
बहुत से बच्चों का सपना होता है कि वे बड़े होकर अंतरिक्ष यात्री या एस्ट्रोनॉट (Astronauts) बनें. अंतरिक्ष में रुचि रखने वाले लोगों के भी मन में आया होगा कि काश वो एस्ट्रोनॉट होते. आज हम जानेंगे कि एस्ट्रोनॉट बना कैसे जाता है, अंतरिक्ष में जाने के लिए इंसान में क्या खूबियां होनी चाहिए और नासा (NASA) किस तरह से अपने मिशनों के लिए एस्ट्रोनॉट चुनता है.
इस बेहद लुभावनी जॉब के लिए भविष्य के अंतरिक्ष यात्रियों को एक प्रतिस्पर्धी चयन प्रक्रिया से गुजरना होगा. नासा की 2021 की एस्ट्रोनॉट क्लास के लिए, एजेंसी का कहना था कि उन्होंने 12,000 से ज्यादा आवेदकों में से सिर्फ़ 10 उम्मीदवारों को चुना था.
एस्ट्रोनॉट बनने के लिए आपको चाहिए...
नासा के मुताबिक, एस्ट्रोनॉट बनने के लिए आपके पास अमेरिकी नागरिकता होनी चाहिए. साथ ही, इंजीनियरिंग, बायोलॉजी या कंप्यूटर साइंस जैसे STEM फील्ड में मास्टर डिग्री होनी चाहिए. एस्ट्रोनॉट बनने के लिए व्यक्ति का शारीरिक तौर पर स्वस्थ होना ज़रूरी है, ताकि वह नासा के फिज़िकल एग्ज़ाम को पास कर सके. नासा ने अपनी पहली क्लास 1959 में शुरू की थी, जिसमें 350 से ज्यादा लोग एस्ट्रोनॉट बन गए थे.
अंतरिक्ष की दौड़ के दौरान, अंतरिक्ष को पहले एक्सप्लोर करने के लिए अमेरिका और सोवियत संघ के बीच काफी प्रतिस्पर्धा थी. उस वक्त एस्ट्रोनॉट बनने के लिए सैनिकों को वरीयता दी जाती थी. आज भी चांद पर जिन 12 लोगों ने कदम रखा है, वे सभी गोरे हैं. लेकिन नासा का एस्ट्रोनॉट कोर अब सभी को मौके दे रहा है. अपने 2024 के आर्टेमिस मिशन के लिए, अंतरिक्ष एजेंसी का लक्ष्य, पहली महिला और अश्वेत रंग के व्यक्ति को चंद्रमा पर उतारना है.
NASA देता है कड़ी ट्रेनिंग
एस्ट्रोनॉट बनाने के लिए चुने गए कैंडिडेट्स को ऐस्कैन्स (ASCANs) कहा जाता है. इसके बाद इन्हें दो साल की ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि ये योग्य एस्ट्रोनॉट बन सकें. नासा अपने एस्ट्रोनॉट्स के कौशल का परीक्षण करने के लिए, अलग-अलग वातावरण में ट्रेनिंग देती है, जैसे बड़े पूल और गर्म रेगिस्तान.
पानी के अंदर होती है स्पेसवॉक की प्रैक्टिस
स्पेसवॉक की प्रैक्टिस के लिए एस्ट्रोनॉट एक बड़े इनडोर पूल में स्पेसक्राफ्ट के साथ तैरते हैं. पूल में गोता लगाने से माइक्रोग्रैविटी या भार रहित वातावरण महसूस होता है. नासा ह्यूस्टन, टेक्सास में जॉनसन स्पेस सेंटर में, Neutral Buoyancy Laboratory में सबसे आधुनिक स्पेसवॉक की ट्रेनिंग देता है. इस विशाल पूल में 62 लाख गैलन पानी होता है. नासा के मुताबिक, यहां का वातावरण अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की तरह है, ताकि एस्ट्रोनॉट भारहीन वातावरण में हार्डवेयर का इस्तेमाल करने की प्रैक्टिस कर सकें.
