
बीता एक सप्ताह प्रेम के नाम रहा और आज वैलेंटाइन डे के साथ इसका समापन हो जाएगा, लेकिन प्रेम, प्यार, इश्क या मुहब्बत... आप कुछ भी कह लें, कोई भी नाम दे लीजिए, लेकिन सीने के अंदर जहां दिल धड़कता है उसी जगह से उठने वाला ये अहसास इतना दिव्य है कि इसे हर धर्म, पंथ, मत, मान्यता में सबसे ऊपर रखा गया है. संबंधों के आधार पर आप रिश्तों को अलग-अलग नाम दे सकते हैं, लेकिन उन रिश्तों और संबंधों को जिंदा रखनी वाली चेतना का नाम है प्रेम. प्रेम अगर एक अगन है तो त्याग व समर्पण इसके ईंधन हैं. ये दोनों रहेंगे तो प्रेम जिंदा रहेगा और नहीं रहे तो समझिए कि प्रेम कभी था ही नहीं.
वास्तविक पहचान कायम करता है प्रेम
इंसानी जेहन में सबसे आसानी के साथ आने वाली जो पहली भावना है वह प्रेम है और ये किसी भी रूप में हो सकती हैं. पहले-पहल इसकी शुरुआत जिज्ञासा से हो सकती है, फिर आकर्षण आपको उसकी ओर लेकर जाता है, फिर आपमें ललक पैदा होती है, अगले चरण में वह आदतों में शुमार होकर आपकी पहचान बनने लगता है, फिर वह आपके जीवन का जरूरी हिस्सा बन जाता है और आपकी वास्तविक पहचान को कायम करता है और यहां से यह शाश्वत बन जाता है. इतना की आप न भी रहें, लेकिन प्रेम रहेगा. वह लोगों को याद रहेगा कि यह आपका प्रेम था. यही तो प्रेम के सात चरण हैं, जिन्हें बीती शताब्दियों में इतनी बार और ऐसे बताया गया है कि रहस्य न लगने वाली ये बात भी बड़ी रॉकेट साइंस बनकर उभरी है.
प्रेम को लेकर क्या कहते हैं ओशो?
प्रेम में सुनी गईं दो सबसे खराब पंक्तियां कुछ ऐसी हैं. पहली तो ये कि 'प्यार अंधा होता है', दूसरी ये कि 'जब दिल लगा गधी से परी क्या चीज है.' इन दो खराब पंक्तियों ने प्रेम के रूप और इसके अर्थ को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है. इनसे न तो सिर्फ प्रेम एक ऑब्जेक्ट में बदल गया है, बल्कि इसने सुंदरता के सबसे खराब पैमाने भी विकसित किए हैं और प्रेम की समझ को सबसे अर्थहीन और सबसे क्षुद्र बना दिया है.
इस पर ओशो तो लगभग डांटते हुए कहते हैं कि, 'भला ये क्या बात हुई कि प्यार अंधा होता है. ये तुमसे किसने कह दिया, किसने समझा दिया है. असल तो ये है कि सिर्फ प्यार की ही आंखें हैं, प्यार के बिना तो सब अंधा होता है.' जो लोग ऐसा कहते हैं असल में वह जानते ही नहीं कि, प्यार क्या है. बिना प्यार के इंसान बस एक शरीर है, एक मंदिर जिसमें देवता नहीं होते. प्यार के साथ देवता आ जाते है, मंदिर फिर और खाली नहीं रहता है.
आलिंगन संसार की सबसे सुंदर भाषा
प्रेम न करने वाला अंधा होता है. जिसे न प्रेम नज़र आता है और न ही सामने वाले का उसके प्रति समर्पण. ओशो आगे कहते हैं कि, लोग तो ये भी कहते हैं कि प्रेम की कोई भाषा नहीं होती पर देखा जाये तो, आलिंगन संसार की सर्वोत्तम भाषा है. यह सिर्फ भाषा नहीं है, बल्कि चिकित्सा भी है.स्पर्श से बेहतरीन कोई अनुवाद नहीं है. आंखों से ज्यादा कोई नहीं बोलता. सबसे मुखर मौन संवाद होते हैं और फिर भी लोग कहते हैं. प्रेम की भाषा नहीं होती. आश्चर्य है ...'
ओशो को इसी बात को कई कवियों ने कविता का विषय बनाया है. कविवर मैथिलीशरण गुप्त लिखते हैं कि 'जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं, वह हृदय नहीं वह पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं' हालांकि उनकी दूसरी पंक्ति भले ही राष्ट्र प्रेम को समर्पित है, लेकिन वह इससे पहले हृदय को भावों से भरा होने और रसमय होना बता रहे हैं, जो प्रेम की अनुभूति है.'
