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एलन मस्क को चीन की चुनौती... एकसाथ लॉन्च किए स्टारलिंक जैसे 18 सैटेलाइट, इस साल 108 उपग्रह छोड़ने का प्लान

China ने Elon Musk से बदला लेने का नया तरीका निकाला गया है. वो स्टारलिंक सैटेलाइट को टक्कर देने के लिए अपने इंटरनेट सैटेलाइट का समूह भेज रहा है. पहला बैच लॉन्च हो चुका है. इसमें 18 सैटेलाइट लॉन्च किए गए हैं. इस दशक के अंत तक चीन 15 हजार ऐसे सैटेलाइट और लॉन्च करेगा.

इंटरनेट उपग्रह समूह को अंतरिक्ष में ले जाने वाले लॉन्ग मार्च 6A रॉकेट की लॉन्चिंग ताइयुआन लॉन्च सेंटर से की गई. (फोटोः गेटी) इंटरनेट उपग्रह समूह को अंतरिक्ष में ले जाने वाले लॉन्ग मार्च 6A रॉकेट की लॉन्चिंग ताइयुआन लॉन्च सेंटर से की गई. (फोटोः गेटी)
आजतक साइंस डेस्क
  • नई दिल्ली,
  • 07 अगस्त 2024,
  • अपडेटेड 12:46 PM IST

चीन ने इस साल का अपना 35वां लॉन्च कर दिया है. ये कियानफैन पोलर ऑर्बिट 01 इंटरनेट सैटेलाइट्स हैं. इसकी लॉन्चिंग लॉन्ग मार्च 6 रॉकेट से की गई. इन सैटेलाइट्स की टक्कर एलन मस्क के स्टारलिंक सैटेलाइट्स से हैं. चीन अपने इन नए इंटरनेट प्रोवाइडर सैटेलाइट्स को धरती की निचली कक्षा यानी LEO में स्थापित करेगा. 

लॉन्चिंग ताइयुआन सैटेलाइट लॉन्च सेंटर से हुई है. ये सेंटर चीन के शांक्सी प्रांत में है. इस लॉन्चिंग में चीन की सरकारी कंपनी शंघाई स्पेसकॉम सैटेलाइट टेक्नोलॉजी ने काम किया था. इसी कंपनी का प्रोजेक्ट है Thousand Sails Constellation. इसका मकसद है पूरी दुनिया में स्टारलिंक की तरह इंटरनेट प्रोवाइड करना. 

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यहां देखिए लॉन्च का वीडियो

SpaceX के पास फिलहाल LEO में 6200 सैटेलाइट्स हैं. स्टारलिंक सैटेलाइट्स धरती की सतह से 550 किलोमीटर की ऊंचाई पर चक्कर लगा रहे हैं. इन छोटे सैटेलाइट्स के जरिए कई देश, सरकारें, लोग और व्यवसाय इंटरनेट सुविधा ले रहे हैं. खास बात ये हैं कि उन्हें ब्रॉडबैंड इंटरनेट मिल रहा है. अब इसी तकनीक का इस्तेमाल फेमस हो रहा है. 

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पुरानी तकनीक वाले सैटेलाइट से इंटरनेट पड़ता था महंगा

इंटरनेट प्रोवाइड करने के पुराने तकनीक में एक जियोस्टेशनरी सैटेलाइट का इस्तेमाल होता था. जो LEO की दूरी से करीब 65 गुना ज्यादा दूरी पर रहता था. इसे हाई अर्थ ऑर्बिट कहते हैं. इससे डेटा धरती पर आने और रिसीव करने में काफी ज्यादा टाइम लगता था. इससे इंटरनेट की स्पीड धीमी हो जाती थी. साथ ही कीमत भी ज्यादा थी.

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स्टारलिंक सैटेलाइट के जरिए किसी भी देश की जासूसी संभव 

पिछले दो दशकों से चीन अपने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर काफी ज्यादा चिंतित है. क्योंकि उसे डर है कि स्टारलिंक सैटेलाइट्स के जरिए अमेरिका और एलन मस्क जासूसी कर सकते हैं. इसलिए चीन ने अपनी सेना को ऐसा ही इंटरनेट सैटेलाइट कॉन्स्टीलेशन बनाने को कहा था. चीन जानता है कि अमेरिका स्टारलिंक सैटेलाइट्स के जरिए हाइपरसोनिक मिसाइलों की लॉन्चिंग को ट्रैक कर सकता है. साथ ही ड्रोन और स्टेल्थ फाइटर से कम्यूनिकेट कर सकता है. इतना ही नहीं चीन के सैटेलाइट्स को इन्हीं सैटेलाइट्स के जरिए बर्बाद कर सकता है. आप देख सकते हैं कि कैसे यूक्रेन इन्हीं सैटेलाइट्स की मदद से रूस के ड्रोन्स को मार कर गिरा रहा है. 

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इस साल 108 और 2030 तक 15 हजार सैटेलाइट लॉन्च करेगा चीन

इसलिए चीन चाहता है कि थाउसैंड सेल्स प्रोजेक्ट के जरिए वह खुद को स्टारलिंक सैटेलाइट्स से बचा सके. इसलिए चीन ने हाल ही में अपनी पनडुब्बियों में लेजर लगाने का फैसला किया है. ताकि वो समंदर के अंदर से ही स्टारलिंक सैटेलाइट्स को मार कर गिरा सकें. इस साल चीन 108 ऐसे सैटेलाइट्स लॉन्च करेगा. 2030 तक वह 15 हजार से ज्यादा सैटेलाइटस ऑर्बिट में छोड़ देगा. 

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