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ये भारतीय एस्ट्रोनॉट्स जाएंगे Gaganyaan में, सामने आया पहला Video

ISRO के ह्यूमन स्पेस फ्लाइट मिशन यानी गगनयान (Gaganyaan) के लिए जिन चार पायलट्स का चुनाव हुआ है. जिनकी ट्रेनिंग चल रही है, उनका पहला वीडियो सामने आ गया है. दावा किया जा रहा है इस वीडियो में एक्सरसाइज करते हुए जवान भारतीय वायुसेना के टेस्ट पायलट्स हैं. आप भी देखिए यह Video...

इस वीडियो में गगनयान के एस्ट्रोनॉट्स की शक्ल नहीं दिखाई गई है लेकिन इन्हें एक्सरसाइज करते हुए दिखाया गया है. (फोटोः ISRO/IAF) इस वीडियो में गगनयान के एस्ट्रोनॉट्स की शक्ल नहीं दिखाई गई है लेकिन इन्हें एक्सरसाइज करते हुए दिखाया गया है. (फोटोः ISRO/IAF)
ऋचीक मिश्रा
  • नई दिल्ली,
  • 04 अक्टूबर 2023,
  • अपडेटेड 9:19 AM IST

Gaganyaan के एस्ट्रोनॉट्स का पहला वीडियो सामने आ गया है. इसमें एक जिम में इन टेस्ट पायलट्स को एक्सरसाइज करते दिखाया जा रहा है. वीडियो में ऊपर इंडियन एयरफोर्स और इसरो का लोगो लगा है. साभार भी इसरो को दिया गया है. इसमें दिखाया जा रहा है कि चिनूक हेलिकॉप्टर से RLV-TD को आसमान से गिराया जाता है. 

उसकी सही सलामत लैंडिंग होती है. इसके बाद इन पायलट्स का शॉट आता है. जिसमें ये लोग जिम में व्यायाम करते दिख रहे हैं. सोशल मीडिया पर यह वीडियो वायरल हो रहा है. असल में Chandrayaan-3 और Aditya-L1 की सफलता के बाद इसरो के सामने गगनयान सबसे बड़ा मिशन है. इनमें से कोई एक पायलट अगले साल अंतरराष्ट्रीय स्टेशन की यात्रा पर भी जा सकता है.  

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26 अक्टूबर को इसकी संभावित टेस्ट उड़ान हो सकती है. हालांकि अभी तक इसरो ने आधिकारिक तौर पर लॉन्च डेट की घोषणा नहीं की है. गगनयान को लेकर कई तरह की तैयारियां चल रही हैं. इस मिशन में सबसे ज्यादा जरूरी है LVM-3 रॉकेट को गगनयान क्रू-मॉड्यूल ढोने लायक बनाना. उसे पूरी तरह से ह्यूमन रेटेड बनाना. 

LVM-3 को ह्यूमन रेटेड बनाना क्यों जरूरी

LVM-3 को H-LVM3 में बदलना जरूरी है ताकि धरती के चारों तरफ 400 km वाली गोलाकार ऑर्बिट में क्रू मॉड्यूल को पहुंचाया जा सके. यहां पर H का मतलब ह्यूमन रेटेड है. बाद में रॉकेट का नाम HRLV होगा. यानी ह्यूमन रेटेड लॉन्च व्हीकल (Human Rated Launch Vehicle). 

क्रू एस्केप सिस्टम पर ज्यादा फोकस

इस रॉकेट में फेल्योर से ज्यादा सुरक्षा पर ध्यान दिया जाएगा. जैसे क्रू एस्केप सिस्टम. यानी किसी भी तरह का खतरा होने पर क्रू मॉड्यूल हमारे एस्ट्रोनॉट्स को लेकर सुरक्षित वापस लेकर आ जाए. रॉकेट में गड़बड़ी होने पर उसके किसी भी स्टेज से दूर ले जाकर एस्ट्रोनॉट्स को सेफ रखे. अगर कोई इमरजेंसी आती है तो क्रू मॉड्यूल एस्ट्रोनॉट्स को लेकर समुद्र में गिर जाएगा. 

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इसरो के वैज्ञानिकों ने चार से पांच अलग-अलग तरह के खतरों पर काम किया है. ताकि इन खतरों से क्रू मॉड्यूल हमारे गगननॉट्स को बचा सके. हर खतरे पर क्रू मॉड्यूल अलग तरह से रिएक्ट करेगा. वह ऊंचाई और गति भी खुद नियंत्रित करके एस्ट्रोनॉट्स को सुरक्षित वापस जमीन पर लाएगा. 

