
पूर्णिमा या अमावस की रात अक्सर बुरी आत्माएं जाग जाती हैं. लोगों के व्यवहार में बदलाव आ जाता है. कुछ लोग अच्छा तो कुछ बुरा व्यवहार करने लगते हैं. ऐसा नजारा सिर्फ फिल्मों और काल्पनिक कथाओं में ही देखने को मिलता है. कि पूर्णिमा या अमावस की रात में इंसान भेड़िया या वैंपायर बन गया. जब बात होती है पूर्णिमा या अमावस की रात की तो मतलब होता है चंद्रमा के आकार से. जो हर 15 दिन में बदलता रहता है.
एक कहानी ये भी थी कि पूर्णिमा की रात ज्यादा बच्चों का जन्म होता है. लेकिन बाद में ये बात खारिज हो गई. क्योंकि इसका कहीं कोई प्रमाण नहीं मिला. वैज्ञानिक तौर पर भी यह गलत सिद्ध हुआ. 29 दिन का चंद्रमा का साइकिल होता है. नए चांद से लेकर पूर्ण चंद्र तक. जो 28 दिन के माहवारी यानी पीरियड्स के समय से मिलता-जुलता है.
लोग चांद की ग्रैविटी और चमक से फर्टिलिटी साइकिल (Fertility Cycle) को जोड़ते हैं. लेकिन इसके बीच सबूत क्या है कि माहवारी का चांद के बदलते आकार से कुछ लेना-देना है.
क्या चंद्रमा के 29 दिन के चक्र से पीरियड्स के 28 दिन मिलते हैं?
अगर चंद्रमा के 29 दिन के साइकिल से किसी महिला के पीरियड्स का 28 दिन का साइकिल मिलता है. तो ये मात्र एक संयोग ही होगा. 1986 में एक स्टडी हुई थी, जिसमें वैज्ञानिकों ने इन दोनों घटनाओं के बीच एक बेहद बारीक संबंध या संयोग होने की उम्मीद जताई थी. स्टडी Acta Obstetricia et Gynecologica Scandinavica में प्रकाशित हुई थी.
इसमें बताया गया था कि स्टडी में शामिल 28.3 फीसदी महिलाओं के पीरियड्स नए चांद के आने पर शुरू हुआ था. चांद के किसी अन्य आकार की तुलना में ये सबसे ज्यादा बड़ा संयोग था. लेकिन 2013 में एक स्टडी हुई. जो Endocrine Regulations में प्रकाशित हुई. इसमें एक 74 साल की महिला को वर्षों से फॉलो किया जा रहा था. लेकिन उसकी पूरी उम्र के दौरान ऐसे कोई सबूत नहीं मिले कि चांद के बदलाव का महिलाओं की माहवारी से कोई संबंध है.
पीरियड्स ट्रैक करने वाले एप्स ने की वैज्ञानिकों की बड़ी मदद
अब बात हुई कि कैसे पता चले कि पीरियड्स कब शुरू हुए. शुक्र मनाइए कि पीरियड्स को ट्रैक करने वाले एप्स आ गए. महिलाएं आराम से उसमें फीड कर देती थीं. फिर एक बड़े स्तर की स्टडी साल 2019 में हुई. इसमे माहवारी को ट्रैक करने वाले एप Clue ने 15 लाख महिलाओं के 75 लाख पीरियड्स की जांच की. इन लोगों को कोई सबूत नहीं मिला कि चांद के आकार बदलने के साथ माहवारी का कोई लेना-देना है.
जर्मनी की वर्जबर्ग यूनिवर्सिटी में न्यूरोबायोलॉजी और जेनेटिक्स की प्रमुख शार्लोट फोरस्टर ने कहा कि अगर आप 1000 महिलाओं के पीरियड्स का डेटा कलेक्ट करें तो आप देखेंगे कि पूर्णिमा के समय या नए चंद्रमा के समय माहवारी की शुरुआत हो. ऐसा नहीं होता. लंबे समय तक का डेटा निकालेंगे तो शायद एकाध बार ऐसा हो जाए. लेकिन माहवारी का चांद से कोई लेना-देना हो, ये कतई साइंटिफिक नहीं है.
हर स्टडी में अलग-अलग रिजल्ट आ रहे हैं... कन्फ्यूजन
लेकिन एक दिक्कत सामने तब आई जब शार्लोट और उनकी साथियों ने 2021 में एक स्टडी पब्लिश की. स्टडी साइंस एडवांसेस में प्रकाशित हुई. शार्लोट की टीम पांच साल से 22 महिलाओं की माहवारी पर नजर रख रही थी. हैरानी ये थी कि इन महिलाओं के जितने भी पीरियड्स हुए. उसमें से एक चौथाई या तो पूर्णिमा या फिर नए चांद से सिंक्रोनाइज हो रहे थे. लेकिन ऐसा सिर्फ सर्दियों और पतझड़ में ही होता है. जब रात लंबी होती है.
असल में इसकी वजह ये है जब रोशनी ज्यादा होती है, तब लोग अपने काम करने का समय बढ़ा देते हैं. क्योंकि रोशनी में काम करना सुरक्षित होता है. नए चांद समय अंधेरा जल्दी होता है. लोग जल्दी घर में चले जाते हैं. प्रजनन में लग जाते हैं. ये समय दंपत्तियों के लिए सर्वाइवल और प्रजनन संबंधी लाभ लेने का होता था. लेकिन यह एक थ्योरी है. इसका कोई प्रमाण नहीं है.