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साइंस न्यूज़

कोरोना ने जो साफ हवा दी थी, उसे भूल जाइए... आप फिर सांसों में भरेंगे जहर

aajtak.in
  • ग्लासगो,
  • 09 नवंबर 2021,
  • अपडेटेड 6:32 PM IST
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कोरोना काल में दो-तीन बार खबरें आईं कि हवा साफ है. प्रदूषण नहीं है. मैदानी इलाकों से माउंट एवरेस्ट और हिमालय दिख रहा है. बस ये दर्दनाक महामारी में ये इकलौता ऐसा क्षण था, जो किसी दिन के सपने की तरह अब फिर टूट गया. अब आप भूल जाइए कि आपको फिर साफ-सुथरी हवा मिलेगी. शुरुआत आपने दिवाली की रात देख ही ली. अब आप खुद अपनी सांसों में जहर भरेंगे.  वैज्ञानिक सोच रहे हैं कि क्या फिर से देश की सरकारों को लॉकडाउन जैसी व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि प्रदूषण से मुक्ति मिल सके?  (फोटोः गेटी)

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आपने ध्यान दिया होगा कि कोविड-19 महामारी के समय कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन में भारी कमी आई थी. वजह थी दुनियाभर के देशों द्वारा सख्ती से लॉकडाउन का पालन करवाना. लेकिन उन दोनों लॉकडाउन की वजह से पर्यावरण की जो सफाई हुई थी, उसका असर इस साल के अंत तक ही रहने वाला है. इसी हफ्ते दुनियाभर के दिग्गज वैज्ञानिकों ने यह अंदेशा जताया है. इसमें कहा गया है कि साल 2021 में पिछले साल की तुलना में 4.9 फीसदी कार्बन उत्सर्जन ज्यादा हुआ. यानी 36.4 बिलियन टन जीवाश्म ईंधन जलाया गया.  (फोटोः गेटी)

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यह इसलिए हुआ क्योंकि दुनियाभर के देशों कोयले की मांग तेजी से बढ़ी. चीन और भारत दुनिया को कोयले की सबसे ज्यादा सप्लाई करते हैं. कोयले के तेजी से उत्पादन और उपयोग की वजह से कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा तेजी से बढ़ी. अगले साल यह मात्रा और ज्यादा बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट के सदस्य और यूके के नॉरविच स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंगलिया की क्लाइमेट साइंटिस्ट कॉरीन लेक्वेयर ने कहा कि महामारी के बाद प्रदूषण का बढ़ना एक रियलिटी चेक है.  (फोटोः गेटी)

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कॉरीन लेक्वेयर और उनके साथियों ने मिलकर ग्लासगो में हुए COP26 क्लाइमेट समिट में इस बारे में एक रिपोर्ट भी प्रस्तुत की थी. इस समिट में कई देशों ने वादा किया है कि वो कार्बन उत्सर्जन और ग्रीनहाउस गैसों में कमी लाएंगे. लेकिन कैसे और कब तक यह किसी भी देश ने स्पष्ट तौर पर नहीं बताया है. कॉरीन ने कहा कि हमनें कई देशों के प्रतिनिधियों से बात की, उन्हें समझाने की कोशिश की जो वादा आप कर रहे हैं, उन्हें जल्दी करने की जरूरत है. नहीं तो लॉकडाउन पीरियड में मिली साफ हवा हमें अब फिर इस जीवन में तो नहीं मिलने वाली है.  (फोटोः गेटी)

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इस रिपोर्ट में कॉरीन की टीम की सदस्य और जर्मनी स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूनिख की जियोग्राफर जूलिया पॉन्ग्रेट्ज ने कहा कि कैसे लैंड यूज बदलाव से कार्बन उत्सर्जन में बढ़ोतरी हो रही है. कई देशों में यह स्पष्ट नहीं है कि किसी जगह जंगल उगाए जाएंगे. लेकिन अभी इन देशों के फैसलों और वादों पर किसी तरह का जजमेंट देना जल्दबाजी होगी क्योंकि हमें थोड़ा समय देना चाहिए ताकि इनके द्वारा किए गए सही कामों को देखा जा सके.  (फोटोः गेटी)

