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वायनाड, हिमाचल, केदारनाथ... क्या होता है भूस्खलन, क्या पहले पता चल सकता है इस आपदा का?

आजतक साइंस डेस्क
  • नई दिल्ली,
  • 07 अगस्त 2024,
  • अपडेटेड 8:00 AM IST
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पिछले एक हफ्ते में मंडी, शिमला, रुद्रप्रयाग, केदारनाथ और वायनाड में भूस्खलन (Landslides) हुए. भयानक और खतरनाक. वायनाड में 360 से ज्यादा लोग खत्म हो चुके हैं. सैकड़ों जख्मी हैं. बचावकार्य जारी है. अब भी इंसानी शरीर के टुकड़े मिल रहे हैं. लैंडस्लाइड या भूस्खलन सिर्फ पहाड़ों पर ही नहीं होते. (सभी फोटोः PTI)

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हिमालय से लेकर केरल तक हो रहे हैं. इसकी वजह क्या है. यह एक ऐसा नेचुरल प्रोसेस है, जिसमें जमीन या पर्वत का बहुत बड़ा हिस्सा खिसकता है. संतुलन और स्थिरता खो देता है. तब वह नीचे की ओर सरकता है. या तेजी से लुढ़क जाता है. इसके पीछे की वजह है किसी पर्वत के बनने का प्राकृतिक तरीका. 

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पहाड़ बनते समय भारी मात्रा में लैंडमास एक से दूसरी जगह मूव होता है. जब भी कोई वस्तु अधिक ऊर्जा वाली स्थिति में पहुंच जाती है, तब वह कम ऊर्जा की तरफ भागने की कोशिश करती है. ताकि स्थिरता बनी रहे. ऐसा ही भूस्खलन के समय पहाड़ों के साथ होता है. इसलिए ही हिमाचल हो या उत्तराखंड. या फिर केरल. भूस्खलन हो रहे हैं. 

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इतने ज्यादा संख्या में क्यों हो रहे हैं? सीधी साफ बात है. पिछले 10-15 वर्षों में चरम मौसमी आपदाओं (Extreme Weather Events) का आना बढ़ गया है. इसकी वजह से पहाड़ी ढलाने स्थिरता पा नहीं रहे. इसे पाने के लिए ऊपर से नीचे की तरफ खिसक जाते हैं. आमतौर पर इसे लैंडस्लिप कहते हैं. 

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जब लैंडस्लिप बड़े पैमाने पर होता है, तब इसे लैंडस्लाइड कहा जाता है. लैंडस्लाइड तब मानते हैं, जब 10 वर्ग मीटर की जमीन एकसाथ खिसक जाए. यानी ऐसी पहाड़ी ढलान जिसके नीचे मजबूत पत्थर कम होते हैं. ऊपर ढीली मिट्टी होती है. इस मिट्टी पर पेड़-पौधे कम होते हैं. जब इस पर ऊपर से ज्यादा पानी गिरता है. तब यह सरकता है. 

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लैंडस्लाइड होने की सिर्फ दो वजहें हो सकती हैं. पहला भूकंप और दूसरा बेहद तेज बारिश. बाकी कुछ नहीं बदल रहा है. अगर इन दोनों प्राकृतिक वजहों से लैंडस्लाइड नहीं हो रहा है. तो किसी और चीज से नहीं हो सकता. क्योंकि भौगोलिक परिस्थितियां स्थिर हैं. इसे बिगाड़ रहा है इंसान. जलवायु परिवर्तन करके और बेतरतीब निर्माण करके. 

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इस समय हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम या केरल में जहां भी भूस्खलन हुआ है, उसके पीछे वजह है चरम बारिश. यानी एक्स्ट्रीम रेनफॉल. इसके अलावा उत्तराखंड में बड़ी वजह है चारधाम परियोजना. ऐसी सड़कें अन्य राज्यों में भी आपदाएं पैदा कर रही हैं. केरल में तो एक्सट्रीम रेनफॉल ही वजह बनी. 

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जब भी ऊंचाई वाले इलाकों में ज्यादा पर्यटन, इंसानी गतिविधियां, बेतरतीब निर्माण होंगे, तब भूस्खलन की आशंका बढ़ जाती है. चाहे वह केरल हो या फिर हिमालय के पहाड़. जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान की वजह से होने वाली चरम मौसमी घटनाएं इसमें बड़ी भूमिका निभा रही हैं.  

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हिमालयी क्षेत्र में लेयर वाले पठार हैं. यानी मिट्टी कमजोर है. दक्कन के पठार की मिट्टी लावा और मैग्मा से बनी है, जिसे कॉटन सॉयल कहते हैं. वह भी लूज है. हालांकि, दक्कन पठार की पैरेंट रॉक हिमालय की तुलना में काफी सॉलिड है. यदि ऊंचाई है. वेजिटेशन में कमी है. मिट्टी लूज है तो यह स्थिति लैंडस्लाइड पैदा करेगी ही. 

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अलग-अलग जगह होने वाले भूस्खलन का बिहेवियर भी अलग-अलग होता है. इसलिए इनका पहले से प्रेडिक्शन करना यानी भविष्यवाणी मुश्किल है. क्योंकि हर पहाड़ की ढलान दूसरे से अलग होती है. कौन सी कब गिरेगी इसका अर्ली वॉर्निंग सिस्टम बनाना बेहद मुश्किल है. लगभग असंभव है. 

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कुछ अर्ली वार्निंग सिस्टम सेंसर बेस्ड होते हैं जो रोजाना लैंडस्लाइड की गति का अंदाजा लगाते हैं. इनकी सटीकता अच्छी होती है. लेकिन भारत में लैंडस्लाइड के लिए जो सिस्टम लगाए हैं. वह पूरी तरह से वर्षा आधारित हैं. भूस्खलन का सामान्य अंदाजा ही दे पाते हैं. ये नहीं बता पाते कि कब और कहां भूस्खलन होगा. 

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