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साइंस न्यूज़

Chamoli Disaster: क्या मौसम की वजह से हो सकता है चमोली जैसा हादसा? IIT's की स्टडी

ऋचीक मिश्रा
  • रूड़की/नई दिल्ली,
  • 11 फरवरी 2022,
  • अपडेटेड 1:23 PM IST
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ये बात है 7 फरवरी 2021 की, जब चमोली की धौलीगंगा नदी के ठीक ऊपर हिमस्खलन हुआ. पत्थर टूटकर ग्लेशियर पर गिरा. ग्लेशियर के नीचे बनी प्राकृतिक झील की दीवार टूटी और धौलीगंगा, ऋषिगंगा और अलकनंदा में अचानक बाढ़ आई. हादसे में 200 लोगों की जान चली गई. इस हादसे की एक वजह थी वहां का मौसम बदलना. IIT रुड़की के सेंटर ऑफ एक्सीलेंट इन डिजास्टर मिटिगेशन एंड मैनेजमेंट और IIT दिल्ली के सेंटर फॉर एटमॉस्फियरिक साइंसेस के वैज्ञानिकों ने चमोली हादसे से पहले हुए मौसमी बदलाव की स्टडी की. (फोटोः एटमॉस्फियर जर्नल)

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aajtak.in से खास बातचीत में IIT रुड़की के शोधकर्ता प्रवीण कुमार सिंह ने बताया कि चमोली रॉक-आइस एवलांच (Chamoli Rock-Ice Avalanche) से तीन दिन पहले ही रोंटी पीक (Ronti Peak) के ऊपर और आसपास के इलाके में मौसम में तेजी से बदलाव आया था. हवा का तापमान, सतह का तापमान तेजी से गिरा था. 4 फरवरी को बारिश हुई थी. 7 फरवरी की घटना से ठीक 48 घंटे पहले पीक के ऊपर का वायुमंडल और सतह का तापमान औसत से 8.5 डिग्री सेल्सियस नीचे गिर गया था. जबकि इससे पहले के दिनों में सामान्य था. (फोटोः एटमॉस्फियर जर्नल)

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2-मीटर एयर टेंपरेचर में इसी तरह का गिरा हुआ तापमान देखने को मिला था. पहाड़ के ऊपर की हवाएं आम दिनों की तुलना में 13 डिग्री सेल्सियस ठंडी थी. इतना ही नहीं बारिश और ग्लोबल प्रेसिपिटेशन मॉडल से पता चला कि घटना से दो दिन पहले इस इलाके में काफी अच्छी बारिश हुई थी. जबकि मौसम बदलने के तीन दिन से पहले और घटना के बाद के दिन सामान्य और सूखे थे. (फोटोः एटमॉस्फियर जर्नल)

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हादसे की जगह यानी रोंटी पीक (Ronti Peak) के आसपास पहले ठंड का बढ़ना यानी तापमान का गिरना, बारिश होना और उसके बाद गर्म होना यह कोई स्थानीय मौसम का असर नहीं था. बल्कि यह हिमालय के ऊंचाई वाले काफी बड़े इलाके में दर्ज किया गया था. वैज्ञानिकों ने मौसम की इस स्थिति का विश्लेषण ECMWF ERA5 डेटासेट से किया है. (फोटोः एटमॉस्फियर जर्नल)

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प्रवीण सिंह कहते हैं कि हमारी स्टडी में यह बात सामने आई है कि चमोली रॉक-आइस एवलांच (Chamoli Rock-Ice Avalanche) से पहले अचानक से मौसम का ठंडा होना, तेज बारिश और उत्तर-पश्चिम की तरफ बहने वाली तेज हवाओं ने इस घटना को बढ़ावा दिया. मौसम का बदलना चमोली हादसे की एक प्रमुख वजह थी. जिस पर किसी ने इतना ध्यान नहीं दिया. यह स्टडी प्रवीण कुमार सिंह, पीयूष श्रीवास्तव और प्रभाकर नामदेव ने मिलकर की है. यह स्टडी जर्नल Atmosphere में हाल ही में प्रकाशित हुई है.  (फोटोः एटमॉस्फियर जर्नल)