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महामारी शुरु हुई दिसंबर 2019 में. साल 2020 में साल 2019 की तुलना में 5.4 फीसदी कम कार्बन उतसर्जन हुआ. क्योंकि रेस्टोरेंट्स बंद थे, होटल्स बंद थे. फैक्ट्री पर ताला लगा था. इंडस्ट्रीज सन्नाटे में थीं. विमान ग्राउंडेड थे. सीमाएं बंद थी. लोगों का आना-जाना बंद था. ऐसे में प्रदूषण का स्तर कम होना तय था. ये प्रदूषण साल 2021 की फरवरी तक लगभग इसी स्तर पर था. लेकिन जैसे ही दूसरे लॉकडाउन से राहत मिलते ही दुनिया भर में प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ने लगा.  (फोटोः गेटी)

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यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के अर्थ सिस्टम साइंटिस्ट स्टीवन डेविस ने कहा कि हम वापस अपने काम पर लौट रहे हैं, ऐसे में हमें चाहिए कि किसी भी तरह से जीवाश्म ईंधन का उपयोग कम करें. महामारी में तेल की खपत कम थी. सड़कों, पानी और हवाई यातायात बंद था. लेकिन जैसे-जैसे देशों से लॉकडाउन हटता जाएगा, दुनियाभर में प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ेगा. इससे समस्या खत्म होने वाली नहीं है. ये अगले साल के शुरुआत से ही बढ़ने लगेगा.  (फोटोः गेटी)

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ग्लासगो में हुए COP26 यानी यूएन क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीस में राष्ट्रीय, कॉर्पोरेट और वैश्विक स्तर पर कई कसमें खाई गई हैं. वादे किये गए हैं. जैसे भारत ने कहा कि वह साल 2070 तक नेट जीरो एमिशन का लक्ष्य हासिल कर लेगा. इस काम के लिए उसने कई मील के पत्थर स्थापित किए हैं. 105 देशों ने कहा कि वो मीथेन गैस का उत्सर्जन तेजी से कम करेंगे. कार्बन डाईऑक्साइड के बाद मीथेन दूसरी ऐसी ग्रीनहाउस गैस है, जिसकी वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग तेजी से बढ़ रहा है. इसके अलावा 130 देशों ने कसम खाई है कि वो 2030 के बाद जंगलों की कटाई हर हाल में बंद कर देंगे.  (फोटोः गेटी)
 

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दुनिया में सबसे ज्यादा ग्रीनहाउस गैस अमेरिका, यूरोपीय देश, भारत और चीन निकालते हैं. इन्हीं देशों में सबसे ज्यादा प्रदूषण होता है. कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान प्रदूषण का स्तर तेजी से कम हुआ था. लेकिन दूसरे लॉकडाउन के बाद इन देशों में प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ा है. भारत में तो दिवाली की रात से प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा तेजी से ऊपर गया. दुनिया में सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले देश चीन में कोयले की खपत में कोरोनाकाल की तुलना में ज्यादा इजाफा हुआ है.  (फोटोः गेटी)

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चीन में इस साल कार्बन उत्सर्जन 4 फीसदी बढ़ने की आशंका है. यानी 11.1 बिलियन टन. जो की कोरोना काल से पहले के स्तर से 5.5 फीसदी ज्यादा पहुंच जाएगा. लेकिन सभी जगहों से बुरी खबरें नहीं आ रही है. दुनिया में करीब 23 देश ऐसे हैं जहां पर कार्बन उत्सर्जन कम हुआ है. कम है. इन 23 देशों में मिलाकर दुनिया के कार्बन उत्सर्जन का सिर्फ एक चौथाई एमिशन होता है. यानी ये सारे चाहे तो इसे और कम कर सकते हैं. (फोटोः गेटी)

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