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पेट के बैक्टीरिया करने लगे ब्रेन पर कंट्रोल, इस रास्ते से होकर पहुंचते हैं मस्तिष्क तक

अब तक आंतों के बैक्टीरिया के बारे में खूब अच्छी-अच्छी बातें होती रहीं. गट बैक्टीरिया को बढ़ाने वाली डायट और एक्सरसाइज भी सुझाई जाती रहीं. लेकिन अब पता लगा है कि पेट के ये बैक्टीरिया सिर्फ खाना पचाने या इम्यूनिटी बढ़ाने का काम नहीं करते, वे चुपके-चुपके हमारे दिमाग को भी कंट्रोल कर रहे हैं. इसे गट-ब्रेन एक्सिस कहा जाता है.

गट माइक्रोबेटा खाना पचाने में मदद करते हैं सांकेतिक फोटो (Unsplash) गट माइक्रोबेटा खाना पचाने में मदद करते हैं सांकेतिक फोटो (Unsplash)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 25 जनवरी 2023,
  • अपडेटेड 12:05 PM IST

हमारे पेट, खासकर गैस्ट्रोइंटेस्टिनल ट्रैक्ट में खरबों बैक्टीरिया रहते हैं. इनकी असल संख्या पता नहीं, लेकिन वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ये 30 ट्रिलियन से लेकर 4 सौ ट्रिलियन तक भी हो सकते हैं. गट माइक्रोबेटा कहलाने वाले ये बैक्टीरिया मां के गर्भ में नहीं होते, लेकिन जैसे ही शिशु बाहर आता है, ब्रेस्ट मिल्क के जरिए उसकी आंतों में भी पहुंच जाते हैं. तभी से खाना पचाने और इम्यूनिटी बढ़ाने का जिम्मा ये लेते हैं. इन्हें गुड बैक्टीरिया भी कहा जाता है. 

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क्या है गट-ब्रेन कनेक्शन
गट बैक्टीरिया को शुरुआत में सिर्फ डायजेशन से जोड़कर देखा जाता रहा, लेकिन फिर गट-ब्रेन कनेक्शन की बात दिखी. कुल सालों पहले माइक्रोसाइंटिस्ट जेन फॉस्टर लैब में चूहों के दो समूहों के साथ प्रयोग कर रही थीं. एक समूह में गट बैक्टीरिया थे, जबकि दूसरों में नहीं. कुछ ही समय में दिखने लगा कि वे चूहे ज्यादा परेशान रहते थे, जिनकी आंतों में बैक्टीरिया थे. वे जल्दी फैसला नहीं ले पाते थे और ज्यादा आक्रामक भी थे. साइंटिस्ट ने दोनों ही समूहों को एक भूलभुलैया में रखा और पाया कि बैक्टीरिया वाले चूहे काफी देर बाद रास्ता खोज सके, जबकि दूसरा समूह फटाफट बाहर निकलता गया. 

कनाडा की मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर हुए इस प्रयोग ने पहली बार खाना पचाने वाले माइक्रोब्स के दूसरे कामों पर भी बात की. ये एक तरह का ब्रेन फॉग बनाते हैं, जिससे दिमाग बेचैन होता है और जल्दी कुछ फैसला नहीं ले पाता. 

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कैसे पहुंचते हैं ब्रेन तक
आंत की घुमावदार नलियों में रहने वाले बैक्टीरिया आखिर मस्तिष्क पर क्यों और कैसे असर डालते हैं? इस बात का निश्चित जवाब फिलहाल वैज्ञानिकों के पास भी नहीं है. ज्यादातर चूहों पर हो रहे प्रयोग में पॉर्किन्सन्स को देखा जा रहा है. पेट में मौजूद बैक्टीरिया ई-कोलाई एक प्रोटीन बनाता है, जिसे कर्ली कहते हैं. ये प्रोटीन दूसरे प्रोटीन्स को एक्टिवेट करती है, जिनमें से एक वो प्रोटीन है, जो पॉर्किन्सन्स  के लिए जिम्मेदार है. ये प्रक्रिया प्रोटीन-मिसफोल्डिंग कहलाती है. यहीं से ब्रेन के न्यूरोट्रांसमीटर को गलत सिग्नल मिलता है और बीमारी शुरू हो जाती है. 

पॉर्किन्सन्स और ऑटिज्म की एक वजह गट माइक्रोब्स को भी माना जा रहा है. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

बढ़ाता है ऑटिज्म का डर
ऑटिज्म को लेकर भी चूहों पर प्रयोग में पाया गया कि एक हद तक गट बैक्टीरिया इसके लिए जिम्मेदार हैं. प्रेग्नेंसी के दौरान किसी संक्रमण के होने से पेट के बैक्टीरिया टी-सेल्स को संदेश भेजते हैं. ये इम्यून सेल्स हैं, जिनका काम शरीर को खतरे से बचाना है. कोशिकाएं इम्यून मॉलिक्यूल्स पैदा करती हैं, जो कि फीटस के मस्तिष्क तक भी पहुंच जाता है और ऑटिज्म की आशंका बढ़ा देता है. 

वेगस नर्व्स बनती हैं डायरेक्ट हॉटलाइन
द लैंसेट के तहत आने वाली वैज्ञानिक जर्नल ई-बायो मेडिसिन में इसी को लेकर एक शोध आया. माइक्रोबेटा एंड गट-ब्रेन एक्सिस नाम से छपी रिसर्च में ये बताया गया कि आंतों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया का दिमाग से क्या संबंध है. वेगस नर्व्स इसके लिए सीधे रूट का काम करती है जो आंतों में हो रही हलचल का सिग्नल सीधे मस्तिष्क तक पहुंचाती है. गट हॉर्मोन्स, जैसे सीसीके, घ्रेलिन और 5-एचटी को भी इसके लिए जिम्मेदार माना जा रहा है. हालांकि अब तक ज्यादातर शोध चूहों पर हुए हैं. 

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सीमित ह्यूमन स्टडीज में से एक साल 2019 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में हुई. मानसिक बीमारियों से पीड़ित 71 लोगों को दो समूहों में बांटा गया. एक समूह को प्रोबायोटिक दिया गया ताकि उनमें गुड गट बैक्टीरिया बढ़े. दूसरे समूह को सामान्य खाना-पीना मिला. महीनेभर चली स्टडी में दिखा कि प्रोबायोटिक ले रहे प्रतिभागियों के मूड और दिमागी अवस्था में सकारात्मक बदलाव आए. 

 

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