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Pitru Paksha 2024: पितृपक्ष में षष्ठी और सप्तमी तिथि का श्राद्ध आज, जानें श्राद्धकर्म की विधि और नियम

Pitru Paksha 2024: पितृपक्ष में छठे दिन उन पूर्वजों या पितरों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु हिंदू पंचांग के अनुसार षष्ठी तिथि को होती है. जबकि सप्तमी तिथि पर उन पितरों का श्राद्ध होता है, जिनकी मृत्यु सप्तमी तिथि के दिन होती है.

घर का वरिष्ठ पुरुष सदस्य नित्य तर्पण कर सकता है. उसके अभाव में घर का कोई अन्य पुरुष भी श्राद्ध कर सकता है. घर का वरिष्ठ पुरुष सदस्य नित्य तर्पण कर सकता है. उसके अभाव में घर का कोई अन्य पुरुष भी श्राद्ध कर सकता है.
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 23 सितंबर 2024,
  • अपडेटेड 6:00 AM IST

Pitru Paksha 2024: आज पितृपक्ष का छठा दिन है. लेकिन आज षष्ठी और सप्तमी दोनों तिथियों के श्राद्ध किए जाएंगे. पितृपक्ष में छठे दिन उन पितरों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु हिंदू पंचांग के अनुसार षष्ठी तिथि को होती है. साथ ही, आज सप्तमी तिथि पर मृत्यु को प्राप्त होने वाले पूर्वजों का भी श्राद्ध किया जाएगा. ऐसी मान्यता है कि पितरों का विधिवत श्राद्ध और पिंडदान करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है. पितरों का तर्पण करने के बाद गरीब ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है और दान-दक्षिण दी जाती है. आइए आपको षष्ठी तिथि की श्राद्ध विधि और नियम बताते हैं.

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षष्ठी और सप्तमी तिथि पर कैसे करें श्राद्ध?
सबसे पहले सुबह स्नानादि के बाद साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें और अपने तन-मन को पवित्र बनाए रखें. फिर देवी-देवताओं, ऋषियों और पितरों के नाम का उच्चारण करके श्राद्ध करने का संकल्प लें. श्राद्ध की प्रक्रिया में सर्वप्रथम चावल के पिंड बनाकर पितरों को अर्पित किए जाते हैं. इसके बाद इन पिंडों को जल में प्रवाहित किया जाता है या फिर ब्राह्मणों को दिया जाता है.

इसके बाद जल में तिल, चावल, और कुशा डालकर पूर्वजों को अर्पित किया जाता है. तर्पण करने का उद्देश्य पितरों को तृप्त करना होता है. श्राद्ध के दिन पूजा, मंत्रोच्चार और हवन किया जाता है. इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना और उन्हें दान देना अनिवार्य माना जाता है. पितरों के नाम पर अन्न, वस्त्र और दान-दक्षिणा दी जाती है. कहते हैं कि श्राद्धकर्म करने वाले व्यक्ति को पर हमेशा पितरों का आशीर्वाद बना रहता है.

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परिवार में कौन कर सकता है श्राद्ध?
घर का वरिष्ठ पुरुष सदस्य नित्य तर्पण कर सकता है. उसके अभाव में घर का कोई अन्य पुरुष भी श्राद्ध कर सकता है. पौत्र और नाती को भी तर्पण और श्राद्ध करने का अधिकार होता है. वर्तमान में स्त्रियां भी तर्पण और श्राद्ध कर सकती हैं. इस अवधि में दोनों वेला स्नान करके पितरों को याद करना चाहिए. कुतप वेला में पितरों को तर्पण दें. इसी वेला में तर्पण का विशेष महत्व है.

किस समय करना चाहिए श्राद्धकर्म 
शास्त्रों के अनुसार, पितृपक्ष में सुबह और शाम के समय देवी-देवताओं की पूजा होती है. जबकि दोपहर का समय पितरों को समर्पित होता है. इसलिए पितरों का श्राद्ध दोपहर के समय करना ही उत्तम होता है. पितृपक्ष में आप किसी भी तिथि पर दोपहर 12 बजे के बाद श्राद्धकर्म कर सकते हैं. इसके लिए कुतुप और रौहिण मुहूर्त सबसे अच्छे माने जाते हैं. इस दौरान पितरों का तर्पण करें. गरीब ब्राह्मणों को भोज कराएं. उन्हें दान-दक्षिणा दें. श्राद्ध के दिन कौवे, चींटी, गाय, कुत्ते को भोग लगाएं.

पितृपक्ष के जरूरी नियम
पितृपक्ष में श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को केवल एक वेला सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए, पितृपक्ष में सात्विक आहार खाएं, प्याज लहसुन, मांस मदिरा से परहेज करें. जहां तक संभव हो दूध का प्रयोग कम से कम करें. पितरों को हल्की सुगंध वाले सफेद पुष्प अर्पित करने चाहिए. तीखी सुगंध वाले फूल वर्जित हैं. दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को तर्पण और पिंड दान करना चाहिए.

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