
एवरेस्ट माउंटेन पर पहली बार चढ़ने वाले नेपाली शेरपा तेनजिंग नोर्गे के गांव थमे में 16 अगस्त 2024 यानी कल भयानक फ्लैश फ्लड, भूस्खलन हुआ. एवरेस्ट से ही तेजी से बहते हुए आपदा आई. थमे शेरपा गांव के घरों, होटलों को मिलाकर 45 इमारतें बर्बाद हो चुकी हैं. यह घटना ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की वजह से हुई है. यानी हिमालय की ऊंचाई वाले इलाके में बनी झील के टूटने से.
इस बारे में जब ग्लेशियर हजार्ड एक्सपर्ट और IIT भुवनेश्वर में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आसिम सत्तार से aajtak.in ने पूछा तो उन्होंने बताया कि थमे घाटी के ऊपरी हिस्से में चार ग्लेशियल लेक्स हैं. इसे आप यहां नीचे तस्वीर में देख सकते हैं. डॉ. सत्तार ने इनकी मार्किंग की. फिर उन्होंने बताया कि लेक 3 की बाउंड्री टूटी. ये एक मोरेन बाउंड्री थी. यानी कमजोर मिट्टी और पत्थर से बनी दीवार.
यह भी पढ़ें: नेपाल में आपदा... पहली बार एवरेस्ट फतह करने वाले तेनजिंग नोर्गे के गांव में एवरेस्ट से ही आई प्रलय
इस तस्वीर में डॉ. सत्तार ने साफ-साफ GLOF की वजह से आई अचानक बाढ़ का रास्ता भी समझाया है. ये जानकारी उन्होंने कल ही ट्विटर यानी एक्स हैंडल पर शेयर की थी. आज वो उस इलाके के ऊपर से गुजरने वाली सैटेलाइट का इंतजार कर रहे थे. इसका डेटा अभी तक नहीं मिला है. लेकिन वहां हुए एक हेलिकॉप्टर सर्वे से उनकी संभावना को पुष्टि मिलती है.
हेलिकॉप्टर सर्वे से पता चला झील के टूटने का
हेलिकॉप्टर सर्वे से पता चला कि लेक 3 टूटी थी. उसकी मोरेन दीवार टूट गई थी. पानी तेजी से नीचे आया. उसने सामने वाले पहाड़ के निचले हिस्से में इरोशन किया. इसके बाद वह तेजी से थमे शेरपा गांव की ओर गया. ये सर्वे खुंभू पासंगलहमु रूरल म्यूनिसिपलिटी ने करवाया था. इससे यह बात पुख्ता हो गई थी कि ग्लेशियल लेक्स कितने खतरनाक हैं. ये निचले इलाके के लोगों पर तबाही ला सकते हैं.
यह भी पढ़ें: नीचे से गायब हो जाएगी जमीन... 16 साल में मुंबई का इतना हिस्सा निगल लेगा समंदर
डॉ. आसिम सत्तार ने बताया कि ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ने की वजह से ग्लेशियर पिघल रहे हैं. लेक्स बन रही हैं. हिमालय में पिछले कुछ वर्षों में ये घटनाएं बढ़ी हैं. ऊंचे हिमालय में ऐसी झीलों की जांच होनी चाहिए. ताकि इस तरह की घटनाएं न हों. साइंटिफिक इन्वेस्टिगेशन होना चाहिए. ताकि एक्सपोजर का पता चल सके.
इससे पहले 1985 में भी इस घाटी में हुआ था GLOF
थमे घाटी में इससे पहले 1985 में भी ऐसी ही आपदा आई थी. तब ताशी लाप्चा पास के नजदीक दिग शो नाम का बर्फीला इलाका है. यहां पर पास में बनी झील टूट गई थी. तब ऊपर से आई बाढ़ ने थमे हाइड्रोपावर को बर्बाद कर दिया था. इस बाढ़ का फ्लो भी थमे गांव की तरफ ही था.
यह भी पढ़ें: महाभूकंप... जापान का सबसे बड़ा डर, क्या समंदर की घाटी दोहराने वाली है 2011 का जलप्रलय
क्या हुआ 16 अगस्त 2024 को?
थेंगबो ग्लेशियर पर बनी झीले के टूटने से थमे नदी के बहाव के बढ़ोतरी हुई. थमे नदी की दूसरी शाखा दूधकोशी में भी बाढ़ आ गई है. भूस्खलन हुआ. थमे गांव का आधा हिस्सा पूरी तरह से बर्बाद हो गया है. ये झील ताशी लापचा पास के नजदीक है. इस इलाके में लगातार बारिश हो रही है. यहां नीचे मैप देखकर आप इसे समझ सकते हैं.
मौसम विभाग ने भी चेतावनी दी थी कि इस हफ्ते शुक्रवार, शनिवार और रविवार को भयानक बारिश हो सकती है. ऐसा बंगाल की खाड़ी में बने लो प्रेशर एरिया की वजह से हो रहा है. लुंबिनी और गंडकी प्रांत में ज्यादा बारिश की संभावना है. कीचड़ और भूस्खलन की आशंका है.
