
अगले आठ साल. यानी 2030 तक मुंबई, कोच्चि, मैंगलोर, चेन्नई, विशाखापट्टनम और तिरुवनंतपुरम का तटीय इलाका छोटा हो जाएगा. समुद्र का पानी जमीन को निगलेगा. सिर्फ इतना ही नहीं... कुछ लोगों को अपने घरों और व्यवसायों को छोड़ना होगा. रहने की जगह बदलनी होगी. 2050 तक तो इन शहरों की हालत और खराब हो जाएगी. मुंबई की कम से कम 1000 इमारतों पर बढ़ते समुद्री जलस्तर का असर पड़ेगा. कम से कम 25 किलोमीटर लंबी सड़क खराब हो जाएगी. जब हाई टाइड आएगा... तब 2490 इमारतें और 126 किलोमीटर लंबी सड़क पानी में होगी.
RMSI ने इस साल जुलाई में एक स्टडी की थी. जिसमें कहा था कि हाजी अली दरगाह, जवाहर लाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट, वेस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे, बांद्रा-वर्ली सी लिंक, मरीन ड्राइव पर क्वीन नेकलेस ये सब डूबने की कगार पर पहुंच जाएंगे. RMSI ने यह विश्लेषण IPCC की छठीं क्लाइमेट एसेसमेंट रिपोर्ट से किया है. ऐसी हालत सिर्फ मुंबई की नहीं होगी. बढ़ते समुद्री जलस्तर की मार कोच्चि, मैंगलोर, चेन्नई, विशाखापट्टनम और तिरुवनंतपुरम को भी बर्दाश्त करना होगा. IPCC ने जो चेतावनी दी है, वो तो अलग है.
पृथ्वी मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तरी हिंद महासागर 1874-2004 के बीच हर साल 1.06 से 1.75 मिलिमीटर की गति से बढ़ रहा था. लेकिन यह 1993 से 2017 के बीच 3.3 मिलिमीटर प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है. अगर आप 1874 से लेकर 2005 तक देखिए तो हिंद महासागर करीब एक फीट ऊपर आ चुका है. मौसम विज्ञानी कहते हैं कि समुद्री जलस्तर बढ़ने की वजह ग्लोबल वॉर्मिंग है. तापमान में अगर वैश्विक स्तर पर एक डिग्री सेल्सियस का इजाफा होता है, तो तूफान भी बढ़ेंगे. भारत के पश्चिमी तटों पर पिछले चार साल में चक्रवातों की संख्या 52 फीसदी बढ़ी है.
2050 तक इन शहरों की हालत हो जाएगी इतनी बुरी
साल 2050 तक तापमान अगर 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता है, तो इन चक्रवातों और तूफानों की संख्या में बहुत ज्यादा इजाफा हो जाएगा. हो सकता है ये तीन गुना बढ़ जाएं. साल 2050 तक चेन्नई में 5 किलोमीटर लंबी सड़क और 55 इमारतें समुद्री बाढ़ का सामना करेंगी. वहीं, कोच्चि में समुद्री बाढ़ का असर कम से कम 464 इमारतों पर पड़ेगा. हाई टाइड के समय 1502 इमारतें प्रभावित होंगी. तिरुवनंतपुरम में 349 से 387 इमारतों को नुकसान होगा. विशाखापट्टनम में 9 किलोमीटर लंबी सड़क और 206 इमारतों पर असर पड़ेगा.
साल 2100 तक इन 12 शहरों में भरेगा तीन फीट पानी
सन 2100 तक भारत के 12 कोस्टल सिटी यानी तटीय शहर करीब 3 फीट डूब जाएंगे. ये स्टडी है अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) की. नासा ने सी लेवल प्रोजेक्शन टूल (Sea Level Projection Tool) बनाया है. यह टूल IPCC की रिपोर्ट में दिए डेटा के अनुसार काम करता है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पूरी दुनिया प्रचंड गर्मी झेलेगी. क्योंकि तापमान 4.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है. अगले दो दशकों में ही तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा. जब इतना तापमान बढ़ेगा, तो जाहिर सी बात है कि ग्लेशियर पिघलेंगे. उसका पानी मैदानी और समुद्री इलाकों में तबाही लेकर आएगा.
