ग्रीनलैंड (Greenland) की बर्फ तेजी से पिघल रही है. आज की तारीख में ग्लोबल वॉर्मिंग (Global Warming) का जो स्तर है, उसकी वजह से अगले कुछ सालों में ग्रीनलैंड से इतनी बर्फ पिघलेगी कि समुद्र का जलस्तर 27 सेंटीमीटर यानी 10.6 इंच बढ़ जाएगा. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर कल से ग्लोबल वॉर्मिंग रुक भी जाए तो भी इसे किसी कीमत पर रोका नहीं जा सकता. (फोटोः रॉयटर्स)
जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) जलाने और उससे हो रहे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की वजह से ऐसा हो रहा है. ग्रीनलैंड से अगले कुछ वर्षों में 110 ट्रिलियन टन बर्फ पिघलने वाली है. अगर आप इसे संख्या में लिखते हैं तो ये कुछ ऐसा दिखेगा - 110,000,000,000,000 टन बर्फ. यह इतनी बर्फ है कि पूरी दुनिया से समुद्रों और सागरों को एक फीट ऊपर कर दे. (फोटोः रॉयटर्स)
अगर आज की तारीख में हो रहे कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emission), अन्य हिमखंडों और ग्लेशियरों के पिघलने और सागरों के थर्मल एक्सपेंशन (Thermal Expansion) की वजह से समुद्रों के जलस्तर में कई फुट का बढ़ावा हो सकता है. तटीय इलाकों में रह रहे करोड़ों लोगों को भारी नुकसान से जूझना पड़ सकता है. यह एक बड़ा जलवायु संकट (Climate Crisis) बन सकता है. (फोटोः रॉयटर्स)
साल 2012 में ग्रीनलैंड की बर्फ सबसे ज्यादा पिघली थी. उसके बाद से लगातार वहां की बर्फ तेजी से पिघल रही है. भविष्य में नतीजा ये होगा कि पूरी दुनिया का समुद्री जलस्तर 78 सेंटीमीटर यानी 2.55 फुट बढ़ जाए. मतलब कई तटीय देशों और इलाकों में समुद्र का पानी घुस जाएगा. इससे तटों के किनारे रहने वाले लोगों को पीछे हटना होगा. उनका विस्थापन होगा. जिसका असर उस इलाके या पूरे देश पर पड़ेगा. (फोटोः रॉयटर्स)
वैज्ञानिकों ने बताया कि कोई भी स्टडी कंप्यूटर मॉडल के आधार पर की जाती है. भविष्य की संभावित गणनाएं की जाती हैं. लेकिन प्राकृतिक प्रक्रिया इससे कई गुना ज्यादा जटिल होती है. जिसके बारे में किसी भी तरह की भविष्यवाणी करना मुश्किल है. हालांकि सैटेलाइट से लिए गए डेटा से सटीकता बढ़ जाती है. इस स्टडी में भी सैटेलाइट डेटा का उपयोग किया गया है. यह स्टडी Nature Climate Change जर्नल में प्रकाशित हुई है. (फोटोः नेचर क्लाइमेट चेंज)
स्टडी में साल 2000 से 2019 तक ग्रीनलैंड की बर्फ की स्टडी की है. बढ़ते तापमान के साथ घटते बर्फ की स्टडी की गई. पहले बर्फबारी के बाद हिमखंडों का स्तर बढ़ जाता था. बर्फ की मात्रा का संतुलन बना रहता था. लेकिन अब नहीं बन पा रहा है. बर्फबारी भले ही ज्यादा हो जाए लेकिन अधिक तापमान की वजह से बर्फ जल्दी और तेजी से पिघल जा रही है. (फोटोः रॉयटर्स)
नेशनल जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ डेनमार्क एंड ग्रीनलैंड के साइंटिस्ट प्रो. जेसन बॉक्स ने जिस एक फुट की बात की जा रही है, वो सबसे कम बताया जा रहा आंकड़ा है. एक सदी में यह आंकड़ा असल में दोगुने से ज्यादा हो सकता है. यानी 100 सालों में ग्रीनलैंड से इतनी बर्फ पिघलेगी कि समुद्र का जलस्तर करीब 2.55 फुट हो जाएगा. अभी का एक फुट जो बताया गया है वह सिर्फ प्राइमरी डेटा है. (फोटोः रॉयटर्स)
प्रो. जेसन बॉक्स ने बताया कि हम सही मायनों में यह नहीं बता सकते कि इतनी बर्फ कितने समय में पिघलेगी. समुद्र का जलस्तर कितने दिन में बढ़ेगा. लेकिन ग्रीनलैंड के पिघलते हुए बर्फ का पानी सीधे समुद्रों में जा रहा है. साल 2021 में भी वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि यहां के हिमखंड तेजी से पिघल रहे हैं. ये एकदम बॉर्डर लाइन पर हैं. इनकी वजह से दुनिया में किसी भी वक्त तबाही आ सकती है. (फोटोः रॉयटर्स)
प्रो. जेसन के साथी डॉ. विलियम कोलगन ने कहा कि 100 साल में या 150 साल में समुद्र का जलस्तर बढ़ना तय है. ये होकर ही रहेगा. क्योंकि इंसान अपनी विनाशकारी गतिविधियों को रोक नहीं रहा है. रोक भी नहीं पाएगा. पेरिस एग्रीमेंट (Paris Agreement) लागू करने पर थोड़ी बहुत उम्मीद हो सकती है. लेकिन बर्बादी और तबाही से बचना अत्यधिक मुश्किल है. (फोटोः रॉयटर्स)
हिमालय (Himalaya) और एल्प्स (Alps) के पहाड़ों के बर्फ और ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहे हैं. हिमालय पर जमा एक तिहाई बर्फ पिघल चुकी है वहीं एल्प्स तो आधा खाली हो चुका है. उधर, अंटार्कटिका के पश्चिमी इलाके में मौजूद बर्फ भी ज्यादा वर्षों तक देखने को नहीं मिलेगी. अगले 100 से 200 सालों में समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ेगा. अगर अंटार्कटिका का पूर्वी हिस्सा एक बार में पूरा का पूरा पिघल जाए तो दुनिया भर में समुद्र का जलस्तर 52 मीटर बढ़ जाएगा. इसलिए तत्काल जलवायु को लेकर दुनियाभर के लोगों को कुछ करना चाहिए. (फोटोः रॉयटर्स)