यह भी पढ़ें: 2100 AD तक हिमालय की सुनामी से हिंद महासागर के जलप्रलय तक... देश के इन इलाकों को है सबसे बड़ा खतरा!
इसी गांव से निकले हैं एवरेस्ट फतह करने वाले कई शेरपा
थमे गांव खुंभू घाटी में 12,500 फीट की ऊंचाई पर मौजूद है. यह नामचे बाजार के पास है. यहीं से एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाले अपनी यात्रा के अंतिम पड़ाव की शुरूआत करते हैं. इस गांव से कई प्रसिद्ध शेरपा निकले हैं, जिन्होंने एवरेस्ट पर फतह की है. जैसे- अपा शेरपा, कमी रिता शेरपा, लाकपा रिता शेरपा.
क्या होता है ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF)?
GLOF का मतलब ये होता है कि ग्लेशियर के पिघलने से बनी अस्थाई बर्फ और पानी की झील. जिसकी दीवार मिट्टी या बर्फ की हो सकती है. गर्मी से बर्फ की दीवार पिघलती है. या तेज बारिश से मिट्टी की दीवार टूट जाती है. इससे झील में जमा पानी तेजी से निचले इलाके की तरफ जाता है.
केदारनाथ के ऊपर चोराबारी झील, पिछले साल सिक्किम में आई आपदा, इसके अलावा चमोली में हुआ हादसा. ये सभी ग्लेशियल लेक के टूटने से आई बाढ़ की वजह से हुआ. पूरे हिमालय पर 12 हजार से ज्यादा छोटे-बड़े ग्लेशियर हैं. जो लगातार ग्लोबल वॉर्मिंग से पिघल रहे हैं. इनके पिघलने से ग्लेशियल झीलें बनती हैं.
यह भी पढ़ें: Himalaya की बर्फीली झीलों को लेकर ISRO का बड़ा खुलासा... सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र के ऊपर मुसीबत
भारत-नेपाल-भूटान पहले भी झेल चुके हैं ऐसी आपदाएं
इन ग्लेशियरों से बनने वाली झीलों के टूटने का खतरा बना रहता है. 1985 में नेपाल में दिग त्शो झील के टूटने से बड़ी आपदा आई थी. 1994 भूटान में लुग्गे त्सो झील टूटने से भी ऐसी ही आपदा आई थी. 2013 में केदारनाथ हादसे ने 6 हजार से ज्यादा लोगों की जान ले ली थी. यहां भी चोराबारी ग्लेशियर टूटा था.
सिक्किम में साउथ ल्होनक झील ग्लेशियर के पिघलने से निकले पानी से बनी झील है. जो मोरेन टूटा है वह करीब 54 फीट ऊंचा था. 54 फीट ऊंची प्राकृतिक दीवार टूट गई. झील की गहराई 394 फीट है. यह पिछले चार दशकों से 0.10 वर्ग km से लेकर 1.37 वर्ग km की दर से बढ़ती जा रही थी.
साउथ ल्होनक झील पहले से ही टूटने की कगार पर थी. वैज्ञानिकों ने दो साल पहले यानी साल 2021 में ही इस लेक के टूटने की आशंका जताई थी. यह झील करीब 168 हेक्टेयर इलाके में फैली थी. जिसमें से 100 हेक्टेयर का इलाका टूट कर खत्म हो गया. यानी इतने बड़े इलाके में जमी बर्फ और पानी बहकर नीचे की ओर आया है.
2014 में झेलम नदी में फ्लैश फ्लड आने की वजह से कश्मीर के कई इलाकों में बाढ़ आ गई थी. 2005 में हिमाचल प्रदेश परेचू नदी में फ्लैश फ्लड से तबाही मची थी. फरवरी 2021 में चमोली जिले के ऋषि गंगा, धौलीगंगा और अलकनंदा नदियों में भी ऐसा ही फ्लैश फ्लड आया था.
हिमालय पर कम हो रहे हैं ठंडी वाले दिन
लगातार बढ़ते तापमान की वजह से हिमालय पर Cold Days घटते जा रहे हैं. हिमालय का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है. कोल्ड डेज़ और कोल्ड नाइट्स की गणना के लिए जम्मू और कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में 16 स्टेशन हैं. लगातार गर्म दिन बढ़ रहे हैं. जबकि ठंडे दिन कम हो रहे हैं. पिछले 30 वर्षों में ठंडे दिनों में 2% से 6% की कमी आई है.
हिमालय के पहाड़ काफी अनस्टेबल
किसी भी ग्लेशियर के पिघलने के पीछे कई वजहें हो सकती है. जैसे- जलवायु परिवर्तन, कम बर्फबारी, बढ़ता तापमान, लगातार बारिश आदि. गंगोत्री ग्लेशियर के मुहाने का हिस्सा काफी ज्यादा अनस्टेबल है. ग्लेशियर किसी न किसी छोर से तो पिघलेगा ही. अगर लगातार बारिश होती है तो ग्लेशियर पिघलता है. डाउनस्ट्रीम में पानी का बहाव तेज हो गया था. बारिश में हिमालयी इलाकों की स्टेबिलिटी कम रहती है. ग्लेशियर पिघलने की दर बढ़ जाती है.