अभी कई तरह के टेस्ट बाकी 

ISRO अभी गगनयान के क्रू मॉड्यूल के हाई-एल्टीट्यूड ड्रॉप टेस्ट करवा रहा है. पैड एवॉयड टेस्ट करवा रहा है. जिसमें क्रू एस्केप सिस्टम रॉकेट से अलग होकर 2 किलोमीटर दूर जाकर गिरेगा. अभी टेस्ट व्हीकल प्रोजेक्ट बी है. जिसमें जीएसएलवी बूस्टर यानी L-40 इंजनों की जांच होनी है. क्योंकि क्रू मॉड्यूल रॉकेट के ऊपर लगाया जाएगा. 

यह इंजन क्रू मॉड्यूल को 10 किलोमीटर की ऊंचाई से सुरक्षित वापस लाएगा. इसकी जांच अभी होनी बाकी है. इसके बाद ही गगनयान के दो अगले लॉन्च मिशन होंगे. ऑर्बिटल मॉड्यूल की तैयारियों के लिए हम अलग से फैसिलिटी बना रहे हैं. क्योंकि इसका अपना सर्विस मॉड्यूल होगा. इन दोनों को एकसाथ असेंबल करना होगा. इसलिए अलग फैसिलिटी की जरूरत है. यहां पर सभी मॉड्यूल्स की जांच, जुड़ाव और टेस्टिंग होगी. 

गगनयान के लिए अलग फैसिलिटी

असेंबलिंग एरिया में अलग क्लीन रूम भी बनवाया जा रहा है. ताकि क्रू मॉड्यूल की सेहत पर नजर रखी जा सके. गगनयान के लिए अलग से कंट्रोल फैसिलिटी बन रही है, जहां पर सभी गगननॉट्स, क्रू मॉड्यूल और लॉन्च व्हीकल की सेहत पर नजर रखी जाएगी. सुधार किया जाएगा. हम इसके लिए पुरानी लॉन्च व्हीकल फैसिलिटी को ठीक कर रहे हैं. जिसे LCC नाम दिया गया है. 

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क्रू मॉड्यूल के लिए एनवायरमेंटल कंट्रोल सिस्टम पहुंच चुका है. उसकी जांच-पड़ताल लगातार LCC में हो रही है. इसके अंदर तापमान 25 से 27 डिग्री सेंटीग्रेड बनाए रखना जरूरी है. इसके अंदर पानी का जमावड़ा न हो. यहां एस्ट्रोनॉट जो कार्बन डाईऑक्साइड छोड़े उसका बाहर निकलना जरूरी है. अंदर ऑक्सीजन और नाइट्रोजन का संतुलन जरूरी है. गगननॉट्स के सूट ऐसे होने चाहिए कि इमरजेंसी में वो ऑक्सीजन सप्लाई कर सकें. 

क्रू-मॉड्यूल की रिकवरी के टेस्ट चल रहे हैं 

गगनयान के लैंडिंग के बाद उसे समुद्र से रिकवर करने के लिए भारतीय नौसेना (Indian Navy) और इसरो लगातार सर्वाइवल टेस्ट कर रहे हैं. कभी कोच्चि में तो कभी बंगाल की खाड़ी में. क्रू मॉड्यूल रिकवरी मॉडल (Crew Module Recovery Model) की टेस्टिंग के दौरान उसका वजन, सेंटर ऑफ ग्रैविटी, बाहरी ढांचे आदि की जांच की गई. ये जांच उसी तरह से की जा रही है, जिस तरह से लैंडिंग और उसके बाद रिकवरी की जाएगी. ह्यूमन स्पेसफ्लाइट का अंतिम चरण क्रू मॉड्यूल की रिकवरी को माना जाता है. इसलिए इसकी टेस्टिंग पहले हो रही है. 

क्या चीज है क्रू मॉड्यूल? 

गगनयान जिसे कह रहे हैं, उसके उस हिस्से को क्रू मॉड्यूल (Crew Module) कहते हैं, जिसमें एस्ट्रोनॉट्स बैठकर धरती के चारों तरफ 400 KM की ऊंचाई वाली निचली कक्षा में चक्कर लगाएंगे. क्रू मॉड्यूल डबल दीवार वाला अत्याधुनिक केबिन है, जिसमें कई प्रकार के नेविगेशन सिस्टम, हेल्थ सिस्टम, फूड हीटर, फूड स्टोरेज, टॉयलेट आदि सब होंगे.  