ज़ीरो ग्रैविटी के लिए चलाते हैं 'वॉमिट कॉमेट' प्लेन
एस्ट्रोनॉट 'वॉमिट कॉमेट' नाम के प्लेन को चलाकर भारहीनता का अनुभव करते हैं. नासा का रिड्यूस्ड ग्राविटी रिसर्च प्रोग्राम, 1959 में शुरू हुआ था. इसके अंतर्गत, एस्ट्रोनॉट ज़ीरो ग्रैविटी वाले 'वॉमिट कॉमेट' प्लेन की उड़ान भरते हैं और ट्रेनिंग लेते हैं. ये प्लेन फ्लोटिंग लैब की तरह भी काम करता है. शोधकर्ता इन उड़ानों पर मेडिकल स्टडी और मोशन सिकनेस के एक्सपेरिमेंट्स करते हैं, क्योंकि प्लेन के रोलर-कोस्टर जैसी प्रैक्टिस अक्सर एस्ट्रोनॉट्स को बीमार महसूस कराते हैं.
रेगिस्तान में होती है सर्वाइवल ट्रेनिंग
इसके साथ ही, इमरजेंसी लैंडिंग के लिए एस्ट्रोनॉट्स को रेगिस्तान में सर्वाइवल ट्रेनिंग दी जाती है. 1959 में ऑरिजनल मर्करी 7 क्रू (Original Mercury 7 crew) के बाद से, नासा के एस्ट्रोनॉट्स ने सर्वाइवल टेक्नीक सीखी हैं. 1964 में, अपोलो 11 एस्ट्रोनॉट्स ने नेवादा की यात्री की थी और वहां सूखे रेगिस्तान में तीन दिन बिताकर, सर्वाइवल स्किल्स की प्रेक्टिस की थी. रेगिस्तान में ट्रेनिंग इसलिए होती है क्योंकि यहां का पर्यावरण किसी अलियन ग्रह की तरह होता है. आर्टेमिस मून रॉकेट मिशन की ट्रेनिंग के लिए नासा एरिजोना रेगिस्तान में दो फील्ड ट्रेनिंग कराएगी, जहां का वातावरण चंद्रमा की तरह होगा.
सहनशीलता का भी होता है टेस्ट
एस्ट्रोनॉट एक गोल-गोल घूमने वाली मशीन (Whirling Machine) पर बहुत तेज गुरुत्वाकर्षण बल के लिए अपनी सहनशीलता का टेस्ट करते हैं.
सबसे अहम है मानसिक संतुलन
अंतरिक्ष में रहते हुए एस्ट्रोनॉट्स मनोवैज्ञानिकों के संपर्क में रहते हैं, ताकि वहां के तनावपूर्ण वातावरण में वे खुद को एडजस्ट कर पाएं. भविष्य के एस्ट्रोनॉट्स मनोवैज्ञानिक और साइकिएट्रिक स्क्रीनिंग से गुजरते हैं, ऐसे में जो एस्ट्रोनॉट अंतरिक्ष यात्रा के लिए फिट नहीं होते उन्हें बाहर निकाल दिया जाता है.
अंतरिक्ष में जाना आसान नहीं, ये बहुत तनावपूर्ण होता है. 2016 में, नासा के मानव अनुसंधान कार्यक्रम ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें पाया गया था कि क्रू के सदस्यों को नींद में बदलाव, रेडिएशन एक्सपोज़र, ग्रेविटी शिफ्ट और आइसोलेशन सहन करना पड़ता है. एक एस्ट्रोनॉट बनने के बाद, आईएसएस पर क्रू के सदस्य नियमित रूप से वीडियो कॉन्फ्रेंस के ज़रिए मनोवैज्ञानिकों सहित मेडिकल स्टाफ से बात करते हैं.