नासा के प्रोजेक्शन टूल में दुनियाभर का नक्शा बनाकर दिखाया गया है कि किस साल दुनिया के किस हिस्से में कितना समुद्री जलस्तर बढ़ेगा. पहली बार नासा ने पूरी दुनिया में अगले कुछ दशकों में बढ़ने वाले जलस्तर को मापने का नया टूल बनाया है. यह टूल दुनिया के उन देशों के समुद्री जलस्तर को माप सकता है, जिनके पास तट हैं. भारत के जिन 12 शहर साल 2100 तक आधा फीट से लेकर करीब पौने तीन फीट समुद्री जल में समा जाएंगे. क्योंकि तब तक इतनी गर्मी बढ़ेगी कि समुद्र का जलस्तर भी बढ़ेगा.
भारत के इन 12 शहरों को सबसे ज्यादा खतरा
साल 2100 तक सबसे ज्यादा जिन शहरों को खतरा है, वो हैं- भावनगरः यहां समुद्री जलस्तर 2.69 फीट बढ़ेगा. कोच्चि में 2.32 फीट की बढ़ोतरी होगी. मोरमुगाओ में 2.06 फीट, ओखा (1.96 फीट), तूतीकोरीन (1.93 फीट), पारादीप (1.93 फीट), मुंबई (1.90 फीट), मैंगलोर (1.87 फीट), चेन्नई (1.87 फीट) और विशाखापट्टनम (1.77 फीट). ये सभी तटीय इलाकों में कई स्थानों पर प्रमुख बंदरगाह है. व्यापारिक केंद्र हैं. कारोबार होता है. समुद्री जलस्तर बढ़ने से आर्थिक व्यवस्था को करारा झटका लगेगा.
चलिए अगले दस साल की बात करते हैं...
अगले दस सालों में इन 12 शहरों में समुद्री जलस्तर कितना बढ़ेगा, वो भी जान लीजिए. कांडला, ओखा और मोरमुगाओ में 3.54 इंच, भावनगर में 6.29 इंच, मुंबई 3.14 इंच, कोच्चि में 4.33 इंच, तूतीकोरीन, चेन्नई, पारादीप और मैंगलोर में 2.75 इंच और विशाखापट्टनम में 2.36 इंच. ये डेटा एनालिसिस नासा के टूल ने आईपीसीसी की रिपोर्ट से की है. जिसमें बताया गया है कि अगले 20 सालों में पृथ्वी का तापमान कम से कम 1.5 डिग्री सेल्सियस तो बढ़ ही जाएगा. ऐसा क्लाइमेट चेंज की वजह से होगा. जो प्रचंड गर्मी 50 सालों में आती थी, अब वो प्रत्येक दस साल में आ रही है.
प्रदूषण पर विराम नहीं तो इंसानों को आराम नहीं
पिछले 40 सालों से गर्मी जितनी तेजी से बढ़ी है, उतनी 1850 के बाद के चार दशकों में नहीं बढ़ी थी. साथ ही वैज्ञानिकों ने चेतावनी भी दी है कि अगर हमनें प्रदूषण पर विराम नहीं लगाया तो प्रचंड गर्मी, बढ़ते तापमान और अनियंत्रित मौसमों से सामाना करना पड़ेगा. जलवायु परिवर्तन भविष्य की नहीं वर्तमान समस्या है. यह पूरी धरती पर असर डालती है. कहीं कम, कहीं ज्यादा. अगर बर्फ खत्म हो जाएं और जंगल खाक हो जाएं तो आपके सामने पानी और हवा दोनों की दिक्कत होगी. ध्रुवों की बर्फ पिघलेगी तो समुद्री जलस्तर बढ़ेगा. कई देश तो यूं ही डूब जाएंगे जो समुद्र के जलस्तर से कुछ ही इंच ऊपर हैं.
हर साल इंसान छोड़ता है 4000 करोड़ टन CO2
हर साल इंसान 4000 करोड़ टन कार्बन डाईऑक्साइड छोड़ता है. अगर इसे 2050 तक घटाकर 500 करोड़ टन तक नहीं किया तो यह धरती के टुकड़े होना तय है. वर्तमान गति से चलते रहे तो साल 2050 तक प्रदूषण, प्रचंड गर्मी, बाढ़ जैसी दिक्कतों का आना दोगुना ज्यादा हो जाएगा. नासा के एडमिनिस्ट्रेटर बिल नेल्सन ने कहा कि नासा का यह टूल दुनियाभर के नेताओं, वैज्ञानिकों को यह बताने के लिए काफी है कि अगली सदी तक हमारे कई देश जमीनी क्षेत्रफल में छोटे हो जाएंगे. क्योंकि समुद्र का जलस्तर इतनी तेजी से बढ़ेगा, उसे संभाल पाना मुश्किल होगा.