आर्कटिक और अंटार्कटिका दोनों को छोड़ दें तो इंसानों ने धरती (Earth) को 12 हजार साल पहले से ही बिगाड़ना शुरू कर दिया था. इस बात का खुलासा एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की स्टडी में हुआ है. इससे एक बात तो खत्म हो गई कि औद्योगिक आंदोलन के समय से इंसानों ने धरती को नुकसान पहुंचाया है. हालांकि, 12 हजार साल पहले जिस तरह के परिवर्तन किए गए थे, उसमें प्रदूषण की मात्रा कम थी. जो आज बहुत ज्यादा है. आइए जानते हैं कि इंसानों ने धरती को 12 हजार साल पहले कैसे नुकसान पहुंचाया या बदलाव किए. जिसका नतीजा आज हम भुगत रहे हैं. (फोटोःगेटी)
यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के प्रोफेसर एरली एलिस ने बताया कि हमने धरती के लैंड यूज का एक मॉडल बनाया. इस प्रोजेक्ट में छह देशों के 10 संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल हुए. स्टडी करने के बाद पता चला कि 500 साल पहले से धरती को नुकसान नहीं पहुंच रहा है. ये प्रक्रिया करीब 12 हजार साल पहले शुरू हो चुकी थी. (फोटोःगेटी)
प्रोफेसर एरली एलिस ने बताया कि इंसानों ने बर्फीली जगहों को छोड़कर धरती के ज्यादातर हिस्से पर अपना कब्जा शुरू कर दिया था. खाने और रहने के लिए खेत, फसलें और मांस चाहिए था. इसलिए जहां जमीन दिखी वहां खेत बना दिए. इसके लिए जंगल भी काटे गए. जानवरों का शिकार किया गया. इतना ही नहीं जंगलों में आग लगाने की परंपरा भी लगभग उसी समय से शुरू हुई थी. (फोटोःगेटी)
उस समय के इंसान या उनके पूर्वज व्यापक पैमाने पर शिकार करते थे. एक समान के बदले बीजों का लेनदेन करते थे. ये शुरुआत में ही दिखने लगा था कि इंसान इस धरती को अपने रहने के लिए धीरे-धीरे करके नरक बनाते चले जाएंगे. अलग-अलग जमीन के टुकड़ों (देश) पर अलग-अलग जातियों और समुदायों के इंसान या उनके पूर्वज रहते थे. उन्होंने अपने हिसाब से उस जगह के ईकोसिस्टम यानी पारिस्थितिकी तंत्र को बदलना शुरू कर दिया था. (फोटोःगेटी)
ज्यादा उत्पादन और ज्यादा पाने की चाहत में धरती के पर्यावरण, पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव किया जाता रहा. प्रोफसर एरली ने बताया कि पिछले हफ्ते जब हमारी यह स्टडी पूरी हुई तो हमें पता चला कि धरती का 97 फीसदी हिस्सा इंसानों के द्वारा अशांत है. हमारे 12 हजार साल पुराने मॉडल से भी यह पता लगता है कि उस समय भी धरती के जमीन का तीन चौथाई हिस्सा इंसानों के उपयोग में आ रहा था. (फोटोःगेटी)
प्रोफेसर एरली ने बताया कि जिन इलाकों में आज भी इंसान नहीं रहते, उस समय भी नहीं रहते थे. इन मॉडल्स से पता लगता है कि धरती में समय-समय पर इंसानों द्वारा कैसे-कैसे बदलाव किए गए हैं. एरली एलिस और उनकी टीम की यह स्टडी प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित हुई है. (फोटोःगेटी)
प्रोफसर एरली ने बताया कि 12 हजार साल पहले एक ही चीज अच्छी थी. वो ये कि इंसानों ने प्रदूषण कम फैलाया था. उन्होंने पर्यावरण को उस तरह से नुकसान नहीं पहुंचाया जैसा कि आज के इंसान पहुंचा रहे हैं. मैक्स प्लैंक्स इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर निकोल बोल्विन ने कहा कि हम आज के औद्योगिक दौर में जिस तरह के जमीनों का उपयोग देख रहे हैं, उसमें खेती की ऐसी जमीनें हैं जो लगातार उपयोग में नहीं लाई जा सकती. बेवजह के खनन और जमीन के साथ छेड़छाड़ हो रहे हैं. (फोटोःगेटी)
निकोल ने बताया कि इस समय धरती पर जैव-विविधता का सबसे बड़ा संकट है वो इलाके जहां पहले लोग रहते थे, लेकिन अब किसी वजह से नहीं रह रहे हैं. रूस, अमेरिका, यूक्रेन जैसे देशों में कई शहर और कस्बे ऐसे हैं जो अब भुतहे हो गए हैं. खाली पड़े हैं. क्योंकि इंसानों ने पहले वहां घर बनाया फिर कुछ ऐसा किया जिससे वहां रहने लायक स्थितियां ही नहीं बची. (फोटोःगेटी)
एरली ने बताया कि उनकी स्टडी में ये बात सामने आई कि 12 हजार साल पहले एक देश हुआ करता था गोबेकली तेपे. इसे आज तुर्की कहते हैं. यहां पर ऐसे शहर और कस्बों के अवशेष मिले हैं जो 12 हजार साल पहले थे. जबकि, 12 हजार साल से पहले यहां पर जंगल थे. आज ये इलाका पूरा सूखा है. यहां पर जंगल जैसी कोई चीज नहीं है. (फोटोःगेटी)
निकोल और एरली एकसाथ इस बात पर जोर देते हैं कि इंसानों ने जो दर्द और जख्म धरती को दिए हैं, उसे वापस ठीक किया जा सकता है. उसे पलटा जा सकता है. हमें धरती की जैव-विविधता, पर्यावरण, पारिस्थितिकी तंत्र को वापस सुधारना होगा. उन लोगों को बढ़ावा देना होगा जो किसी भी स्थान में प्राचीन समय से रह रहे हैं. उनकी परंपराओं को समझना होगा. उनका प्रकृति के प्रति प्यार समझना होगा. (फोटोःगेटी)