
ग्रीन चिल्ड्रन ऑफ वूलपिट! ये नाम आज भी साइंटिस्ट्स के लिए अजूबा बना हुआ है. इंग्लैंड के वूलपिट गांव में अचानक दो बच्चे आए, जो सिर से पैर तक हरे रंग के थे. वे भाषा भी अलग बोल रहे थे और इंसानों का परोसा खाना देखकर बिदक रहे थे. बच्चों को ग्रीन चिल्ड्रन कहा गया. कई साल रहने के बाद रहस्यमयी तरीके से एक बच्चे की मौत हो गई, और दूसरी बच्ची गायब हो गई. माना जाता है कि ये एलियंस के भेजे गए बच्चे रहे होंगे, जो इंसानों पर नजर रखने आए होंगे.
इस तरह शुरू हुई कहानी
वाकया 12वीं सदी का है, जब बरी सेंट एडमंड्स से कुछ मील दूर एक छोटे से गांव की सीमा पर लोगों को दो बच्चे मिले. ये बच्चे भेड़िए पकड़ने के लिए बनाए एक गड्ढे में गिरे हुए थे. बेहद गहरे खड्ड से बच्चों को निकाल तो लिया गया, लेकिन गांववालों के सामने अजब मुसीबत आ गई. वे अलग ही भाषा में बोल रहे थे और लोगों से डर रहे थे.
समझा-बुझाकर उन्हें गांव के एक अमीर शख्स के घर ठहराया गया. यहां पर लोग लगातार उनसे मिलने और उनका सच जानने की कोशिश करने लगे, लेकिन कोई कामयाब नहीं हुआ. यहां तक कि वे मीट-मछली, चावल जैसी चीजों को हाथ भी नहीं लगाते थे, बल्कि कच्ची सब्जियां चबाया करते थे.
बच्चे की रहस्यमयी मौत के बाद लड़की भी हुई लापता
इससे भी अजीब बात ये थी कि उन्होंने हरे रंग के जो कपड़े पहन रखे थे, वो किसी अलग ही मटेरियल से बना लगता था, जिसके बारे में उस दौर में किसी को नहीं पता था. वक्त के साथ वे आम इंसानों वाला खाना खाने लगे. साथ ही उनके शरीर और बालों का गहरा हरा रंग भी हल्का पड़ने लगा. इसी बीच गांववालों ने बच्चों का बपतिस्मा कराना चाहा. ये कैथोलिक धर्म का एक संस्कार है. रस्म करके लौटते हुए बच्चा एकाएक बीमार हुआ और कुछ ही घंटों में खत्म हो गया. बच्ची हालांकि जिंदा रही, जिसे नाम मिला एग्नीस बरे.
अंग्रेजी बोलना सीखने के बाद एग्नीस ने एक अलग ही कहानी सुनाई. उसने बताया कि वे लोग किसी सेंट मार्टिन नाम की जगह पर रहते, जहां हर कोई हरे रंग का ही था. वहां सूरज भी नहीं निकलता था. बच्ची को ये याद नहीं था कि वो वहां से भेड़िया पकड़ने वाले गड्ढे में कैसे आ गए. बच्ची कुछ समय तक गांववालों के बीच रही, फिर एकाएक वो गायब हो गई.
कई जगहों पर मिलता है जिक्र
12वीं सदी के इतिहासकार रेल्फ ऑफ कॉगशल ने अपने कई क्रॉनिकल्स में इन बच्चों का जिक्र किया. बाद में इन्हें हिस्ट्री ऑफ इंग्लिश अफेयर्स में भी जगह मिली. न्यूयॉर्क की फोर्डहम यूनिवर्सिटी की मॉर्डन हिस्ट्री सोर्सबुक में भी ग्रीन चिल्ड्रन के ब्रिटिश गांव में आने की बात मिलती है.
क्यों हरे रंग के दिखते थे बच्चे
काफी समय बाद क्रॉनिकल्स को पढ़ते हुए वैज्ञानिक समझने की कोशिश करने लगे कि आखिर वे बच्चे हरे रंग के क्यों थे. कुछ न कहा कि उन्हें शायद आर्सेनिक देकर मरने के लिए छोड़ दिया गया, जिससे उनका रंग गहरा हरा हो गया था. कुछ थ्योरीज के मुताबिक, बच्चों को शायद क्लोरोसिस नाम की बीमारी थी, जिसमें पोषण न मिलने की वजह से रंग हरा या अलग दिखने लगता था. बाद में नॉर्मल खाना खाकर वे सामान्य इंसानों की तरह हो गए .
एलियंस से भी जोड़ा गया
एक थ्योरी और भी आई. वैज्ञानिक इन बच्चों का एलियंस से कनेक्शन बताने लगे. 17वीं सदी के वैज्ञानिक रॉबर्ट बर्टन ने द अनॉटमी ऑफ मेलन्कली में लिखा कि वे किसी दूसरे ग्रह के थे, जो गलती से, या जानबूझकर यहां आए. हालांकि इस बात का किसी के पास भी कोई प्रमाण नहीं था. उनके हरे रंग, हरे कपड़ों और अलग भाषा को देखकर ये अनुमान लगाया गया.
कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो मानते हैं कि ग्रीन चिल्ड्रन कोरी गप है. ऐसा कोई बच्चा ब्रिटेन तो दूर, दुनिया के किसी गांव में नहीं आया होगा. लेकिन फिर ये सवाल आता है कि गांव की सीमा पर एक बोर्ड क्यों लगा है, जिसपर हरे बच्चों की तस्वीरें बनी हुई हैं! कहीं न कहीं, कुछ सच तो रहा ही होगा, जो प्रतीकों में भी दिखता है.
क्या एलियंस की संतानें हैं हम
12वीं सदी के इस दावे को इसलिए भी नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि आज भी इसी तरह के क्लेम हो रहे हैं. कुछ समय पहले वैज्ञानिकों ने दावा किया कि हम इंसान ही असल में एलियंस हैं, जो अपने ग्रह के धरती पर भेज दिए गए.
अमेरिका के इकोलॉजिस्ट डॉ. एलिस सिल्वर अपनी किताब 'ह्यूमंस आर नॉट फ्रॉम अर्थ : अ साइंटिफिक इवॉल्यूशन' में इसकी कई वजहें देते हैं. वे कहते हैं कि सारी स्पीशीज में इंसान अकेले हैं, जिन्हें पीठ में दर्द होता है. शायद इंसानी सभ्यता की शुरुआत में ये दर्द और भी ज्यादा रहा होगा. इसकी वजह ये हो सकती है कि हम कम ग्रैविटी वाली प्रजाति से रहे होंगे, जिन्हें एकदम से धरती के गुरुत्वाकर्षण में भेज दिया गया.
साइंटिस्ट और भी कई तर्क देते हैं, जो बताते हैं कि स्पेस में कहीं न कहीं एलियंस हैं, जिनका हमसे कुछ कनेक्शन भी है. जैसे हमारे खून में पाया जाने वाला अलग-अलग Rh फैक्टर. या फिर धरती के सबसे विकसित जीव होने के बाद भी इंसानी शिशुओं का बाकी प्रजातियों में सबसे कमजोर होना. दूसरी स्पीशीज में बच्चे तुरंत अपने काम करने लगते हैं, लेकिन हमें संभलने में लंबा समय लगता है. ये वैसा ही है, जैसे अंटार्कटिका के पौधे को डेथ वैली में लगाने पर उसका जीवन के लिए संघर्ष करना.