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Mangalyaan Still 'Alive': खत्म होकर भी देश के लिए ऐसे काम आता रहेगा मंगलयान

मंगलयान मरा नहीं है. जिंदा है. ठीक वैसे ही जैसे लोग अंगदान करके दूसरे इंसानों में जीवित रहते हैं. ये कोई कल्पना नहीं है. सच है. इसकी वैज्ञानिक वजह भी है. मंगलयान के कई अंग आज भी आधुनिक और अपग्रेडेड रूप में देश की कई सैटेलाइट्स में उपयोग हो रहे हैं. हम आपको उन्हीं अंगों के बारे में बताएंगे.

मंगलयान का अंत जरूर हो गया है, लेकिन उसके पेलोड्स की तकनीक उसके बाद भी कई सैटेलाइट्स में जिंदा है. (फोटोः ISRO) मंगलयान का अंत जरूर हो गया है, लेकिन उसके पेलोड्स की तकनीक उसके बाद भी कई सैटेलाइट्स में जिंदा है. (फोटोः ISRO)
ऋचीक मिश्रा
  • नई दिल्ली,
  • 06 अक्टूबर 2022,
  • अपडेटेड 9:53 AM IST

मंगलयान यानी मार्स ऑर्बिटर मिशन (MOM) में सिर्फ पांच पेलोड्स थे. जिनका वजन मात्र 15 किलोग्राम था. इनका काम था मंगल ग्रह (Mars) की भौगोलिक, बाहरी परतों, वायुमंडलीय प्रक्रियाओं, सतह के तापमान आदि की जांच करना. उस समय की आधुनिक तकनीकों को मंगलयान (Mangalyaan) में लगाया गया था. ताकि दूर से ही वह मंगल का हालचाल ले सके. उसकी तबियत जांच सकें. लेकिन मंगलयान के कई अंग यानी पेलोड्स (Payloads) की तकनीक उसके बाद छोड़े गए कई सैटेलाइट्स में इस्तेमाल की गई है. 

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मंगलयान में एक पेलोड था थर्मल इंफ्रारेड इमेजिंग स्पेक्ट्रोमीटर (Thermal Infrared Imaging Spectrometer). यानी एक तरीके का थर्मल इमेजिंग कैमरा. इसका काम ये होता है कि जो कैमरा किसी जगह पर मौजूद गर्मी को भांप सकें. इसे आमतौर पर थर्मल इंफ्रारेड कैमरा (TIR) कहते हैं. यह रात में काम करता है. क्योंकि धरती पर मौजूद हर वस्तु, जीव का एक तापमान होता है. 

तापमान के आधार पर उस वस्तु या जीव की आकृति पता चल जाती है. वह कितना भी जमीन के अंदर छिपा हो. या किसी घर में. या फिर लोहे के मोटे बंकर में. उसके तापमान को नापा जा सकता है. इस कैमरे का उपयोग हमारे देश के उन सैटेलाइट्स में किया जा रहा है जो रिमोट सेंसिंग (Remote Sensing Satellites) के लिए काम आते हैं. 

रिमोट सेंसिंग का मतलब हो गया दूर से किसी चीज को सेंस करना. खोजना या पहचानना. जिन सैटेलाइट्स में इस तकनीक का उपयोग हो रहा है, उसमें मौसम संबंधी सैटेलाइट्स है. कार्टोग्राफी सैटेलाइट्स जैसे- EOS या माइक्रोसैट हैं. समुद्री बायोलॉजी को समझने वाले ओशनसैट सैटेलाइट्स हैं. लैंड यूज और मैपिंग के लिए भेजे गए कार्टोसैट सीरीज के सैटेलाइट्स हैं. इसके अलावा रक्षा मामलों के सैटेलाइट्स में भी थर्मल इंफ्रारेड इमेजिंग सेंसर्स लगे होते हैं. या फिर कैमरे लगे होते हैं. 

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मंगलयान पर दूसरा सबसे ताकतवर पेलोड था मार्स कलर कैमरा (Mars Color Camera) लगा था. यानी सतह की उसके असली रंगों में फोटो लेनी और उसके आकार की जानकारी लेने के लिए. यानी सामान्य कैमरे की तरह काम करने वाला यंत्र. इस तरह के कैमरे का इस्तेमाल भारत में कई सैटेलाइट्स में होता है. जैसे रिसोर्ससैट (Resourcesat) सीरीज के सैटेलाइट्स. इनमें विजिबल कैमरा होता है ताकि मौसम, पर्यावरण, जंगल, जमीन आदि की सामान्य फोटो ली जा सके. ये कैमरे अक्सर दिन में ही काम करते हैं. ये कैमरे रात में काम नहीं कर पाते. भविष्य में इसरो के कई अन्य आने वाले मिशन में भी इन यंत्रों का उपयोग हो रहा है.

चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) में टेरेन मैपिंग कैमरा (TMC) लगाया जाएगा. ताकि वह चंद्रमा की सतह की सही तस्वीर ले सके. ये मार्स कलर कैमरा की तरह ही काम करेगा. दोनों की तकनीक समान है. अब अगर बात करे मंगलयान के मीथेन सेंसर फॉर मार्स (Methane Sensor For Mars) पेलोड की तो इसे भी भविष्य में अंतरिक्ष में अन्य ग्रहों की खोज या फिर चंद्रयान मिशन में इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे किसी भी ग्रह पर जीवन के संकेतों को खोजने में आसानी होती है. भविष्य में कुछ ऐसे सैटेलाइट्स और अंतरिक्षयान भेजे जाएंगे, जिसमें एक्सोस्फेयरिक न्यूट्रल कंपोजिशन एनालाइजर और अल्फा फोटोमीटर की तकनीक का भी उपयोग हो सकता है. यानी मंगलयान के सभी अंगों का इस्तेमाल किसी न किसी रूप में फ्यूचर मिशन में किया जाएगा. 

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