
मैं आस्था हूं. समय के न जाने कितने दौर पहले जन्मी, शायद आग से भी पहले और पहिए के अस्तित्व में आ जाने के भी पूर्व. सभ्यताओं के पनपने-बनने और मिटने से भी बहुत पहले मैंने आदमी के मन में अपनी जगह बना ली थी. फिर चाहे वो आदमी बेबिलोनिया का रहा हो, मैसोपोटामिया का हो, हड़प्पा का हो, सिंधु के किनारे की बसावट वाला रहा हो, या नील नदी-अमेजन घाटी, सागरों-महासागरों के तटवर्ती इलाकों वाला रहा हो. आदमी जहां भी रहा हो, मैं यानी आस्था उसकी कदम दर कदम, समय दर समय, पल दर पल साथी रही. मैं ही वो आस्था ही हूं जो जम्बूद्वीपे, भरत खंडे, आर्यावर्ते, भारत देशे में युगों-युगों से व्याप्त रही और समय का चक्का जैसे-जैसे घूमता रहा, मैं साथ-साथ चलती रही है.
मैं आस्था हूं... बीते 2 महीनों से मैं प्रयागराज में हूं. मैं खुले मन से स्वीकार करती हूं कि मैं नदियों में नहीं हूं, मैं घाटों में नहीं हूं न ही मेरा स्थान, किसी शिवालय-देवालय में हैं. मेरा स्थान आस्थावानों के हृदय में है, जिनकी भीड़ यहां मौजूद है और उनमें भी जो इस रेले का हिस्सा हैं और लगातार जिनके पांव संगम तट पर बढ़ रहे हैं.
संगम की रेती पर बिखरी है आस्था
ये स्वीकार करते हुए मुझे साक्षात श्रीकृष्ण नजर आ रहे हैं. वही श्रीकृष्ण जो कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े हैं. युद्ध शुरू ही होने वाला है और शोक का मारा अर्जुन रथ के पीछे सिर पर हाथ धरकर बैठ गया है. उस अर्जुन का मोह नाश करते हुए भगवान उससे कह रहे हैं कि तू हर जगह मुझे ही देख. वृक्षों में पीपल मैं हूं, नदियों में गंगा मैं हूं, वेदों में सामवेद मैं हूं, धनुषों में सारंग मैं हूं, चक्र हूं तो सुदर्शन और शंख हूं तो पांचजन्य मैं हूं. मैं ऋतुओं में वसंत हूं, नक्षत्रों में सूर्य हूं, माताओं में धरती हूं और पिता हूं तो आकाश मैं हूं. कृष्ण अगर आगे कहते तो शायद यह कहते कि विश्वास में आस्था मैं हूं.
क्योंकि यह विश्वास ही तो है जो इस अपार जनमानस को युगों पुरानी उस पुराण कथा का विश्वास दिलाता है कि त्रिवेणी के इस संगम जल में कभी एक बूंद अमृत गिरा था. अमरता की वह चाह, आरोग्य की वह आशा और उससे भी अधिक इस बात की आस्था कि प्रयागराज धरती पर वह अकेला स्थान है, जहां देवता भी आकर स्नान को तरसते हैं. इसमें भी महाकुंभ वह एक ही सुनहरा मौका है, जब आपकी हर एक डुबकी के साथ देवता स्नान करते हैं और संगम के इस पावन जल में डुबकी लगाने से पीछे की सात पीढ़ियां मोक्ष की ओर बढ़ जाती हैं.
मैं वह आस्था हूं जो ऋग्वेद के श्लोक की महत्ता सिद्ध करती हूं, जिसमें लिखा है कि 'जिस स्थान में (प्रयाग) श्वेत (गंगा) और श्याम (यमुना) का संगम है उस स्थान की यात्रा, दर्शन और इसकी जलधारा में स्नान करने से स्वर्ग मिलता है. जो धीर पुरुष इस स्थान पर शरीर त्याग देते हैं वे अमर पद को प्राप्त होते हैं.
