
गर्मी बढ़ती है तो लोगों में फ्रस्टेशन बढ़ता है. इससे उनका उग्र स्वरूप सामने आता है. ऐसे में हिंसा बढ़ती है. लोग मानसिक बीमारियों के शिकार होने लगते हैं. हाल ही हुई स्टडी में इस बात का खुलासा हुआ है कि तापमान के ज्यादा बढ़ने की वजह से लोग डिहाइड्रेशन, डेलिरियम और बेहोश होने जैसी स्थितियों से परेशान होने लगते हैं. तापमान बढ़ रहा है क्योंकि इंसान जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के लिए जिम्मेदार है. इसकी वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग (Global Warming) बढ़ रही है.
हाल ही में हुई स्टडीज में इस बात का खुलासा हुआ है कि जब सामान्य तापमान से पारा 5 डिग्री सेल्सियस ऊपर जाता है, तब दुनिया भर के अस्पतालों में गर्मी से परेशान लोगों की संख्या में 10 फीसदी बढ़ोतरी होने लगती है. सबसे ज्यादा लोगों को मानसिक दिक्कत होती है. लोग चिड़चिड़े हो जाते हैं. डिप्रेशन के शिकार होने लगते हैं. बेचैनी बढ़ जाती है. दिन-दिन भर बेचैनी खत्म नहीं होती. कई बार कई दिनों तक यह बेचैनी बनी रहती है. इसमें वो हिंसक या उग्र हो जाते हैं.
गर्मी से बढ़ जाती हैं मानसिक सेहत संबंधी मौतें
ज्यादा तापमान बढ़ने के साथ ही खुदकुशी करने या इसका प्रयास करने वालों की संख्या में भी बढ़ोतरी होती है. मोटा-मोटा देखें तो हर महीने अगर तापमान में औसत वृद्धि 1 डिग्री सेल्सियस होती है तो मानसिक सेहत संबंधी मौतों की संख्या में 2.2 फीसदी की बढ़ोतरी होती है. साथ ही अगर ह्यूमिडिटी बढ़ जाए तो करेला नीम चढ़ा वाली कहावत सही हो जाती है. यानी खुदकुशी करने वालों की संख्या बढ़ जाती है.
गर्मी कम रहती है तो मानसिक बीमारियां नियंत्रित होती हैं
ह्यूमिडिटी और तापमान में लगातार हो रहे बदलाव या बढ़ोतरी इंसानों द्वारा किये जा रहे जलवायु परिवर्तन का नतीजा है. इस गर्मी की वजह से बहुत से लोगों में बाइपोलर डिस्ऑर्डर (Bipolar Disorder) की दिक्कत होने लगती है. ऐसे लोगों को साइकोसिस (Psychosis) और खुदकुशी के ख्याल आने लगते हैं. अगर गर्मी को कम किया जाए तो बहुत से लोगों को मानसिक बीमारियों की दवाएं न खानी पड़े. क्योंकि तापमान से दिमाग पर काफी ज्यादा असर पड़ता है.
बढ़ा हुआ तापमान आपकी कार्यक्षमता को खराब करता है
कई स्टडीज में यह बात सामने आई है कि अगर गर्मी ज्यादा है. यानी तापमान बढ़ा हुआ है तो दिमाग का वो हिस्सा जो कठिन और जटिल दिक्कतों और समस्याओं का समाधान निकालता है, वो काम करना बंद कर देता है. या फिर बेहद कमजोर हो जाता है. इसे हीट स्ट्रेस (Heat Stress) कहते हैं. इसे लेकर एक स्टडी बोस्टन में की गई थी. कुछ लोगों को एसी रूम बिठाकर एक काम दिया गया. वहीं दूसरी टीम को बिना एसी वाले कमरे में बिठाया गया. वहीं काम उन्हें भी दिया गया. बिना एसी रूम वालों ने 13 फीसदी खराब काम किया था. वजह थी गर्मी.
ज्यादा तापमान आपके सोचने की क्षमता को कम करता है
जब इंसान गर्मी की वजह से ढंग से सोच नहीं पाता, तब वह चिड़चिड़ा होने लगते हैं. इसका अंत उग्रता या हिंसा में होता है. गर्मियों में जब तापमान 1 या 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तब पूरी दुनिया में हिंसक अपराधों की मात्रा में 3 से 5 फीसदी बढ़ोतरी हो जाती है. ऐसी आशंका है कि साल 2090 तक जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ने वाले तापमान से गर्मी संबंधी अपराधों की संख्या में 5 फीसदी की बढ़ोतरी होगी. यानी जितनी गर्मी बढ़ेगी उतना ही अपराध भी.
जलवायु परिवर्तन-ग्लोबल वॉर्मिंग कम करने की जरूरत
जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, दिमाग के तापमान को नियंत्रित करने वाला हार्मोन सीरोटोनिन (Serotonin) सक्रिय हो जाता है. लेकिन ज्यादा गर्मी होने पर यह ढंग से काम नहीं कर पाता. इसलिए दुनियाभर के लोगों की जिम्मेदारी बनती है कि ग्लोबल वॉर्मिंग कम करने के लिए जलवायु परिवर्तन को रोकें. नहीं तो क्या पता इस बढ़ती गर्मी का खामियाजा आपको आपके घर के किसी सदस्य के साथ भुगतना पड़े.