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इससे पहले भी एक ऐसी ही स्टडी आई थी. जिसमें बताया गया था कि हादसे की वजह क्या थी. इस स्टडी में स्पष्ट तौर पर बताया गया था कि चमोली हादसे की शुरुआत रोंटी पीक (Ronti Peak) से हुई थी. यहां पर करीब आधा किलोमीटर चौड़े पत्थर, जिसके ऊपर भारी मात्रा में बर्फ जमी थी, वह टूटकर नीचे गिरा. 1 जनवरी 2021 को ली गई सैटेलाइट तस्वीर में रोंटी पीक के ऊपरी हिस्से में एक छोटी दरार दिखती है. 5 फरवरी 2021 तक यह दरार बड़ी हो जाती है. 7 फरवरी को इस दरार से 500 मीटर चौड़ा एक पत्थर जिसके ऊपर बड़ी मात्रा में बर्फ लदा था, वह टूट गया. 10 फरवरी को आप रोंटी पीक के ऊपरी हिस्से में बड़े तिकोन पत्थर और बर्फ की मोटी चादर को गायब देख सकते हैं. (फोटोः AAAS)

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वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में बताया कि रोंटी पीक पर जो पत्थर टूटा, उसपर भारी मात्रा में बर्फ जमा थी. जिसका वजन वह सह नहीं पा रहा था. इस दौरान हिमालय रेंजेंस में आने वाले छोटे-मोटे भूकंपों की वजह से पत्थर में दरार आ गई. हिमालय पर नुकीलीं चोटियां, गहरी खाइयां, भूकंपीय गतिविधियां, लगातार बदलते मौसम आदि बेहद खतरनाक होते हैं. इसके अलावा हिमालय पर लगातार बढ़ रही इंसानी गतिविधियों से क्रायोस्फेयर यानी बर्फ की चादरों वाले इलाके खतरनाक होते जा रहे हैं. हिमालय पर बन रहे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, लगातार बढ़ती ऊर्जा की मांग, आर्थिक विकास और लो-कार्बन सोसाइटी की ओर जाने के प्रयासों से नुकसान हो रहा है. (फोटोः AAAS)

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7 फरवरी 2021 को 6063 मीटर ऊंचे रोंटी पीक से बड़ा पत्थर टूटा. यह पत्थर 5500 मीटर नीचे स्थित रोंटी गैड यानी छोटी सी नदी की शाखा से टकराई. यह शाखा जमीन से 1800 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद है. टक्कर इतनी जोर की थी कि इससे दो बार भूंकप महसूस हुआ. पहला 4 बजकर 51 मिनट 13 सेकेंड पर और दूसरा 4 बजकर 51 मिनट 21 सेकेंड पर. उसके बाद हिमस्खलन हुआ क्योंकि वहां पर बहुत ज्यादा बर्फ थी. ये सारे तेजी से नीचे आए तो ऋषिगंगा और धौलीगंगा में अचानक से बाढ़ आ गई. इन दोनों नदियों में स्थित हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट पूरी तरह से बर्बाद हो गए. (फोटोः AAAS)

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रोंटी पीक की ऊंचाई से नीचे गिरने वाले पत्थर और हिमस्खलन की गति 205 से 216 किलोमीटर प्रतिघंटा थी. क्योंकि वहां पर रोंटी पीक का कोण 35 डिग्री है. वैज्ञानिकों ने इसे समझने के लिए डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) बनाया. इससे ही पता चला कि रोंटी पीक पर दरार आने की वजह से पत्थर टूटा. इसके ऊपर करीब 80 मीटर ऊंची बर्फ जमा थी. पत्थर के इस टुकड़े की चौड़ाई करीब 550 मीटर थी. अब आप ही सोचिए एक आधा किलोमीटर चौड़ा पत्थर और उसके ऊपर जमा 80 मीटर ऊंची बर्फ की परत 5500 मीटर की ऊंचाई से गिरेंगे तो वो क्या तबाही मचाएंगे? (फोटोः AAAS)

