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जोशीमठ जैसी आपदाओं का पहले मिलेगा अलर्ट, ISRO-NASA का बड़ा प्रोजेक्ट NISAR इसी साल होगा लॉन्च

इसरो और नासा मिलकर एक ऐसी सैटेलाइट लॉन्च करने जा रहे हैं, जो जोशीमठ जैसी घटनाओं के होने से पहले अलर्ट दे देगा. इस सैटेलाइट को बनाने में करीब 10 हजार करोड़ रुपये लगे हैं. उम्मीद है कि इस साल सितंबर में इस सैटेलाइट को जीएसएलवी-एमके2 रॉकेट से लॉन्च किया जाए. इस सैटेलाइट का फायदा पूरी दुनिया को होगा.

ये है NISAR सैटेलाइट जिसे नासा और इसरो मिलकर बना चुके हैं. सितंबर में लॉन्चिंग संभव. (फोटोः ISRO/NASA) ये है NISAR सैटेलाइट जिसे नासा और इसरो मिलकर बना चुके हैं. सितंबर में लॉन्चिंग संभव. (फोटोः ISRO/NASA)
ऋचीक मिश्रा
  • नई दिल्ली,
  • 30 जनवरी 2023,
  • अपडेटेड 4:31 PM IST

जोशीमठ जैसी जमीन धंसने की आपदाओं की जानकारी अब पहले मिलेगी. अलर्ट जारी हो जाएगा. खास तौर से हिमालय के इलाकों में आने वाले शहरों को लेकर. सिर्फ इतना ही नहीं अन्य सभी प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं की सूचना भी हमें पहले मिल जाएगी. क्योंकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा (NASA) इस साल सितंबर में एक ऐसा सैटेलाइट लॉन्च करने वाले हैं, जो दुनिया को प्राकृतिक आपदाओं से बचाएगा. 

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इस सैटेलाइट का नाम है निसार (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar - NISAR). ये दुनिया का सबसे महंगा अर्थ ऑब्जरवेशन सैटेलाइट है. इस प्रोजेक्ट में करीब 10 हजार करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं. सिर्फ किसी शहर के धंसने की घटना ही नहीं. यह सैटेलाइट पूरी दुनिया पर नजर रखेगा. यह बवंडर, तूफान, ज्वालामुखी, भूकंप, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्री तूफान, जंगली आग, समुद्रों के जलस्तर में बढ़ोतरी, समेत कई आपदाओं का अलर्ट देगा. 

निसार स्पेस में धरती के चारों तरफ जमा हो रहे कचरे और धरती की ओर अंतरिक्ष से आने वाले खतरों की सूचना भी देता रहेगा. यह सैटेलाइट 1 फरवरी 2023 को पासाडेना स्थित जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी से भारत के लिए रवाना किया जाएगा. इस मौके पर इसरो चीफ डॉ. एस सोमनाथ के रहने की भी उम्मीद है. इसरो चीफ ने कहा था कि पहले सैटेलाइट के पेलोड्स को जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी भेजा गया. इस समय अमेरिकी रडार सैटेलाइट में लगाया जा चुका है. 

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सैटेलाइट्स और उसके पेलोड्स की कई बार टेस्टिंग हो चुकी है. यह भारत और अमेरिका अब तक का सबसे बड़ा संयुक्त साइंस मिशन है. निसार में दो प्रकार के बैंड होंगे एल और एस. ये दोनों धरती पर पेड़-पौधों की घटती-बढ़ती संख्या पर नजर रखेंगे साथ ही प्रकाश की कमी और ज्यादा होने के असर की भी स्टडी करेंगे. एस बैंड ट्रांसमीटर को भारत ने बनाया है और एल बैंड ट्रांसपोंडर को नासा ने. इसे जीएसएलवी-एमके2 रॉकेट से छोड़ा जाएगा. 

इसका रडार इतना दमदार होगा कि यह 240 किलोमीटर तक के क्षेत्रफल की एकदम साफ तस्वीरें ले सकेगा. यह धरती के एक स्थान की फोटो 12 दिन के बाद फिर लेगा. क्योंकि इसे धरती का पूरा एक चक्कर लगाने में 12 दिन लगेंगे. इस दौरान यह धरती के अलग-अलग हिस्सों की रैपिड सैंपलिंग करते हुए तस्वीरें और आंकडे वैज्ञानिकों को मुहैया कराता रहेगा. इस मिशन की लाइफ पांच साल मानी जा रही है. इस दौरान निसार ज्वालामुखी, भूकंप, भूस्खलन, जंगल, खेती, गीली धरती, पर्माफ्रॉस्ट, बर्फ का कम ज्यादा होना आदि विषयों की स्टडी करेगा. 

निसार सैटेलाइट में एक बड़ा मेन बस होगा, जिसमें कई इंस्ट्रूमेंट्स लगे होंगे. साथ ही कई ट्रांसपोंडर्स, टेलीस्कोप और रडार सिस्टम होगा. इसके अलावा इसमें से एक आर्म निकलेगा, जिसके ऊपर एक सिलेंडर होगा. यह सिलेंडर लॉन्च होने के कुछ घंटों बाद खुलेगा तो इसमें डिश एंटीना जैसी एक बड़ी छतरी निकलेगी. यह छतरी ही सिंथेटिक अपर्चर रडार है. यही धरती पर होने वाली प्राकृतिक गतिविधियों की इमेजिंग करेगी.

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