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Exclusive: देश में बनेगा Elon Musk के स्पेसएक्स जैसा रॉकेट, आधा हो जाएगा स्पेस मिशन का खर्च

भारत में भी वैसे ही रॉकेट बनने वाले हैं, जैसे Elon Musk की कंपनी स्पेसएक्स बनाती है. यानी रीयूजेबल रॉकेट जो खुद ही वापस लौट आएं. सीधी लॉन्चिंग करे. सीधे लैन्डिंग करें. अगर ऐसा होता है तो भारत पूरी दुनिया में सस्ती और ज्यादा मात्रा में सैटेलाइट लॉन्चिंग का बाहुबली बन जाएगा.

Elon Musk की स्पेसएक्स कंपनी के फॉल्कन-9 रॉकेट का पहला स्टेज वापस नीचे आ जाता है. दोबारा इस्तेमाल किया जाता है. (फोटोः SpaceX) Elon Musk की स्पेसएक्स कंपनी के फॉल्कन-9 रॉकेट का पहला स्टेज वापस नीचे आ जाता है. दोबारा इस्तेमाल किया जाता है. (फोटोः SpaceX)
ऋचीक मिश्रा
  • नई दिल्ली,
  • 10 दिसंबर 2022,
  • अपडेटेड 7:00 PM IST

भारत का सबसे भरोसेमंद रॉकेट है PSLV. इसे इसरो (ISRO) का वर्कहॉर्स कहते हैं. लेकिन ये काफी पुराना हो चुका है. अब नए रॉकेट्स की जरुरत है. ऐसे रॉकेट्स जो खुद सीधे टेकऑफ करें. खुद ही उनका एक हिस्सा वापस आकर लैंड कर सके. यानी वर्टिकल टेकऑफ एंड वर्टिकल लैंडिंग (VTVL) कर सके. केंद्र सरकार की तरफ यह जानकारी मिली है कि स्पेस डिपार्टमेंट ऐसे रॉकेट्स बनाने के लिए तैयारी कर रहा है, जो एलन मस्क (Elon Musk) की कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) के फॉल्कन-9 और स्टारशिप रॉकेट्स की तरह खुद से लैंडिंग कर सकें. 

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स्पेसएक्स का फॉल्कन-9 रॉकेट इस समय दुनिया का सबसे भरोसेमंद और कई बार इस्तेमाल किया जाने वाला रॉकेट है. पसंद भी इसलिए किया जाता है क्योंकि उसका एक बड़ा हिस्सा दोबारा उपयोग हो जाता है. यानी वह रीयूजेबल (Reusable) है. ठीक इसी तरह का उनका एक और रॉकेट है स्टारशिप (Starship). उसके भी ट्रायल्स चल रहे हैं. स्टारशिप से ही इंसानों को मंगल पर ले जाने की योजना एलन मस्क ने बनाई है. खैर कुछ इसी तरह का रॉकेट केंद्र सरकार बनाना चाहती है. 

केंद्रीय विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह से लोकसभा में एक सवाल पूछा गया था. सवाल था कि क्या केंद्र सरकार ऑटोनॉमस प्रेसिशन लैंडिंग ऑफ स्पेस रॉकेट पर काम कर रही है? इसके जवाब में केंद्रीय मंत्री ने कहा कि स्पेस डिपार्टमेंट ऐसे रॉकेट्स से संबंधित टेक्नोलॉजी को विकसित करने के लिए काम कर रही है. स्टडीज की जा रही है. इसके बाद जरूरी तकनीकों को हासिल करने के बाद वर्टिकल टेकऑफ एंड वर्टिकल लैंडिंग (VTVL) वाले रॉकेट्स बनाए जाएंगे. 

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जब यह तकनीक भारत बना लेगा तो वह स्पेसएक्स के फॉल्कन-9 रॉकेट के पहले स्टेज की तरह अपने रॉकेट्स को दोबारा इस्तेमाल कर पाएगा. क्योंकि ये रॉकेट्स अंतरिक्ष में जाते हैं. वहीं स्पेस में घूमते नहीं रहते. बल्कि, अपने ऊपर मौजूद स्टेज और सैटेलाइट को एक सीमा तक छोड़कर खुद-ब-खुद वापस आ जाते हैं. ऐसे रॉकेट्स को दोबारा मरम्मत करके वापस इस्तेमाल किया जा सकता है. यही काम स्पेसएक्स लगातार कर रहा है.

हाल ही में इसरो ने निजी कंपनियों के रॉकेट लॉन्च किए हैं. दूसरी एक निजी कंपनी के लिए लॉन्च पैड और मिशन कंट्रोल सेंटर तैयार करके दिया है. भविष्य में निजी कंपनियां भी अपने रीयूजेबल रॉकेट्स बनाएंगी. शुरुआत छोटे सैटेलाइट्स को लॉन्च करने वाले रीयूजेबल ऑटोनॉमस VTVL रॉकेट्स से होगी. उनकी सफलता के बाद बड़े साइज के रॉकेट बनाए जाएंगे ताकि भारी सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजा जा सके. 

इस तरह के रॉकेट्स का फायदा ये होता है कि दूसरे देश की कंपनियां, सरकारें या संस्थाएं अपने छोटे सैटेलाइट्स को लॉन्च करने के लिए सस्ते और भरोसेमंद रॉकेट्स और स्पेस एजेंसी को खोजती हैं. इस मामले में भारत दुनिया का सबसे भरोसेमंद देश है. इसलिए संभावना है कि अगले पांच सालों में भारत में इस तरह के रीयूजेबल ऑटोनॉमस VTVL रॉकेट्स की सीरीज शुरू हो जाए. उनसे स्पेस टेक्नोलॉजी का नया दौर शुरू होगा. 

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