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साइंस न्यूज़

50 सालों में होगी 15 हजार नए वायरसों की स्वैपिंग, भारत में भी बढ़ेगा खतरा...नई स्टडी

aajtak.in
  • लंदन,
  • 02 मई 2022,
  • अपडेटेड 4:44 PM IST
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अगले 50 साल के अंदर स्तनधारियों से दूसरे स्तनधारियों के बीच वायरस की अदला-बदली के 15 हजार मामले सामने आ सकते हैं. इसकी वजह क्या होगी... जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और वैश्विक गर्मी (Global Warming). यह स्टडी बता रही है कि कैसे वैश्विक गर्मी की वजह से वाइल्डलाइफ हैबिटेट में बदलाव आएगा. जानवरों का आपस में एनकाउंटर बढ़ेगा. एकदूसरे के वायरस इधर से उधर होंगे. जिसका नुकसान इंसानों को भी बर्दाश्त करना होगा. (फोटोः पिक्साबे)

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दुनियाभर के कई रिसर्चर्स का ये मानना है कि कोविड-19 महामारी ने शायद वायरस की स्वैपिंग यानी अदला-बदली का काम शुरु कर दिया है. क्योंकि यह एक जानवर से इंसान में आया. जिसे जूनोटिक ट्रांसमिशन (Zoonotic Transmission) कहते हैं. अगर इसी तरह से वायरस एक जीव या प्रजाति से दूसरी जीव या प्रजाति में जाता रहा तो वायरसों से होने वाली महामारियों की सीरीज लगी रही हैं. यह इंसानों और जानवरों के लिए खतरा है. (फोटोः पिक्साबे)

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इस स्टडी में यह भी चेताया गया है कि सरकारों और स्वास्थ्य संगठनों को किस तरह के काम करने होंगे ताकि पैथोजेन के हमले से बचा जा सके. हेल्थ-केयर इंफ्रास्ट्रक्चर को कैसे सुधारा जाए. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की साइंटिस्ट केट जोन्स जिन्होंने इकोसिस्टम और ह्यूमन हेल्थ के बीच के संबंधों पर स्टडी की है, उन्होंने बताया कि हमनें अभी पहला कदम रखा है यह जानने के लिए कि क्या क्लाइमेट और लैंड-यूज बदलने से अगली महामारी जल्दी आ सकती है. (फोटोः पिक्साबे)

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शोधकर्ताओं को आशंका है कि नए वायरसों की अदला-बदली ज्यादा तब होगी जब दुनियाभर में स्थानीय स्तर पर एक जानवर दूसरे किसी अन्य जानवर से पहली बार मिलेगा. क्योंकि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है, लगातार बढ़ता तापमान. सबसे ज्यादा समस्या जीवों की विभिन्नता वाले देशों में, जैसे- अफ्रीका और एशिया. अफ्रीका के साहेल इलाके, भारत और इंडोनेशिया में वायरसों की अदला-बदली ज्यादा होगी. क्योंकि यहां पर संक्रमण फैलने की वजह आबादी का घनत्व भी है. (फोटोः पिक्साबे)

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इस सदी के अंत तक धरती का औसत तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ने की आशंका थी लेकिन नई स्टडीज के मुताबिक यह 2070 तक दोगुनी हो जाएगी. इसकी वजह से भारत, इंडोनेशिया, एशियाई और अफ्रीकी देशों में वायरस की अदला-बदली होने की आशंका बढ़ जाएगी. ये स्थान इस मामले में हॉटस्पॉट बन जाएंगे. (फोटोः पिक्साबे)

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वैज्ञानिकों ने इस स्टडी के लिए खास तरह का मॉडल बनाया. जिसमें पता किया गया कि जब धरती चार डिग्री सेल्सियस ज्यादा तापमान के साथ गर्म होगी, तो कौन-कौन से स्तनधारी जीव कहां-कहां से भागेंगे. कहां-कहां इनका दूसरे जीवों से सामना होगा. इससे यह पता चला कि इन जीवों में मौजूद वायरस दूसरे स्तनधारियों तक जाएंगे. फिर ये इंसानों में भी फैलेंगे. (फोटोः पिक्साबे)

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स्पेन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ अल्काला के ग्लोबल चेंज इकोलॉजिस्ट इग्नासियो मोरेल्स कास्टिला ने कहा कि यह मॉडलिंग तकनीकी रूप से त्रुटिहीन है. अगर इसी तरह की परिस्थितियां बनती हैं, तो इसमें कोई शक नहीं है कि एक जीव का वायरस दूसरे जीव को संक्रमित करेगा. इसमें जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग ज्यादा असर डालेगा. यह पूरी इंसानियत और धरती पर मौजूद अन्य जीवों के लिए बड़ा खतरा होगा. (फोटोः पिक्साबे)

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केट जोन्स कहती हैं कि स्तनधारी जीवों से इंसानों में वायरस के आने की भविष्यवाणी बेहद जटिल है. लेकिन जब इतने बड़े इलाके में वायरस के फैलने की आशंका जताई जाती है, तो यह बात तय हो जाती है कि इंसान इसके चपेटे में आएगा ही. इससे इंसान के सामाजिक-आर्थिक-पर्यावरण पर भी असर पड़ेगा. सिर्फ वायरस ही नहीं, उससे जुड़े और उसे बढ़ाने वाली वजहें भी इंसानों के लिए नुकसानदेह साबित होंगी.  (फोटोः पिक्साबे)

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जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी की ग्लोबल चेंज बायोलॉजिस्ट कोलिन कार्लसन ने कहा कि बीमारियों का फैलना रोका नहीं जा सकता. इसे लेकर कोई देश, समुदाय या स्थानीय इलाका बहाने नहीं बना सकता. बस वह इतना कर सकता है कि समय रहते देश और दुनिया को वायरस के फैलने की सूचना सही समय पर दे दे. क्योंकि लाखों प्रयासों के बाद भी ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन को रोकना आसान नहीं होगा. (फोटोः पिक्साबे)

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