सितासिते-सरिते-यत्र-संगते, तत्रप्लुता सो दिवमुत्पतन्ति। ये वे तनुं विसृजन्ति धीरा, स्तैजनासोऽमृतत्वं भजन्ते। (ऋग्वेद, खिलसूक्त)
आक्रांताओं की यातना से भी नहीं टूटा कुंभ का सिलसिला
ये मान्यता इतनी प्रबल है कि हकीकत वाली दुनिया के तमाम दुनियावी झंझावात, तमाम तामझाम और अड़ंगे-रोड़े सब छोटे पड़ जाते हैं. आस्था है ही इतनी बलवान कि वह किसी अग्निकांड, किसी भीड़-भाड़, भगदड़, दंगे-फसाद को नहीं मानती, वह उसे कुछ नहीं जानती और यह साबित करती है कि सनातन की ये शक्ति युगों-युगों और सदियों से यूं ही नहीं चली आ रही है. बात भी सही है. इस आस्था के बलवती होने का गवाह तो इतिहास भी है. तमाम ऐसी ऐतिहासिक घटनाएं इस बात की साक्षी हैं कि आस्था के इस महासागर को जब-तब सुखा देने की असंभव कोशिश की गई, लेकिन यह तो वह शय है जो बुझी हुई राख से पैदा हो गई.
किताबों में दर्ज है कि तैमूर लंग ने 800 साल पहले हरिद्वार कुंभ में कत्ले आम मचाया था, लेकिन नागाओं की सशस्त्र सेना ने उसकी आततायी सेना को उल्टे पांव खदेड़ दिया. जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने प्रयागराज में किलेबंदी की. जहांगीर ने संगम किनारे के पीपल के पेड़ को जलवा दिया, कटवा दिया, उस पर गर्म तवे रखवाए, लेकिन पद्म पुराण में जिस अमर पीपल का जिक्र हुआ है, कहते हैं कि वह अपनी राख से भी पनप आया.
इस कुंभ पर अंग्रेजों ने स्नान के लिए उस समय 1 रुपये का टैक्स लगाया था, जब एक आम मजदूर की आमदनी पांच रुपये भी नहीं थी. क्या तब भी कुंभ बंद हो गया? क्या लोग स्नान करने नहीं गए? क्या कुंभ की आस्था पर रत्ती भर भी असर पड़ा? नहीं... इन सभी सवालों का जवाब नहीं है, क्यों? क्योंकि आस्था, हर आशंका, हर यातना और हर दुष्प्रचार से बहुत बड़ी है.
गीता में आत्मा की खूबियां बताते हुए जो 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि' कहा गया है, असल में वह सिर्फ आत्मा के लिए नहीं, मुझ आस्था के लिए भी कहा गया है. मैं कौन हूं? मैं संगम तीर, स्नान से तर खड़े हर व्यक्ति में उमड़ आई भावना हूं. मैं कौन... वही आस्था... जो संगम की इस रेती में है. जो तट पर पहुंचने को आतुर पैदल चलते चले जा रहे हर कदम में हैं. जो आंखों से त्रिवेणी के इस पावन दृश्यों को निहार रही है और हर-हर गंगे के नाद से आकाश को गूंजा रही है. मैं शताब्दियों का इंतजार हूं, जो 144 साल के विशेष योग में है. टेंट सिटी से लेकर यूं ही कहीं भी थककर सुस्ता रहे पथिक की नींद में है.
संगम में हर ओर आस्था के दर्शन
मैं सिर्फ इतने तक ही सीमित नहीं हूं. मैं देश से लेकर विदेशों के कोने-कोने से यहां पहुंचे श्रद्धालुओं में हूं. मैं ट्रेनों की भीड़ में हूं. ट्रैफिक की कतार में हूं. मैं आचमन के नीर में हूं. संगम तीर में हूं. प्रसाद की खीर में हूं. पैदल चली आ रही भीड़ में हूं. जो पहुंच पाए उनके धीर में हूं और जो घरों में रहे उनके मन अधीर में हूं. मैं यहां होने वाली पुष्प वर्षा में हूं. तीर्थों के जल से होने वाले अभिषेक में हूं. आरती की थाल भी मैं हूं और उसकी लौ भी हूं. मैं ही दीपक हूं और उसकी बाती भी मैं हूं. बंट रहा प्रसाद भी मैं हूं और उन्हें ग्रहण करने वाले हाथ भी मैं हूं. गगन तक गूंज रही जय-जयकार भी मैं हूं और कानों तक पहुंच रही आवाज भी मैं हूं. मंदिर में भी मैं हूं, मंदिर के बाहर भी मैं ही हूं.
पिताओं के कंधों पर उचक कर नाच रहा बचपन भी मैं हूं. कहीं राम, कहीं हनुमान, कहीं शिव, कहीं पार्वती में सजा हुआ रूप भी मैं हूं. पल-पल बदल रहा स्वरूप भी मैं हूं. स्तुति मैं हूं, भजन मैं हूं, हवन में होम और आरती का गीत मैं हूं. मैं प्रयागराज आई हूं और यहां आने से विभोर मैं हूं. मैं आस्था हूं और भक्तों के भाव में जिंदा मैं हूं.