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क्रू मॉड्यूल का अंदर का हिस्सा लाइफ सपोर्ट सिस्टम से युक्त होगा. यह उच्च और निम्न तापमान को बर्दाश्त करेगा. साथ ही अंतरिक्ष के रेडिएशन से गगननॉट्स को बचाएगा. वायुमंडल से बाहर जाते समय और आते समय इसके अंदर बैठे हुए अंतरिक्षयात्रियों को किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी. वायुमंडल में प्रवेश करने से पहले मॉड्यूल अपनी धुरी पर खुद ही घूम जाएगा. ताकि हीट शील्ड वाला हिस्सा वायुमंडल के घर्षण से यान को बचा सके. 

वायुमंडल में आते ही अलर्ट हो जाएगी नौसेना-कोस्ट गार्ड

हीट शील्ड जहां वायुमंडल के घर्षण से पैदा गर्मी से बचाएगा वहीं समुद्र में लैंडिंग के समय पानी की टकराहट से लगने वाली चोट को भी. हालांकि क्रू मॉड्यूल को समुद्र में स्प्लैश डाउन करते समय उसके पैराशूट खुल जाएंगे. ताकि इसकी लैंडिंग सुरक्षित हो सके. इसके उतरते ही भारतीय तट रक्षक बल (Indian Coast Guard) या भारतीय नौसेना (Indian Navy) के पोत इसे संभालकर उठा लेंगे.  

क्रू मॉड्यूल को जो मॉडल फिलहाल ISRO ने आम लोगों के लिए प्रदर्शित किया है, उसके अंदर दो लोगों के बैठने की व्यवस्था है. इसके अलावा इसमें दो तरह के मॉनीटर लगाए गए हैं. जो इसके नेविगेशन, एवियोनिक्स, प्रोपल्शन, लैंडिंग, पैराशूट खुलने आदि के निर्देशों को देने में मदद करेंगे. साथ ही धरती के साथ संपर्क साधने में भी ये कंप्यूटर कंसोल अंतरिक्षयात्रियों की मदद करेंगे. 

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क्या है सर्विस मॉड्यूल, क्या काम करेगा वो?

अभी की तैयारी के हिसाब से अंतरिक्षयात्रियों को धरती की निचली कक्षा में ले जाने से पहले गगनयान के क्रू मॉड्यूल के दो मानवरहित मिशन पूरे किए जाएंगे. ताकि उसके अंदर की सभी तकनीकी प्रणालियों की जांच की जा सके. ये मिशन 16 मिनट में अपनी निर्धारित कक्षा में पहुंच जाएंगे. उसके बाद उन्हें वहां से समुद्र में लैंडिंग करने में करीब 36 मिनट का समय लगेगा. इसमें सर्विस मॉड्यूल से अलग होने, पैराशूट खुलने और धीरे-धीरे बंगाल की खाड़ी या अरब सागर में लैंड करना शामिल है. 

क्रू मॉड्यूल के नीच सर्विस मॉड्यूल लगा होगा. जिसके सोलर पैनल इसे अंतरिक्ष में यात्रा के दौरान ऊर्जा प्रदान करेंगे. ह्यूमन स्पेस फ्लाइट सेंटर के वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने बताया कि फिलहाल प्रदर्शित मॉडल में कई तरह के बदलाव संभव हैं, लेकिन ये मोटी-मोटी जानकारी देने के लिए इस तरह से डिजाइन किया गया है. गगनयान के क्रू मॉड्यूल का व्यास 11 फीट, ऊंचाई 11.7 फीट और वजन 3735 किलोग्राम है. गगनयान की पहली इंसानी उड़ान 2024 से पहले नहीं हो पाएगी. क्योंकि अंतरिक्षयात्रियों की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जा रहा है. 

बेंगलुरू में चल रही है गगननॉट्स की ट्रेनिंग

गगनयान के लिए भारतीय वायुसेना के चार पायलटों ने रूस में अपनी ट्रेनिंग पूरी कर ली है. इन्हें मॉस्को के नजदीक जियोजनी शहर में स्थित रूसी स्पेस ट्रेनिंग सेंटर में एस्ट्रोनॉट्स बनने का प्रशिक्षण दिया गया था. गैगरीन कॉस्मोनॉट्स ट्रेनिंग सेंटर में भारतीय वायुसेना के पायलटों की ट्रेनिंग हुई थी. भारतीय वायुसेना के चार पायलट जिनमें एक ग्रुप कैप्टन हैं. बाकी तीन विंग कमांडर हैं, उन्हें गगनयान के लिए तैयार किया जा रहा है. फिलहाल इन्हें बेंगलुरू में गगनयान मॉड्यूल की ट्रेनिंग दी जा रही है. 

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