
कुछ तीन साल पहले की बात होगी, जब उदयपुर से दिल्ली आए एक परिचित ने मेरे सामने ही समोसे के ठेले पर लगभग फटकारते हुए कहा- चटनी अलग और समोसा अलग प्लेट में लगाइएगा. ये निर्देश एक नहीं, कई बार दिया गया. उन्हें चटनी चाहिए तो थी, लेकिन समोसे से टच करती हुई नहीं. खाने का हर आइटम अलग-अलग दिखने की ये सनक कई लोगों में दिख जाती है. सूखी सब्जियां भी अलग प्लेट में होती हैं, यहां तक कि चावल परोसने वाला चमचा गलती से दाल पर नहीं छूना चाहिए.
ग्रीक और लैटिन शब्दों से मिलकर बना ब्रूमोटेक्टिलोफोबिया
आसान भाषा में इसे फूड सेपरेटिजम कहते हैं. इसका वैज्ञानिक नाम है ब्रूमोटेक्टिलोफोबिया. फीअर ऑफ टचिंग फूड. ब्रूमोटेक्टिलोफोबिया शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है. ब्रूनो ग्रीक भाषा से निकला शब्द है, जिसे ब्रोमैटो भी कहते हैं. ये खाने के लिए इस्तेमाल होता है. वहीं टैक्टिलो लैटिन के टैक्टि से निकला है, जिसका अर्थ है स्पर्श.
साइंस के मुताबिक ये एक तरह का ऑब्सेसिव कंप्लसिव डिसऑर्डर (OCD) है, जो किसी में कम तो किसी में बहुत ज्यादा होता है. ऐसे लोग आमतौर पर सार्वजनिक मौकों पर खाना खाने से ही बचते हैं, या फिर अगर खाना ही पड़े तो बीमार हो जाते हैं.
क्या कहती है रिसर्च
साल 2016 में पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग ने इसपर पहली बार रिसर्च की. इसमें पाया गया कि ऐसे अमेरिकियों की संख्या लगातार बढ़ रही है जो ब्रूमोटेक्टिलोफोबिया के शिकार हैं. वे अपना बड़ा समय खाने को अलग-अलग परोसने में लगाते हैं. रिसर्च में हालांकि कई दूसरे फूड पैटर्न भी दिखे, जैसे प्लेट की सबसे स्वादिष्ट चीज को सबसे आखिर तक बचाकर रखने वालों की संख्या सबसे ज्यादा थी. वहीं 7 प्रतिशत लोग फूड सेपरेटिस्ट थे. वे सारे आइटम्स को एक साथ मिलाकर परोसी गई थाली देखते ही उखड़ गए.
ब्रूमोटेक्टिलोफोबिया की पक्की वजह नहीं पता लग सकी, लेकिन मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक ये बचपन में खाने-पीने की आदतों का नतीजा है. अगर पैरेंट्स बच्चे को लंबी-चौड़ी थाली सजाकर देंगे तो उन्हें इसकी ही आदत लग जाएगी जो वक्त के साथ बढ़ती जाएगी. वहीं इसे ओसीडी से भी जोड़ा जाता है. कई बार कला के क्षेत्र में काम करने वाले या परफेक्शनिस्ट लोगों में भी ये दिखता है.
क्या है ओसीडी
ये एक तरह की मानसिक बीमारी है, जिसके मरीज में बार-बार किसी चीज को लेकर एक तरह का खयाल आता है. आमतौर पर ये सफाई या खाने-पीने की आदत से जुड़ा होता है. जैसे वे एक ही चीज को बार-बार साफ करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि कहीं जर्म्स न आ जाएं. वे एक ही बात बार-बार सोचते या दोहराते हैं. बार-बार हाथ धोना, या फिर बार-बार ये चेक करना कि गैस का बटन ठीक से बंद है या नहीं, ये भी इसी श्रेणी में है.
क्या परेशानी होती है
इसमें मरीज में एक तरह का ऑब्सेशन आ जाता है. फूड सेपरेटिस्ट भी ओसीडी के दायरे में आते हैं. दूसरी बीमारियों की तरह इसमें भी बीमारी की हल्की से लेकर गंभीर अवस्था होती है. बीमारी की एडवांस स्टेज में उन्हें अपने आसपास के लोगों से तालमेल बिठाने में दिक्कत होने लगती है. वे फ्लैजिबल नहीं हो पाते और बात रिश्तों के टूटने या घरेलू हिंसा तक चली जाती है, सिर्फ इसलिए कि थाली में खाना एक-दूसरे से छू रहा है. पब्लिक लाइफ के साथ ऐसे लोग जल्दी तालमेल नहीं बिठा पाते.
ऑटिस्टिक लोगों को भी तकलीफ
ऑटिज्म से ग्रस्त लोगों में भी फूड सेपरेटिज्म दिखता है. इसपर काम करने वाली अमेरिकी संस्था ऑटिज्म स्पीक्स के अनुसार एक थाली में एक साथ खाने की कई चीजें परोसने पर मरीज के सेंसरी ऑर्गन्स ठीक से काम नहीं कर पाते. वे तय नहीं कर पाते हैं कि कैसे खाना है, या किस स्वाद को पहले ट्राय करना है. ऐसे में वे ज्यादा समय खाने की एक डिश को, दूसरी डिश से अलग करने में बिता देते हैं और खा नहीं पाते. कई बार ये भी देखा गया कि ऐसे मौके पर ऑटिस्टिक लोग आक्रामक व्यवहार करने लगते हैं क्योंकि उनके सेंसरी ऑर्गन्स तालमेल नहीं बिठा पाते.