प्रेम से ही होती है सौंदर्य की पहचान
ओशो सौंदर्य पर भी कहते हैं कि प्रेम ही वह शय है जो इंसान के भीतर सौंदर्य बोध लेकर आ पाती है. वरना तुम तो रह जाओगे सिर्फ त्वचा का सौंदर्य निहारने में. वह कहते हैं कि जब वासना खो जाती है तो सौंदर्य का अनुभव होता है और जब सौंदर्य का अनुभव होता है, तो तुम्हारे भीतर प्रेम आता है. प्रेम उस घड़ी का नाम है, जब तुम्हें सब जगह परमात्मा और उसका सौंदर्य दिखाई पड़ने लगता है. तब तुम्हारे भीतर जो ऊर्जा उठती है, जो गीत उठता है–वही प्रेम है.'
फिर प्रेम से क्यों लगता है डर?
प्रेम को लेकर एक डर भी बैठा रहता है. डर ऐसा कि कुछ गलत तो नहीं कर रहे हैं, यह कुछ खराब तो नहीं है. इसी के साथ चरित्र का डर भी आता है. यह डर फिर कहीं का नहीं छोड़ता है. इसकी वजह से आप सिर्फ इच्छा को दबाते हैं. इतना दबाते हैं, इतना दबाते हैं कि वह फिर उस उम्र में विस्फोट के साथ उभरती है, जब आपकी दबाने की शक्ति कमजोर पड़ने लगती है. वह एक किस्सा सुनाते हैं. 'एक सिनेमाहॉल में ऐसा हुआ कि एक महिला पास में बैठे एक बदतमीज बूढ़े से तंग आ गई, वह आधे घंटे से सिनेमा देखने की बजाय उसे ही घूरे जा रहा था. आखिर महिला ने फुसफुसाकर उस आदमी से कहा, “सुनिए, आप अपना एक फोटो मुझे देंगे?’ आदमी बाग-बाग हो गया: बोला- जरूर जरूर! एक तो मेरी जेब में ही है। लीजिए! लेकिन क्या कीजिएगा मेरे फोटो का?’महिला ने कहा, “अपने बच्चों को डराऊंगी.’
जीवन में प्रेम और उम्र का महत्व
यहां ओशो इशारा करते हैं कि जीवन को हर रूप में जीने आना चाहिए. आप बालक थे, तितलियों के पीछे दौड़े, सही है. क्योंकि ये होना था और स्वभाव है. आप जवान हुए तो आपके अंदर उठने वाली भावनाएं आपको अपने आकर्षण की ओर ले ही जाएंगी. यह पुरुष और स्त्री से हटकर, लैंगिक आधार से परे की बात है. सीधी सी बात है कि जवानी है, तो आकर्षण है और उसकी ओर जाना भी है, लेकिन यहां आप डर गए. डर गए कि समाज क्या कहेगा? डर गए कि कहीं ये गलत तो नहीं, डर इसलिए भी गए क्योंकि धर्म-पंथ में तो ब्रह्मचर्य के लिए लिखा है और साधु लोग तो इसे नर्क का दरवाजा मानते हैं.
इस डर ने प्रेम को कहीं का नहीं रहने दिया. वह न इस ओर रहा न उस ओर. परिणाम क्या निकला कि जिस उम्र में जी भर कर, मन लगाकर प्रेम करना था तब आपने किया नहीं, उसे दबा लिया. आप शक्तिशाली थे, दबा सकते थे, लेकिन अब जब जीवन 50 की उम्र पर चल पड़ा है, जहां घुटने तक तो जवाब देने लगते हैं तो क्या वो इच्छा खाक दबेगी. वह उछाल मारेगी, फिर आपकी हालत उसी सिनेमा हॉल वाले बूढ़े जैसी होगी.
धर्म के स्वरूप में भी है काम की अवधारणा
बात अगर धर्म और पंथ की है तो वहां भी चार प्रमुख कर्तव्य हैं जो इंसानी शरीर के लिए तय कर दिए गए हैं. धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष. इसमें काम वही आसक्ति है, जो एक सामाजिक मनुष्य होने के लिए जरूरी है. महाभारत में भी इसका जिक्र आता है और कहा गया है कि 'धर्मे च अर्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ, यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्' यानि कि धर्म, अर्थ,काम और मोक्ष ये जीवन के आधार हैं और महाभारत में इसके विषय में जो बताया गया है, वह और कहीं नहीं है.
