
Raksha Bandhan 2024: कल देशभर में रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाएगा. इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनसे अपनी रक्षा का वचन लेती हैं. सनातन संस्कृति में राखी का त्योहार भाई बहन के पवित्र प्रेम की पावन अभिव्यक्ति है. रक्षाबंधन के त्योहार की परंपरा और इतिहास सदियों पुराना रहा है. त्रेता युग में भी रक्षा सूत्र को लेकर एक अत्यंत मार्मिक कहानी का वर्णन मिलता है. यह कहानी है नेत्रहीन माता-पिता के प्रति अपना जीवन समर्पित करने वाले श्रवण कुमार और राजा दशरथ की.
एक पौराणिक कथा के अनुसार, त्रेता युग में आज्ञाकारी पुत्र श्रवण कुमार अपने नेत्रहीन माता-पिता को कावड़ में रखकर तीर्थयात्रा कराते हुए अयोध्या पहुंचे. मां और पिता को जब प्यास लगी तो श्रवण कुमार ने एक स्थान पर कावड़ रख दी और तुंबा लेकर यमुना नदी की ओर चले गए. जिस जगह से श्रवण कुमार पानी भरने गए थे, वहां राजा दशरथ पहले से ही आखेट (शिकार) के लिए पहुंचे हुए थे.
जैसे ही श्रवण कुमार ने जल भरने के लिए यमुना नदी में अपना तुंबा डुबोया, शिकार की ताक में बैठे राजा दशरथ ने उन्हें मृग (हिरण) समझकर शब्दभेदी बाण छोड़ दिया. राजा दशरथ के धनुष से निकला बाण सीधा श्रवण कुमार को जाकर लगा. राजा दशरथ जब शिकार को देखने पहुंचे तो उन्हें वहां अंतिम सांसें गिनते श्रवण कुमार मिले. राजा दशरथ को अपनी गलती का बहुत पछतावा हुआ.
राजा दशरथ को मिला पुत्र वियोग का श्राप
लेकिन मरने से पहले उन्होंने राजा दशरथ को अपने नेत्रहीन माता-पिता की सारी कहानी बता दी थी. तब ग्लानि से भरे दशरथ श्रवण कुमार के पास गए और उनके नेत्रहीन मां-बाप को पुत्र शोक की दुखद सूचना दी. पुत्र वियोग में श्रवण कुमार के माता-पिता ने बिलख-बलखकर अपने प्राण त्याग दिए. लेकिन प्राण त्यागने से पहले श्रवण कुमार के माता-पिता ने राजा दशरथ का पुत्र वियोग का श्राप दे दिया था.
राजा दशरथ को अपनी भूल का अंदाजा था, लेकिन अब वो कुछ नहीं कर सकते थे. तब राजा दशरथ ने श्रवण कुमार के परलोक कल्याण के लिए एक रक्षा सूत्र उनके नाम पर यमुना नदी में अर्पित किया था. संयोगवश वो दिन भी श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा का ही था. ऐसी मान्यता है कि तब से रक्षाबंधन के दिन श्रवण कुमार के नाम एक रक्षा सूत्र अर्पित करने की परंपरा चल पड़ी. इसीलिए कई जगहों पर रक्षाबंधन मनाने से पहले श्रवण कुमार की पूजा का विधान भी है.