
बंदर. एप. आदिमानव... फिर मानव. ये था इवोल्यूशन. यानी सतत विकास. साधारण भाषा में कहें तो लगातार होने वाला विकास. ऐसा जो भौगोलिक परिस्थितियों, मौसम और शारीरिक जरूरत के हिसाब से होता है. क्यों मैदानी इलाकों में रहने वाले लोग जब पहाड़ों पर जाते हैं, तो उन्हें ऊंचाई से होने वाली दिक्कतें होती हैं?
जबकि, पहाड़ों पर रह रहे लोगों के साथ ऐसा नहीं होता. आपकी सांस फूलने लगती है. उनकी नहीं फूलती. आप पांच किलो वजन उठाकर चलने में हांफने लगते हैं. वो गैस सिलेंडर लेकर कई किलोमीटर की ऊंचाई चढ़ जाते हैं. हाल ही में वैज्ञानिकों ने तिब्बत में रहने वाले लोगों की स्टडी की. कई हैरान करने वाले खुलासे हुए.
यह भी पढ़ें: चीन की नई चाल... नेपाल में फिर कर रहा घुसपैठ, तिब्बत सीमा पर कर रहा फेंसिंग
मैदानी इलाकों की तुलना में तिब्बत के पहाड़ों पर ऑक्सीजन की कमी होती है. मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों को पहाड़ों पर सांस लेने में दिक्कत होती है. हाइपोक्सिया (Hypoxia) हो जाता है. लेकिन पिछले दस हजार साल में पहाड़ों पर रहने वाले लोगों का शरीर उनकी भौगोलिक स्थितियों और मौसम के हिसाब से बदल चुका है.
मौसम, जगह के हिसाब से बदल चुका है इंसानी शरीर
अमेरिका की केस वेस्टर्न यूनिवर्सिटी की एंथ्रोपोलॉजिस्ट सिंथिया बील ने कहा कि तिब्बत के लोग 10 हजार सालों में अपनी ऊंचाई वाले रिहायशी इलाकों के हिसाब से ढल चुके हैं. उनका शरीर विकसित हो चुका है. जिस ऊंचाई पर वो रहते हैं, वहां मैदानी इलाकों के लोगों को दिमाग में दर्द, भारी दबाव, कान में हवा का प्रेशर बनना जैसी दिक्कतें आती हैं. लेकिन उन लोगों को नहीं होता. क्योंकि वो इन चीजों के हिसाब से ढल चुके हैं. अक्लेमेटाइज हो चुके हैं.
तिब्बत के लोगों के शरीर में जेनेटिक बदलाव हो चुका है
सिंथिया कहती हैं कि इससे पता चलता है कि कैसे इंसान इकलौता जानवर है, जो अलग-अलग भौगोलिक स्थितियों के हिसाब से अपने शरीर को ढाल चुका है. या विकसित हो चुका है. तिब्बत के लोगों के शरीर में ऐसे जेनेटिक बदलाव हो चुके हैं, जो उन्हें कम ऑक्सीजन सप्लाई में भी से काम करने की क्षमता और ताकत देते हैं. उनका रेस्पिरेटरी सिस्टम और कार्डियोवस्कुलर सिस्टम उस हिसाब से खुद को ढाल चुका है. यही तो इवोल्यूशन है.
पैदा होने वाले बच्चों में विकसित हो चुकी है नई क्षमता
इसलिए पहाड़ पर पैदा होने वाले बच्चों के जीन्स में भी ये बदलाव देखने को मिलेगा. वो पहाड़ों के हिसाब से ढले हुए पैदा होते हैं. उनके शरीर यह जेनेटिक बदलाव हो चुका है. इसलिए पहाड़ों पर जो महिलाएं बच्चे गर्भवती होती हैं या डिलिवरी करती हैं तो उनके बच्चे भी इसी हिसाब से पैदा होते हैं. उन्हें पहाड़ों के मौसम से कोई फर्क नहीं पड़ता. इन बच्चों में ऐसी विपरीत परिस्थितियों में सर्वाइव करने की जेनेटिक क्षमता विकसित हो चुकी है. यह स्टडी हाल ही में प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल अकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित हुई है.