दोनों की खूब चर्चाएं हुई थीं. अश्वत्थामा महाभारत का एक ऐसा योद्धा था जिसने अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु का बदला लेने के लिए पांडवों के किले में कोहराम मचा दिया था. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अश्वत्थामा को अमरत्व का वरदान प्राप्त था और वो आज भी पृथ्वी पर कहीं जीवित है. आइए अश्वत्थामा के बारे में आपको विस्तार से बताते हैं.

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कौन है अश्वत्थामा?
अश्वत्थामा पांडवों और कौरवों के गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र था. वह जन्म से ही अपने पिता की तरह पराक्रमी और धनुर्विद्या में माहिर था. एक बार संतान प्राप्ति के लिए द्रोणाचार्य और उनकी पत्नी कृपि ने हिमालय जाकर तप किया. तब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था. द्रोणाचार्य और कृपि की इसी संतान का नाम अश्वत्थामा पड़ा. ऐसा कहा जाता है कि यह महाभारत का इकलौता ऐसा किरदार है जो कलयुग में भी जीवित है.

पिता की मृत्यु से टूट गया था अश्वत्थामा
वैसे तो द्रोणाचार्य पांडव और कौरवों दोनों के गुरु थे. लेकिन महाभारत में द्रोणाचार्य कौरवों की तरफ से लड़े थे. महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह के शर शय्या पर पड़ने के बाद उन्होंने कौरवों की सेना का नेतृत्व किया. श्रीकृष्ण और पांडव जानते थे कि द्रोणाचार्य के संचालन में कौरवों का हराना आसान नहीं होगा. तब श्रीकृष्ण ने इसका तोड़ निकाला. योजना के अनुसार युद्ध में यह बात फैला दी गई की अश्वत्थामा मारा गया. जबकि भीम ने अवन्तिराज के एक हाथी अश्वत्थामा को मारा था.

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बेटे की मृत्यु के बात सुनकर द्रोणाचार्य टूट गए और उन्होंने युद्धभूमि में हथियार छोड़कर बेटे की मौत पर शोक मनाना शुरू कर दिया. तभी मौका पाकर राजा द्रुपद के बेटे धृष्टद्युम्न ने गुरु द्रोणाचार्य का सिर धड़ से अलग कर दिया.

पांडवों पर कहर बनकर टूटा अश्वत्थामा
जब अश्वत्थामा को कृष्ण और पांडवों की इस चाल का पता लगा तो वह अपना आपा खो बैठा. पांडव नहीं जानते थे गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन के अलावा अश्वात्थामा को भी ब्रह्मास्त्र चलाना सिखाया था. पिता की मृत्यु से क्रोधित अश्वत्थामा ने जैसे ही नारायाणशस्त्र चलाने का फैसला किया, पांडव डर गए. नारायाणशस्त्र निकालते ही आसमान से पांडवों की पूरी सेना पर तीर निकल आए. लेकिन श्रीकृष्ण ने यहां भी पांडवों को बचा लिया. श्रीकृष्ण जानते थे कि नारायणशस्त्र का निहत्थों पर कोई असर नहीं होता है और इसका उपयोग सिर्फ एक बार किया जा सकता है. कृष्ण के इसी संदेश के कारण पांडव बच गए और अश्वत्थामा का नारायण शस्त्र बर्बाद हो गया.

कृष्ण के श्राप से अमर हुआ था अश्वत्थामा
महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद अश्वत्थामा ने पांडवों से बदला लेने की योजना बनाई. अश्वत्थामा ने धृष्टद्युम्न को मार डाला. उसने द्रौपदी के पुत्रों को पांडव समझकर मार डाला. उसने उत्तरा को भी मारने का प्रयास किया ताकि अर्जुन का वंश समाप्त हो जाए. तब श्रीकृष्ण ने गुस्से में आकर अश्वत्थामा को चिरकाल तक धरती पर कोढ़ी बनकर भटकने का श्राप दिया था. कृष्ण के इसी श्राप की वजह से अश्वत्थामा अमर हो गया था.

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