बृहस्पति ग्रह के बर्फीले चांद यूरोपा पर 'बगीचा' दिखा है. इस बगीचे को देखकर वैज्ञानिकों ने उम्मीद जताई है कि भविष्य में यहां पर जीने लायक माहौल बन सकता है. यानी यहां पर इंसान रह सकते हैं. वैज्ञानिक फिलहाल यह अध्ययन कर रहे हैं कि यूरोपा की बर्फीली जमीन पर बगीचे में उगने वाली झाड़ियों जैसी आकृतियां कैसे उग रही हैं. ये क्या हैं? क्या भविष्य में इनकी वजह से यूरोपा पर जीवन संभव है, अगर हां तो कितने सालों के बाद? (फोटोः नासा)
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने यूरोपा (Europa) पर अंतरिक्ष के कचरों के टकराने की वजह से हुए गड्ढे देखे हैं. यहां पर कई स्थानों पर प्राचीन गड्ढे, घाटियां, दरारें आदि हैं. बृहस्पति ग्रह के बर्फीले चांद पर इन सब चीजों के साथ काफी तीव्र रेडिएशन भी है. लेकिन इसकी ऊपरी ऊबड़-खाबड़ बर्फीली सतह के बीच कुछ गहरे रंग की आकृतियां दिखाई दी हैं, जो किसी बगीचे में उगी झाड़ियों जैसी दिखती हैं. ये ऐसे लगती हैं कि जैसे किसी खुले पहाड़ी इलाके में उगी घास और झाड़ियां. (फोटोः नासा)
नासा की स्टडी में यह बात सामने आई है कि यूरोपा पर कई छोटे-छोटे इम्पैक्ट क्रेटर यानी अंतरिक्ष के कचरों से टकराने की वजह से बने गड्ढे हैं. इसपर यूरोपा क्लिपर मिशन (Europa Clipper) निगरानी रख रहा है. यह एक सैटेलाइट है, जो यूरोपा के चारों तरफ चक्कर लगा रहा है. साथ ही यह भी पता लगा रहा है कि भविष्य में यूरोपा पर लैंडिंग मिशन कहां कराया जा सकता है. यूरोपा की मोटी बर्फीली ऊपरी परत के नीचे नमकीन पानी का बड़ा सागर है. जहां पर जीवन संभव है. (फोटोः नासा)
वैज्ञानिकों को लगता है कि किसी दिन इस पानी को बर्फ की ऊपरी परत से निकल कर बाहर आने का रास्ता मिलेगा, जिसकी वजह से जीवन की उत्पत्ति संभव है. फिलहाल पानी के बाहर आने का सिस्टम इम्पैक्ट गार्डेनिंग (Impact Gardening) नाम की एक प्रक्रिया की वजह से बाधित हो रही है. यह स्टडी 12 जुलाई को नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित हुई है. यूरोपा की सतह पर करोड़ों छोटे गड्ढे हैं, जो करीब 12 इंच गहरे हैं. (फोटोः गेटी)
इन छोटे गड्ढों पर अगर किसी भी तरह के केमिकल बायोसिग्नेचर मिलते हैं तो इसका मतलब ये है कि यहां पर जीवन की उत्पत्ति के रासायनिक सबूत मिल रहे हैं. ये गहराई में जीवन को पैदा कर सकते हैं. अभी की स्थिति ऐसी है कि रेडिएशन की वजह से चीजें टूट जाती हैं. जीवन की उत्पत्ति के लिए जरूरी कणों का विभाजन हो जा रहा है. लेकिन इसी दौरान कुछ जैविक कण गहराई में धकेल दिए जा रहे हैं. जहां वो सतह के नीचे के माहौल में पनप सकते हैं. (फोटोः नासा)
यूनिवर्सिटी ऑफ हवाई की प्लैनेटरी रिसर्च साइंटिस्ट एमिली कॉस्टेलो ने कहा कि अगर हमें केमिकल बायोसिग्नेचर मिलते हैं तो हम यह दावा कर सकते हैं कि इम्पैक्ट गार्डेनिंग हो रही है. क्योंकि अंतरिक्ष से आकर यूरोपा से टकराने वाली चीजों में भी जीवन के होने की उम्मीद रहती है. लेकिन इस समय यूरोपा पर चल रहे विनाशकारी रेडिएशन की वजह से ये केमिकल बायोसिग्नेचर जीवन के रूप में पनप नहीं पा रहे हैं. लेकिन भविष्य में जैसे-जैसे रेडिएशन कम होगा, वैसे ही जीवन की उत्पत्ति की संभावना बढ़ जाएगी. (फोटोः गेटी)
नासा के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी की यूरोपा साइंटिस्ट सिंथिया फिलिप्स ने कहा कि हम लगातार अपनी स्टडी को और गहन कर रहे हैं. हम सौर मंडल की वजह से यूरोपा पर पड़ने वाले सभी प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं. अगर हमें किसी ग्रह की उत्पत्ति और उसपर जीवन के संकेतों का अध्ययन करना है तो हमें इम्पैक्ट गार्डेनिंग का गहन अध्ययन करना होगा. हम यूरोपा क्लिपर का अगला अपडेटेड वर्जन साल 2024 में फिर लॉन्च करेंगे, जो ये सारे अध्ययन और बारीकी से करेगा. (फोटोः नासा)
यूरोपा क्लिपर मिशन को नासा सिर्फ एस्ट्रोबायोलॉजिकल अध्ययन के लिए ही भेज रहा है. इसका मकसद होगा यूरोपा पर जीवन की संभावनाओं की खोज करना. यह कोई जीवन खोजने वाला मिशन नहीं है बल्कि यह ऐसे डेटा और तस्वीरें जमा करेगा, जिससे बृहस्पति ग्रह के इस बर्फीले चांद पर जीवन की उत्पत्ति से संबंधित सबूतों को जुटाया जा सके और उनकी स्टडी की जा सके. यूरोपा में अगर रहने लायक वातावरण की संभावना दिखती है, तो भविष्य में यहां पर इंसानों की बस्ती भी बन सकती है. (फोटोः नासा)