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E-Waste: 'कूड़े' में छिपा है खजाना, भारत को बना सकता है अमीर, लेकिन...

क्या आपने कभी सोचा है कि आपके पुराने इलेक्ट्रोनिक डिवाइस जैसे मोबाइल फोन, टीवी, वाशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर समेत तमाम चीजों का रिजेक्ट हो जाने पर क्या होता है? नहीं, तो जानिए इन "ई-वेस्ट" जो कि आम तौर पर ऐसे पदार्थ हैं जो पर्यावरण के लिए खतरनाक होते हैं और मानव के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं उनके लिए भारत में क्या है मैनेजमेंट... ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें ये रिपोर्ट

E-waste management in India E-waste management in India
शैली आचार्य
  • नई दिल्ली,
  • 27 मार्च 2023,
  • अपडेटेड 8:43 AM IST

21वीं सदी लोहे और स्टील की नहीं बल्कि सिलिकन और कोबाल्ट जैसे रेयर अर्थ मिनरल्स की है. हर रोज नई तकनीक आती है और इस रेस में खुद को बनाए रखने के लिए हम धड़ल्ले से अपने इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बदल देते हैं, लेकिन इस बात पर किसी का ध्यान तक नहीं कि इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस जब हमारे लिए कचरा बन जाते हैं तो ये कहां जाते हैं और इनका क्या होता है?

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इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस जब हम रिजेक्ट कर देते हैं तो ये ई-वेस्ट हो जाते हैं. 'ई-वेस्ट' 21वीं सदी के लिए उतना ही खतरनाक है जितना कि ग्लोबल वॉर्मिंग. ई-वेस्ट का अगर सही तरीके से निस्तारण किया जाए तो यह पर्यावरण की सेहत और देश की अर्थव्यवस्था के लिए बूस्टर डोज का काम कर सकता है.

आखिर होता क्या है ई-वेस्ट?

ई-वेस्ट को "वेस्ट इलेक्ट्रिकल या बेकार हो चुके इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के तौर पर देखा जाता है. दूसरे शब्दों में कहें तो, ई-वेस्ट ऐसे वेस्ट इलेक्ट्रिकल उपकरण हैं जो पुराने हों, उनकी लाइफ खत्म हो चुकी हो या रिजेक्ट कर दिए गए हों. इसमें बिजली और बैटरी से चलने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे कंप्यूटर, मोबाइल फोन, टीवी, वाशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर समेत तमाम चीजें आती हैं. ई-वेस्ट में आम तौर पर ऐसे पदार्थ होते हैं जो पर्यावरण के लिए खतरनाक होते हैं और मानव के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं.

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e-waste management in india

2 मिलियन टन ई-वेस्ट में 0.036 मीट्रिक टन का ही निपटान

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट का अनुमान है कि पूरी दुनिया में हर साल लगभग 30 से 50 मिलियन टन ई-वेस्ट पैदा हो रहा है. ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2017 की मानें तो भारत सालाना लगभग 2 मिलियन टन (MT) ई-वेस्ट पैदा करता है और अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद ई-वेस्ट उत्पादक देशों में ये पांचवें स्थान पर है. 2016-17 में, भारत ने अपने ई-वेस्ट का केवल 0.036 मीट्रिक टन ही निपटान किया है.

भारत में ई-वेस्ट का 'मिस-मैनेजमेंट'

ई-वेस्ट (मैनेजमेंट) नियम 2016 कहता है कि भारत में उत्पन्न ई-वेस्ट को पर्यावरण की दृष्टि से प्राथमिक मकसद के साथ चैनलाइज़ किया जाए. लेकिन देश में बड़े पैमाने पर ये काम अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर द्वारा नियंत्रित किया जाता है. ये सेक्टर ई-वेस्ट का निस्तारण गलत तरीकों से कर रहे हैं, नतीजन इससे और भी ज्यादा प्रदूषण होता है और इसमें से जरूरी मिनरल्स और पदार्थ की रिकवरी भी कम होती है. लिहाजा इससे कीमती संसाधनों की बर्बादी और पर्यावरण को नुकसान, दोनों हो रहा है.

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अभी तक 178 पंजीकृत ई-वेस्ट रीसाइक्लर ही हैं, जिन्हें ई-वेस्ट को संसाधित करने के लिए राज्य सरकारों द्वारा मान्यता प्राप्त है, लेकिन भारत के ज्यादातर ई-वेस्ट रीसाइक्लर ई-वेस्ट को रीसाइकल ही नहीं कर रहे हैं और कुछ इसे खतरनाक तरीके से स्टोर कर रहे हैं. इनमें से कई रीसाइक्लर के पास ई-वेस्ट को मैनेज करने की क्षमता भी नहीं है. 

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बता दें कि दिल्ली के सीलमपुर में भारत का सबसे बड़ा ई-वेस्ट निपटान केंद्र है. यहां बच्चों से लेकर वयस्क रोजाना रीयूजेबल उपकरणों से कीमती धातु जैसे तांबा, सोना और कई काम करने लायक पार्ट को निकालने में प्रतिदिन 8-10 घंटे खर्च करते हैं.

भारत में ई-वेस्ट के लिए क्या कानून, सरकार कैसे कर रही काम?

ई-वेस्ट के मैनेजमेंट के लिए भारत में 2011 से कानून लागू है. इस कानून के तहत केवल अधिकृत भंजक (डिस्मेंटलर) और  पंजीकृत ई-वेस्ट रीसाइक्लर ही ई-वेस्ट को कलेक्ट कर सकते हैं. ई-वेस्ट (प्रबंधन) नियम, 2016, 1 अक्टूबर, 2017 को लागू किया गया था. इसमें 21 से अधिक प्रोडक्ट (अनुसूची-I) को नियम के दायरे में शामिल किया गया था. 

