अमेरिका में हर साल कई बवंडर यानी टॉरनेडो (Tornado) आते हैं. ये साल में किसी भी समय आ सकते हैं. सबसे ज्यादा खतरनाक टॉरनेडो मार्च से जुलाई के महीने में देखने को मिलते हैं. ये काफी तबाही भी मचाते हैं. लेकिन अब सर्दियों में भी बवंडर ज्यादा आ रहे हैं. काफी सक्रिय और तीव्र टॉरनेडो देखने को मिले हैं. अभी हाल ही में 10 दिसंबर को केंटकी और चार अन्य राज्यों में आए बवंडर ने 88 लोगों की जान ले ली. वैज्ञानिक हैरान हैं कि सर्दियों के मौसम में बवंडर इनते भयावह कैसे हो रहे हैं. (फोटोः गेटी)
अमेरिकी वैज्ञानिकों का कहना है कि सर्दियों में टॉरनेडो का आना सामान्य प्रक्रिया नहीं है. ये बेहद कम देखने को मिलता था लेकिन पिछले सालों से इनकी संख्या बढ़ रही है. इसके पीछे जलवायु परिवर्तन एक बड़ी वजह है. अमेरिकन जियोफिजिक्स यूनियन की 13 दिसंबर को हुई मीटिंग में इस बार पर एक रिसर्च पेपर प्रदर्शित किया गया. इसमें बताया गया है कि कैसे ठंड के महीनों में टॉरनेडो की तीव्रता और संख्या बढ़ती जा रही है. (फोटोः गेटी)
यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय के एटमॉस्फियरिक साइंटिस्ट जेफ ट्रैप कहते हैं कि आमतौर पर बवंडर तब बनते हैं जब थंडरस्टॉर्म आता है. मौसम गर्म होता है. उमस से भरी हवाएं चलती है. लेकिन ये उमस भरी हवाएं ज्यादा सर्द और सूखी हवाओं के नीचे तैरती हैं. तेजी से बहती हुई दो तरह की हवाएं एक दूसरे से मिलती या काटती हैं तब ये वर्टिकल ट्विस्टर (Vertical Twister) बनाती हैं. (फोटोः गेटी)
जेफ ने बताया कि सामान्य तौर पर टॉरनेडो की जिंदगी बेहद कम समय की होती है. ये बहुत कम समय में खत्म हो जाते हैं. पिछले 20 सालों में टॉरनेडो का पैटर्न बदला है. इन दो दशकों में बवंडर की तीव्रता बढ़ गई है. अमेरिका में इनके आने और नुकसान पहुंचाने की मात्रा बढ़ती जा रही है. इन्हें समझने के लिए 20 साल के बवंडर के हालातों और नुकसानों को समझने के लिए ट्विस्टर चेंज और इंसानों द्वारा किये जा रहे जलवायु परिवर्तन को मिलाकर एक मॉडल बनाया गया है. (फोटोः गेटी)
स्टोनी बुक यूनिवर्सिटी के एटमॉस्फियरिक साइंटिस्ट केविन रीड ने बताया कि हरिकेन और अन्य तूफानों के सिस्टम की तरह टॉरनैडो ज्यादातर छोटे समय के लिए ही आते हैं. लेकिन ज्यादातर मौसम संबंधी सिमुलेशन में तूफानों को शामिल नहीं किया जाता है. लेकिन टॉरनेडो पर क्लाइमेट चेंज का असर देखने को मिला है. जेफ ट्रैप और उनके साथियों ने देखा कि दो ऐतिहासिक टॉरनेडो का अध्ययन किया. फिर उस पर इंसानों द्वारा किए जा रहे जलवायु परिवर्तन से जोड़ा गया तो उनकी भयावहता और बढ़ गई. (फोटोः गेटी)
पहला ऐतिहासिक टॉरनेडो 10 फरवरी 2013 में मिसिसिपी के हैटिसबर्ग में सर्दियों के मौसम में आया था. दूसरा 20 मई 2013 को ही गर्मियों के मौसम में ओकलाहोमा के मूर इलाके में आया था. जेफ ट्रैप और उनके साथियों ने ग्लोबल वॉर्मिंग सिमुलेशन के साथ टॉरनैडो से संबंधित गणना और विश्लेषण किया. उन्होंने यह जानने का प्रयास किया कि कैसे जलवायु परिवर्तन टॉरनेडो के हवा की गति, चौड़ाई और तीव्रता को बदल देते हैं. यही स्थिति दोनों टॉरनेडो के साथ भी हुई. भविष्य में ऐसी ही स्थिति पैदा हो सकती है. (फोटोः गेटी)
जेफ ट्रैप ने कहा कि यही स्थिति हमने हाल ही में 10 दिसंबर को देखा था. मिडवेस्ट में बेवजह का गर्म मौसम ने सर्दियों में टॉरनैडो को जन्म दिया और उसने तबाही मचा दी. जिस तरफ उमस भरी हवाएं नीचे की तरफ से चल रही थीं, उस तरफ टॉरनैडो ने आगे जाकर अपनी भयावहता दिखाई. यह टॉरनेडो सैकड़ों किलोमीटर तक सफर करते हुए अरकंसास से केंटकी तक गया. (फोटोः गेटी)
पर्ड्यू यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट डैनियल शवास ने कहा कि टॉरनैडो को अगर जलवायु परिवर्तन से फर्क पड़ने लगा है तो यह नुकसानदेह है. क्योंकि आपको नहीं पता चलेगा कि कब कौन सा टॉरनेडो कहां और कितनी जल्दी जन्म लेगा. इससे कितने बड़े इलाके में नुकसान होगा. यह कितना तीव्र होगा. या कितना खतरनाक हो सकता है. इसलिए यह जरूरी है कि टॉरनेडो पर होने वाले जलवायु परिवर्तन का असर का अध्ययन किया जाए. (फोटोः गेटी)
हालांकि केविन रीड का कहना है कि ऐसे मॉडल्स से टॉरनेडो की तीव्रता और भयावहता का पता लगाना थोड़ा संदेहास्पद हो जाता है, क्योंकि इसमें सीधे आंकड़ों की जरूरत होती है. लेकिन मौसम संबंधी बदलावों का अंदाजा लगाना मुश्किल है, इसलिए कब किस तरह के बदलाव से टॉरनेडो पर क्या असर होगा. यह कह पाना मुश्किल है. (फोटोः गेटी)