ऊपर तस्वीर में जो बड़ी-बड़ी गोल बाहर झांकती हुई आंखों से देखता हुआ जीव आपको दिख रहा है, वो है स्लेंडर लॉरिस (Slender Loris). इसे बचाने के लिए तमिलनाडु सरकार ने करूर और डिंडिगुल जिले (Karur & Dindigul) में 11,806 हेक्टेयर के जंगल को सैंक्चुरी बना दिया है. इस सैंक्चुरी का नाम है कडावुर स्लेंडर लॉरिस सैंक्चुरी (Kadavur Slender Loris Sanctuary). आइए जानते हैं इस प्यारे से रात में घूमने वाले जानवर के बारे में... (फोटोः गेटी)
स्लेंडर लॉरिस सिर्फ भारत और श्रीलंका में ही मिलता है. हालांकि लॉरिस की अन्य प्रजातियां दक्षिण एशियाई देशों में जैसे- मलेशिया, इंडोनेशिया, जकार्ता आदि जगहों पर मिलती हैं. कुछ अफ्रीका में भी मिलती हैं. पर स्लेंडर लॉरिस पतला होता है. यह सिर्फ भारत और श्रीलंका में ही मिलता है. इसकी दो प्रजातियां होती हैं. रेड स्लेंडर लॉरिस (Red Slender Loris) और ग्रे स्लेंडर लॉरिस (Grey Slender Loris). ये अपना ज्यादा समय पेड़ों के ऊपर बिताते हैं. धीमे-धीमे चलते हैं. इसलिए इन्हें स्लो लॉरिस (Slow Lorris) भी बुलाते हैं. (फोटोः ट्विटर/सीएमओ तमिलनाडु)
स्लो लॉरिस के शरीर में एक ताकतवर जहर होता है. जो उसके कुहनियों के पास स्थित ग्लैंड्स से निकलता है. वो अपने शिकार को मारने से पहले ये जहर अपने दांतों पर रगड़ते हैं, उसके बाद शिकार पर हमला करते हैं. अगर जहर वाले दांत के साथ स्लो लॉरिस इंसान को काट ले तो इंसान कुछ देर के लिए कम से कम बेहोश तो हो ही सकता है. यानी जान नहीं जाएगी लेकिन थोड़ी देर के लिए हट्टे-कट्टे इंसान को भी बेहोश कर देगा. (फोटोः गेटी)
स्लेंडर लॉरिस आमतौर पर ट्रॉपिकल रेनफॉरेस्ट, झाड़ियों वाले जंगल और दलदली इलाकों के आसपास मिलते हैं. ये आमतौर पर कीड़े, छिपकलियां, पौधों नए तने और फल खाते हैं. शिकार करना सही समय रात ही होता है. पहले इन्हें लेमूर (Lemur) बंदरों की प्रजाति के साथ शामिल किया जाता था. लेकिन बाद में अलग कर दिया गया. हालांकि यह एक प्राइमेट (Primate) है. लेकिन पूरा बंदर नहीं कह सकते. (फोटोः गेटी)
भारत में स्लेंडर लॉरिस को अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है. तेलुगू में देवांगा पिल्ली या आरावी पापा कहते हैं. तुलू में काडा नारामणि और मराठी में वानर मनुष्य कहते हैं. केरल में कुट्टी थेवांगु कहते हैं. मलयालम में कट्टू पापा कहते हैं. श्रीलंका में इन्हें सिंहाला भाषा में उनआहापुलुवाला बुलाते हैं. स्लेंडर लॉरिस आमतौर पर समुद्र तल से 470 मीटर के ऊपर वाले इलाके में रहते हैं. (फोटोः गेटी)
मादा स्लेंडर लॉरिस अपने एक नर के साथ समय बिताना पसंद करती है. लेकिन नर चाहे तो दूसरी मादा स्लेंडर लॉरिस के पास जा सकता है. ये आमतौर पर समूह में जीवन बिताते हैं. साथ में रहते हैं. अपने बच्चों का ख्याल पूरा समूह रखता है. संबंध बनाने की प्रक्रिया एक छोटी सी प्यार भरी लड़ाई के बाद होती है. नए बच्चे पैदा होने के बाद कुछ हफ्तों तक अपना मां के सामने वाले हिस्से से चिपक कर रहते हैं. (फोटोः गेटी)
तमिलनाडु में इनकी संख्या लगातार घट रही है. स्थानीय लोग यह मानते हैं कि स्लेंडर लॉरिस के पास कोई मेडिकल या मैजिकल पावर है. इसलिए इनका शिकार होता रहा है. इसके अलावा इनकी स्मगलिंग भी होती है. इनके जंगल खत्म हो गए. बिजली का झटका लग गया. सड़क पर एक्सीडेंट हो गया. ICUN ने इस जीव को विलुप्त होते जीवों की लिस्ट में डाल रखा है. इसलिए इनके सरंक्षण के लिए यह सैंक्चुरी बनाई गई है. (फोटोः गेटी)