दुनिया की सबसे ऊंची पहाड़ शृंखला यानी हिमालय अब तक अपनी 60 फीसदी ऊंचाई तक ही पहुंच पाया है. यह लगातार बढ़ रही है. हिमालय बना कब? करीब 4.5 से 5.9 करोड़ साल पहले. कैसे- भारत टेक्टोनिक प्लेट के चीनी टेक्टोनिक प्लेट से टकराने की वजह से. लेकिन अब इसकी ऊंचाई क्यों बढ़ रही है? (सभी फोटोः गेटी/पिक्साबे)
हिमालय की ऊंचाई इस समय इसलिए बढ़ रही है क्योंकि यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट (Eurasian Tectonic Plate) और भारतीय टेक्टोनिक प्लेट (Indian Tectonic Plates) लगातार एकदूसरे पर दबाव डाल रही हैं. टक्कर मार रही हैं. इसी टक्कर और दबाव की वजह से आसपास के इलाकों में लगातार भूकंप आते रहते हैं.
भूकंप भी कभी तेज तो कभी कम तीव्रता के. असल में हिमालय के बनने की प्रक्रिया 6.3 से 6.1 करोड़ साल पहले शुरू हो गई थी. लेकिन जब यूरेशियन प्लेट्स ने भारत की प्लेट को टक्कर मारी तब हिमालय ने अभी हासिल की हुई ऊंचाई का आधा हिस्सा हासिल कर लिया था. यानी सिर्फ भारत और चीन की टक्कर से हिमालय नहीं बने.
ब्राउन यूनिवर्सिटी में अर्थ, एनवायरमेंटल और प्लैनेटरी साइंसेस में असिस्टेंट प्रोफेसर डैनियल एनरिक इबारा ने कहा कि पहले यह माना जाता था कि भारत और यूरेशियन प्लेट यानी दो महाद्वीपों की टक्कर की वजह से ही हिमालय बने थे. इतनी ज्यादा ऊंचाई हासिल की थी. पर 10 अगस्त को नेचर जियोसाइंसेस में प्रकाशित नई स्टडी में नई बात है.
स्टडी के मुताबिक हिमालय ने करीब 60 फीसदी ऊंचाई महाद्वीपों के प्लेट्स के टकराने से पहले हासिल कर ली थी. डैनियल कहते हैं कि हमारी स्टडी हिमालय के आसपास के वातावरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं. साथ ही उसके पुराने वातावरण को समझने के लिए भी. सवाल अन्य पहाड़ शृंखला पर भी उठेंगे.
जैसे- एंडीस और सियेरा नेवादा. ये कैसे बने फिर? स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पेज चैंबरलिन ने कहा की स्टडी बताती है कि दोनों महाद्वीप के टेक्टोनिक प्लेट के किनारे काफी ज्यादा ऊंचे हैं. इनकी ऊंचाई हिमालय के निर्माण के समय हुई टक्कर वाली जगह से करीब 3.5 किलोमीटर ऊपर है.
हिमालय पहाड़ों की औसत ऊंचाई 20 हजार फीट है. जबकि दुनिया का सबसे ऊंचा पहाड़ माउंट एवरेस्ट 29,032 फीट है. वैज्ञानिकों के पास पहाड़ों की ऐतिहासिक ऊंचाई मापने के कई तरीके हैं. इसमें एक तरीका है ट्रिपल ऑक्सीजन एनालिसिस. इसी पद्धत्ति से उल्कापिंडों का अध्ययन किया जाता है.
पहाड़ों के वो ढलान जो हवा की दिशा में होते हैं, उनपर बारिश ज्यादा होती है. इन्हें लीवार्ड स्लोप कहते हैं. बारिश की वजह से पुराने आइसोटोप्स निचले इलाकों में बहकर पहुंच जाते हैं. ऐसे बदलावों का अध्ययन करके किसी भी पत्थर की ऊंचाई का आइडिया लगाया जाता है. इससे पता चला कि 6.2 करोड़ साल पहले हिमालय की औसत ऊंचाई 11,480 फीट थी.
डैनियल ने बताया कि ये जितना सोचा गया था, उससे कहीं ज्यादा ऊंचाई थी. हिमालय की शुरुआती ऊंचाई भारतीय टेक्टोनिक प्लेट के समुद्री हिस्से के दबाव से मिली. उसके बाद ऊपर की सतह जब खिसकी तो उसे और ऊंचाई मिली. यह ऊपरी सतह ही यूरेशियन प्लेट के साथ मिलकर हिमालय को ऊंचाई दे रहा है.
4.5 से 5.9 करोड़ साल पहले भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट की टक्कर की वजह से हिमालय की ऊंचाई में एक किलोमीटर की बढ़ोतरी हुई थी. टेक्टोनिक प्लेटों की ताकत लगातार बढ़ रही है. वो लगातार हिमालय की ऊंचाई को बढ़ा रहे हैं. अगर ऐसे ही दोनों महाद्वीप आपस में टकराते रहे तो ये पहाड़ ऊपर जाते रहेंगे.
इस स्टडी की वजह से कई तरह के मौसमी परिवर्तन की स्टडी की जा सकती है. जिसमें पूर्वी और दक्षिण एशियाई मॉनसून सिस्टम भी शामिल हैं. पुराने मौसमों की स्टडी से नए मौसम की जानकारी का भी अंदाजा मिल जाता है.