सनातन की ही बात करें तो यहां कभी भी प्रेम और कामेच्छा को दुत्कारा नहीं गया है, बल्कि इसे अपनाया गया है. प्रेम और आसक्ति के देवता कामदेव हैं जो देवताओं की ही तरह अमर हैं और दिव्य शक्तियों वाले हैं. उनकी पत्नी का नाम रति है, जो रतिक्रिया (संभोग) की देवी हैं. वैलेंटाइन तो बाद में आया होगा, लेकिन सनातन में अनंग त्रयोदशी नाम का एक व्रत उत्सव भी है, जो जीवन में प्रेम संबंधों में गहराई पाने के लिए किया जाने वाला व्रत है.
प्रेम का व्रत है अनंग त्रयोदशी
मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को अनंग त्रयोदशी कहते हैं. अनंग कामदेव का ही एक नाम है. यह नाम उन्हें तब मिला जब शिव ने उनके शरीर को भस्म कर दिया था, लेकिन अमृत के कारण उनकी मृत्यु नहीं हुई थी. तब कामदेव ने कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लिया था और दोबारा शरीर पाया. कृष्ण खुद प्रेम के ही ईश्वर हैं और कामदेव उनका पुत्र है, तो इस तरह प्रेम और काम के बीच का जो संबंध है, वह और मजबूती से स्थापित होता है.
स्वामी विवेकानंद ने प्रेम को कैसे देखा था?
भारत में महान और युवा दार्शनिक रहे स्वामी विवेकानंद, जिन्होंने सनातन की पहचान सारी विश्व से कराई. प्रेम उनके लिए भी सबसे दिव्य था और वह यह मानते थे कि प्रेम की भावना ही आपको सफलता की राह पर ले जा सकती है. विवेकानंद के लिए भी पहले-पहल प्रेम में कामेच्छा की मिलावट गलत ही थी और शायद रहती भी, लेकिन यह धारणा उस दिन टूट गई, जब उनका एक वैश्या से सामना हुआ. एक राजा ने स्वामी विवेकानंद के स्वागत में कोई कसर न छोड़ी. हर सुविधा के साथ ही सौंदर्य बोध के लिए शहर की सबसे सुंदर नर्तकियों और वैश्याओं को भी बुलवा लिया. विवेकानंद ने ये देखा तो खुद को कमरे में बंद कर लिया और नाराज हो गए.
वह राजा को भी डांट रहे थे. उनके क्रोधित स्वर जब वैश्या के कानों में पड़े तो उसने अपना गीत गाना शुरू किया. जिसका अर्थ था, 'मुझे मालूम है कि मैं तुम्हारे योग्य नहीं, लेकिन तुम तो दयालु हो सकते थे. मुझे पता है कि मैं राह की धूल हूं लेकिन तुम्हें तो मेरे लिए प्रतिरोधी नहीं होना चाहिए था. मैं कुछ नहीं हूं. मैं अज्ञानी हूं, पापी हूं लेकिन तुम तो संत हो फिर तुम मुझसे क्यों भयभीत हो गए?' विवेकानंद ने जब यह सुना तो वह तुरंत बाहर आ गए और वैश्या को भी अपना गुरु माना, क्योंकि जीवन में प्रेम का असली ज्ञान तो उन्होंने उसी से पाया था.
कहने का अर्थ है कि प्रेम वो भावना है, जिसके बिना न तो सृष्टि की शुरुआत में बिगबैंग का महाविस्फोट हुआ होगा और न ही कोई सभ्यता अपनी जड़ें जमा पाई होंगीं. आग की खोज, पहिये का आविष्कार, कपड़ों की बुनाई की पीछे की वजह प्रेम ही रही होगी.दीवार पर भित्तियां भी प्रेम की वजह से बनी होंगी. खेती की शुरुआत ऐसे हुई होगी कि किसी ने प्रेम में पीठ पर फिरा दी होंगी उंगलियां और फिर भूमि को कुरेदकर बीज बोने का ख्याल आया होगा. ईश्वर का अस्तित्व भी तब आया होगा जब मनुष्य ने प्रेम के पहचान लिया होगा और फिर उसे ही दिया होगा ईश्वर का दर्जा. इसीलिए तो ईश्वर हो या प्रेम दोनों ही शाश्वत हैं और सनातन पूरी आवाज में सत्यम, शिवम् सुंदरम् का घोष कर पाया है.