
दक्षिणध्रुवीय महासागर, जिसे अंटार्कटिक महासागर भी कहते हैं, उसे लेकर नई चिंता जताई जा रही है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण वहां की बर्फ तेजी से पिघल रही है, ये बात कई बार कही जा चुकी. इससे होने वाले नुकसान पर भी बात होने लगी है, लेकिन अब जो चेतावनी आ रही है, वो डरा देने वाली है. बर्फ इतनी तेजी से पिघल रही है कि इससे महासागर के भीतर स्लोडाउन के हालात बन रहे हैं. समुद्र के भीतर का बहाव हल्का पड़ता जा रहा है. इससे दुनियाभर के पानी के स्त्रोतों में ऑक्सीजन की कमी होने लगेगी. बुधवार को वैज्ञानिक जर्नल नेचर में छपी स्टडी में इस बारे में विस्तार से बताया गया है.
यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स के शोधकर्ताओं ने स्टडी में बताया कि कैसे अंटार्कटिका में बर्फ पिघलने का असर डीप ओशन करंट्स पर पड़ेगा. इसके लिए उन्होंने उस डेटा की मदद ली, जिसमें 35 मिलियन कंप्यूटिंग घंटों, और कई तरीकों से अंटार्कटिका पर नजर रखी गई.
हर रोज और लगातार अंटार्कटिका में बर्फ का अंबार, जो नमक और ऑक्सीजन से भरपूर होता है, पिघलता है. इससे जो वॉटर करंट बनती है, वो प्रशांत, हिंद और अटलांटिक महासागर तक पहुंचती है. ये करंट सतह से और भी न्यूट्रिएंट्स लेकर ऊपर की तरफ आती है और प्रवाह बंट जाता है. जब बर्फ ज्यादा पिघलेगी तो अंटार्कटिका का पानी पतला और कम नमक वाला हो जाएगा. इससे गहरे समुद्र के भीतर का बहाव धीमा पड़ जाएगा.
समुद्र के भीतर का प्रवाह कम होते ही 4 हजार मीटर से ज्यादा गहराई वाले हिस्सों में पानी का प्रवाह ही रुक जाएगा. ये एक तरह के दलदल जैसी स्थिति होगी, जिसमें पानी बहना रुक जाता है. धाराओं के जरिए ही मछलियों और बाकी समुद्री जीवों तक पोषण और ऑक्सीजन पहुंचता है. इसमें कमी आने से पोषण में भी कमी आने लगेगी. इससे फूड चेन बुरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाएगी.
सबसे बड़ी बात कि इससे पानी में ऑक्सीजन सप्लाई पर असर होगा, जो समुद्र के भीतर उठापटक मचा देगा. इसका असर बाहर भी पड़ेगा. चूंकि समुद्र के ऊपर की परतें कमजोर पड़ जाएंगी तो ये कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित नहीं कर पाएंगी, जिससे वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा भी बढ़ जाएगी.
इससे पहले धाराओं की रफ्तार कम होने में लगभग 1 हजार साल लगे थे, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के चलते कुछ ही दशकों में इतना गहरा असर दिखने लगा है. एक्सपर्ट मान रहे हैं कि ग्लोबल वार्मिंग पर जल्द कंट्रोल न कर पाए, तो हालात बिगड़ते चले जाएंगे. हो सकता है कि 3 दशकों की बजाए ये असर कुछ ही सालों में दिखने लगे.
बर्फ पिघलने का असर सबपर होगा
कुछ ही समय पहले अंटार्कटिका से 1550 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के आकार के बर्फ का टुकड़ा टूटा था. इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि वहां बर्फ कितनी तेजी से पिघल रही है. इसके बाद एक्सपर्ट्स ने माना कि अगर पूरी धरती के तापमान को लगभग 2 डिग्री सेल्सियस भी कम कर दें तो भी बर्फ पिघलने की रफ्तार में खास कमी नहीं आएगी. अगले 130 सालों में समुद्री जलस्तर लगभग सौ सेंटीमीटर तक बढ़ जाएगा, जिससे बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन होगा.