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द्वारका कैसे डूबा, समंदर कैसे ऊपर आया, कहां गई सरस्वती नदी? इन सवालों के जवाब खोज रहा ISRO

ISRO चीफ एस सोमनाथ ने आजतक से खास बातचीत में कहा कि उन्होंने हाई रेजोल्यूशन चित्र और सैटेलाइट के जरिए पौराणिक सरस्वती नदी को ढूंढ लिया है, जिसे आंखो से नहीं देखा जा सकता है. इसके अलावा ISRO ने आर्कियोलोजिकल साइट मथुरा, हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के थायरो सोल्यूशन चित्र बनाए हैं.

सांकेतिक तस्वीर सांकेतिक तस्वीर
राहुल गौतम
  • नई दिल्ली,
  • 27 मार्च 2023,
  • अपडेटेड 11:46 PM IST

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के प्रमुख एस सोमनाथ ने प्राचीन भारत को फिर से जिंदा करने की बात कही है. उन्होंने बताया कि ISRO ने हाई रेजोल्यूशन चित्र और सैटेलाइट के जरिए पौराणिक सरस्वती नदी को ढूंढ लिया है, जिसे आंखो से नहीं देखा जा सकता है. वे बोले, हमने सरस्वती नदी के सूखे चैनल का पता लगाया है.

एस सोमनाथ ने कहा, ISRO पुरातत्व स्थलों की पहचान करने और प्राचीन ज्ञान प्रणाली को स्थापित करने में मदद करने के लिए भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) के साथ समझौता करने के लिए तैयार है. ISRO की कोशिश है कि पुरातत्व स्थलों की दोबारा पहचान की जाए.

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सरस्वती नदी की हुई खोज

ISRO चीफ ने बताया, हमने सरस्वती नदी के बायो चैनल के बारे में रिकार्ड्स बनाया है. इसके अलावा आर्कियोलोजिकल साइट मथुरा, हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के थायरो सोल्यूशन चित्र बनाए हैं. इससे हम थ्री डाईमेंशल चित्र बना सकते हैं जिससे इन जगहों का सही स्ट्रक्चर पता लग सकेगा. उन्होंने बताया कि साइट पर जाकर इतनी जानकारी नहीं मिलती है, लेकिन सैटेलाइट से यह सारी जानकारी मिल सकती है. 

इंडिया टुडे से खास बातचीत के दौरान एस सोमनाथ बोले, हमारी आंखों से जो नहीं दिखता, वो सब सैटेलाइट के जरिए दिख सकता है. हमारे सैटेलाइट की मदद से हम सतह के नीचे तक देख सकते हैं. कोस्टल लाइन, सी लेवल चेंज, द्वारका कैसे डूबा और कैसे समंदर ऊपर आया इसके बारे में भी सैटेलाइट की मदद से जानकारी जुटाई जा सकती है. ISRO इन तमाम मुद्दों पर काम कर रहा है.

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पुरातत्व विभाग का मिले साथ तो सबकुछ होगा संभव!

ISRO चीफ के मुताबिक रामसेतु, जिसे एडम्स ब्रिग के नाम से भी जाना जाता है को उपग्रह चित्रों के जरिए देखा जा सकता है. लेकिन चाहे वह मानव निर्मित हो या प्राकृतिक, इसके लिए पुरातत्व विभाग और भूविज्ञान आदि डोमेन के विशेषज्ञों की जरूरत होगी.

वे बोले, भारतीय ज्ञान प्रणाली हमेशा सूर्य के बारे में जागरूक रही है कि ग्रह इसके चारों ओर कैसे घूमते हैं. लेकिन यह ज्ञान विदेशों में अरबी यात्रियों द्वारा यूरोप ले जाया गया, जिन्होंने बाद में औद्योगिक क्रांति के दौरान इसे डिकोड किया. आइंस्टीन और न्यूटन ने इस पर काम किया. उस वक्त हम अपने ज्ञान को विकसित करने में सक्षम नहीं थे.

बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, अब तक धरती, सौर मंडल के बारे में कविता के माध्यम से बताया जाता था लेकिन अब सबके साइंटिफिक एविडेंस हैं. अभी और काम होना बाकी है. यूरोप में काफी अच्छी तरह से एक्स्प्लोर हुआ. अब भारत में भी एक्स्प्लोर करना बाकी है.

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