पहले ये समझते हैं कि सुपरमून क्या होता है? चांद जब धरती के नजदीक आ जाता है तब उसका आकार 7 से 12 फीसदी बड़ा दिखता है. आमतौर पर चांद की दूरी धरती से 406,300 किलोमीटर रहती है. लेकिन जब यह दूरी कम होकर 356,700 किलोमीटर हो जाती है तब चांद बड़ा दिखाई देता है. इसलिए इसे सुपरमून कहते हैं. (सभी फोटोः एपी)
चांद इस समय अपनी कक्षा में चक्कर लगाते समय धरती के नजदीक आता है. क्योंकि चांद धरती के चारों तरफ गोलाकार चक्कर नहीं लगाता. यह अंडाकार कक्षा में घूमता है. ऐसे में इसके धरती के नजदीक आना तय होता है. नजदीक आने की वजह से चमक भी बढ़ जाती है.
अब बताते हैं कि लाल रंग क्यों? सूरज की रोशनी में हर तरह के विजिबल रंग होते हैं. धरती के वायुमंडल में मौजूद गैस इसे नीले रंग का दिखाती हैं. जबकि, लाल रंग की वेवलेंथ इसे पार कर जाती है. इसे रेलीग स्कैटरिंग (Rayleigh Scatterinhg) कहते हैं.
इसलिए आपको आसमान नीला और सूर्योदय और सूर्यास्त लाल रंग का दिखता है. चंद्र ग्रहण के समय धरती के वायुमंडल से लाल रंग की वेवलेंथ पास करती है. ये वायुमंडल की वजह से मुड़कर चांद की ओर जाती है. यहां नीला रंग फिल्टर हो जाता है. इसकी वजह से चांद का रंग लाल दिखता है.
इस बार सुपरमून को बकमून क्यों कह रहे हैं? असल में यह नाम नेटिव अमेरिकन है. बकमून इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि नर हिरण की सींगें पूरी तरह से उग चुकी होती है. इन सींगों को बक कहते हैं. ये बार-बार गिरते और उगते रहते हैं. जुलाई में इनकी ग्रोथ पूरी होती है. इसलिए बक मून कहते हैं.
नेटिव अमेरिकन आदिवासियों के लिए यह मौसम शिकार का मौसम होता है. उसकी तैयारी के लिए होता है. इस समय ये आदिवासी शिकार की व्यवस्थाओं में जुट जाते हैं. ताकि सर्दियों के लिए पर्याप्त मात्रा में खाना व रसद जुटा सकें.
बकमून असल में विकास, ताकत और क्षमता का प्रतीक माना जाता है. हिरण के सींगों का निकलना और खत्म होना उसी प्राकृतिक प्रक्रिया को दर्शाता है. जिससे पता चलता है कि जीवन रुकता नहीं है. खत्म होकर फिर से शुरू हो जाता है.
बकमून को देखने के लिए जरूरी है कि आसमान साफ हो. बादल या कोहरा न हो. अगर बहुत साफ आसमान नहीं हो तो आप दूरबीन का इस्तेमाल कर सकते हैं.