इस नियम को और मजबूत करने के लिए प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी ऑर्गनाइजेशन (PRO) नामक एक नई व्यवस्था शुरू की गई, जिसमें उत्पादकों को टारगेट पूरा करना होगा, जो उनकी बिक्री से उत्पन्न वेस्ट का 20 प्रतिशत होना चाहिए. इसके बाद अगले पांच साल तक इस टारगेट में सालाना 10 फीसदी की बढ़ोतरी होती रहेगी. ये कानून यह भी कहता है कि उत्पादकों की जिम्मेदारी केवल वेस्ट एकत्र करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि ई-वेस्ट अधिकृत रीसाइकलर/भंजक तक पहुंचे.

लेकिन खतरनाक ई-वेस्ट को सुरक्षित रूप से संसाधित करने के लिए नए नियम आने के बावजूद भी लगभग 80 प्रतिशत ई-वेस्ट (पुराने लैपटॉप और सेल फोन, कैमरा और एयर कंडीशनर, टीवी और एलईडी लैंप) अनौपचारिक सेक्टर द्वारा गलत तरीके से डिस्पोज किया जा रहा है जिससे प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी रिस्क कई गुना बढ़ने का खतरा है. इतना ही नहीं इससे भूजल और मिट्टी भी प्रदूषित हो रही है.

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इस दिशा में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने अहम पदार्थों और प्लास्टिक को सही तरीके से रीसाइकल करने के लिए सस्ती तकनीकों का विकास किया है जिससे पर्यावरण को भी होने वाले नुकसान को कम करेगा. इनमें दो विशेष पीसीबी रीसाइक्लिंग तकनीकें हैं, जिसमें 1000 किलोग्राम प्रति दिन (~35 मीट्रिक टन ई-वेस्ट) और 100 किलोग्राम प्रति दिन (~3.5MT ई-वेस्ट) के बैच शामिल हैं जो पर्यावरणीय मानदंडों के साथ ई-वेस्ट का निस्तारण करेंगी.

ई-वेस्ट ट्रीटमेंट की जरूरत क्यों?

ई-वेस्ट को वैज्ञानिक तरीकों से निपटान करने से पर्यावरण को प्रदूषण कम होता है. इसके अलावा, रीसाइक्लिंग मटेरियल से नए उत्पाद बनाने से, वर्जिन (एक दम नए मटेरियल) सामग्री से उत्पाद बनाने की तुलना में कम वायु और जल प्रदूषण होता है. 24 जनवरी, 2019 को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) द्वारा पेश की गई ई-वेस्ट पर एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2018 में ई-वेस्ट 48.5 मीट्रिक टन तक पहुंच गया और अगर कुछ नहीं बदला तो यह आंकड़ा दोगुना होने की उम्मीद है. इसमें कहा गया है कि वैश्विक ई-वेस्ट का केवल 20 प्रतिशत ही रीसाइकल किया गया है. 

जिस हिसाब से वर्जिन मटेरियल के संसाधनों में तेजी से कमी आ रही है, उस लिहाज से ई-वेस्ट एक अच्छा वैकल्पिक संसाधन हो सकता है, क्योंकि इसमें कई मूल्यवान और रीसाइकल करने योग्य चीजें जैसे एल्यूमीनियम, तांबा, सोना, चांदी और लौह सामग्री शामिल होती है.

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E-Waste Growth in India

कैसे ई-वेस्ट बन सकता है इकोनॉमी के लिए बूस्टर डोज?

इलेक्ट्रॉनिक डिवाइज के निर्माण के लिए जिन मेटल और मिनरल की आवश्यकता होती है, भारत में ऐसे रेयर अर्थ मेटल्स और मिनरल्स की अत्यधिक कमी है, इसलिए ई-वेस्ट में पहले से मौजूद इन दुर्लभ खनिजों की रीसाइकलिंग पर ध्यान देना और भी अधिक जरूरी हो जाता है. ये तरीका इन मिनरल्स को धरती से खोदकर डिवाइसों के लिए प्रोसेस करने से आसान और सस्ता है. बहुत बड़ी मात्रा में कीमती खनिज बिना ट्रीट किए ही ई-वेस्ट के साथ लैंडफिल में चला जाता है. ऐसे में एक अच्छी तरह से डिजाइन, मजबूत और विनियमित ई-वेस्ट व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जो इन कीमती खनिजों को भी रिसाइकिल करे और रोजगार भी पैदा करे. 

भारत में ई-वेस्ट की रीसाइक्लिंग को बढ़ाने की अपार क्षमताए हैं. इस दिशा में कुछ काम पहले से हो रहा है, हालांकि, अभी भी इस सेक्टर के अनौपचारिक क्षेत्र में पर्याप्त सुरक्षा उपायों को अपनाते हुए जागरूकता अभियान, कौशल विकास और प्रौद्योगिकी की शुरूआत के जरिए बहुत बड़े टारगेट को पाना अभी बाकी है.

बता दें कि ई-वेस्ट सोना, चांदी और तांबा जैसी धातुओं का एक समृद्ध स्रोत होता है, जिसे रीसाइकल करके प्रोडक्शन साईकिल में वापस लाया जा सकता है. ई-वेस्ट में इन रेयर और कीमती सामग्रियों की सही से रीसाइक्लिंग के जरिए पैसा और रोजगार बनाने की बड़ी संभावनाएं हैं और यह छोटे और बड़े उद्यमों के लिए आय-सृजन के भारी अवसर प्रदान कर सकता है.

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