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वैज्ञानिकों ने ऑप्टिकल फीचर ट्रैकिंग से पता किया कि आखिरकार यह पत्थर इतनी आसानी से तो टूटा नहीं होगा. तो पता चला कि इस पत्थर में साल 2016 से ही दरार आने लगी थी. यह अपनी जड़ों से हिलना शुरु कर चुका था. साल 2017 और 18 की गर्मियों में इसमें ज्यादा मूवमेंट हुआ. इसकी वजह से पत्थर के ऊपर जमा ग्लेशियर पर 80 मीटर चौड़ी दरार आ गई. ऊपर से मलबा गिरा उसमें 80 फीसदी पत्थर और 20 फीसदी बर्फ थी. जब यह नदियों में मिले तो ये टूटे. कई पत्थर तो 20 फीट चौड़े थे. इनके साथ बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े भी थे. (फोटोः AAAS)

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वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने बताया कि अचानक हुए इस हादसे में जो मलबा (बारीक कीचड़, पानी, बर्फ, पत्थर, लकड़िया और पेड़) आया, उसने ऋषिगंगा और धौलीगंगा नदी के संगम पर बहाव को रोक दिया. वहां एक बॉटलनेक बन गया. इससे करीब वहां पर 150 से 200 मीटर ऊंचा मलबा जमा होता गया. लेकिन यह ज्यादा देर टिक नहीं पाया. ऊपर से आ रहे मलबे के दबाव की वजह से यह टूट गया और धौलीगंगा के उत्तरी किनारे पर स्थित मंदिर को ध्वस्त कर दिया. (फोटोः AAAS)

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चमोली हादसे का असर 900 किलोमीटर दूर तक देखने को मिला. यानी कानपुर तक गंगा नदी में गंदगी देखने को मिली. दिल्ली वाटर क्वालिटी बोर्ड के एक अधिकारी ने बताया था कि इस हादसे के बाद गंगा का पानी 8 दिनों तक गंदा था. इसकी वजह से 13.2 मेगावॉट का ऋषिगंगा प्रोजेक्ट और 530 मेगावॉट का तपोवन प्रोजेक्ट ठप हो गया. (फोटोः गेटी)

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वैज्ञानिकों ने चमोली हादसे की पहले जो वजह बताई थी उसमें तीन प्रमुख हैं. पहला- ऊंचाई से टूटकर गिरने वाला पत्थर और बर्फ की मोटी चादर, दूसरा- पत्थर और बर्फ का अनुपात, जिसकी वजह से ग्लेशियर पिघली और टूटी, इसकी वजह से ही मलबे में तेज बहाव आया और तीसरा - हाइड्रोपावर स्टेशन की दुर्भाग्यशाली मौजूदगी. लेकिन अब इसमें मौसम में बदलाव को भी जोड़ना होगा. (फोटोः गेटी)

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दुनिया में अब तक सबसे बड़ा इस तरह का हादसा पेरू में 1970 में हुआ था. यहां हुआस्कारन हिमस्खलन हुआ था. यह दुनिया का सबसे बड़ा, खतरनाक और जानलेवा हादसा था. इसमें करीब 6 हजार लोग मारे गए थे. इसके बाद साल 2013 में केदारनाथ में हुए हादसे में 4000 लोग मारे गए. 1894 से 2021 तक उत्तराखंड में मौजूद हिमालय की 16 बड़े हादसे हो चुके हैं. इसमें फ्लैश फ्लड, लैंडस्लाइड यानी भूस्खलन, हिमस्खलन और भूकंप शामिल है. (फोटोः गेटी)
 

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