
इंडिया टुडे ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) टीम ने उत्तराखंड के उत्तरकाशी में बन रही सिल्क्यारा सुरंग हादसे की जांच की. जिसमें कई तरह के नियमों की अनदेखी सामने आई है. ये अनदेखी प्रकृति, विज्ञान और नियमों के साथ की गई है. चार धाम परियोजना के तहत बन रही इस 4.5 किलोमीटर लंबी सुरंग का मकसद था तीर्थयात्रा को सुगम बनाना.
हालांकि, इस सुरंग ने 41 मजदूरों का जीवन संकट में डाल दिया. इस सुरंग को नेशनल हाइवे एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनवा रही है. सवाल ये उठता है कि किस तरह के नियमों का उल्लंघन किया गया. या फिर उन्हें नजरअंदाज किया गया. असल में उत्तरकाशी ऊपरी हिमालयी इलाके में है. यह मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) से नजदीक है.
MCT यानी भारतीय टेक्टोनिक प्लेट और यूरेशियन प्लेट के मिलने वाली जगह पर पैदा होने वाली ऊर्जा. ये पूरा इलाका 2000 किलोमीटर लंबा है. यानी हिमालय के उत्तरपश्चिम से दक्षिणपूर्व की तरफ फैला हुआ है. यहां लगातार दोनों प्लेटें एकदूसरे को धकेलती रहती है, जिसकी वजह से थ्रस्ट पैदा होता है. ऊर्जा निकलती रहती है. भूकंप आते रहते हैं.
कैसी है उत्तरकाशी की भौगोलिक स्थिति?
India Today ने जियोलॉजिस्ट प्रो. डॉ. सीपी राजेंद्रन से उत्तरकाशी और उसके आसपास की भौगोलिक स्थिति के बारे में जानकारी ली. प्रो. राजेंद्रन ने बताया कि इस इलाके में 1803 में 7.8 तीव्रता और 1991 में 7 तीव्रता का भूकंप आया था. यहां पर भूकंपीय गतिविधिया बहुत ज्यादा होती हैं. जहां तक बात है सिल्क्यारा-बड़कोट सुरंग की, तो इसके नीचे ही बड़कोट थ्रस्ट है. यानी एक प्रमुख फॉल्ट लाइन. यहां पर सुरंग की स्थिरता पर भरोसा नहीं कर सकते.
प्रो. राजेंद्रन ने कहा कि जिस जगह जमीन के अंदर भूकंपीय फॉल्ट हो. जहां लगातार भूकंप के झटके आते रहते हों. जो भूकंप के खतरों से किसी भी समय हिल सकता हो. ऐसी जगह पर इस तरह का सुरंग बनाना खतरे से खाली नहीं है. ऐसी जगह को शीयर जोन (Shear Zone) कहते हैं. यानी वो जगह जो धरती के मेंटल और क्रस्ट के बीच बेहद पतली परत होती है. यह स्थिर नहीं होती. यहां जोन के दोनों तरफ पत्थर तेजी से खिसकते रहते हैं.
जमीन की ऊपरी परत नाजुक और दरारों के साथ
ऊपरी क्रस्ट में पत्थर बेहद नाजुक और दरारों के साथ होते हैं. शीयर जोन के कमजोर हिस्से को संभालने के लिए पहली उसकी लंबाई और लेयर की जांच करनी होती है. ऐसे काम के लिए फोरपोल्स, रॉक बोल्ट्स, स्टील रिब्स, शॉटक्रीट से जोन को मजबूती दी जाती है. यानी इस सुरंग के नीचे की जमीन का ऊपरी हिस्सा बेहद कमजोर और दरारों वाला है.
भौगोलिक तौर पर बड़कोट थ्रस्ट सिर्फ थ्रस्ट नहीं है. यह थ्रस्ट फॉल्ट है. यानी इस जगह पर जमीन के नीचे की जो ऊपरी परत है. वह बेहद कमजोर, दरारों वाली और भूकंप से खिसकने वाली जमीन है. थ्रस्ट फॉल्ट का मतलब इस जगह जमीन का ठीक निचला हिस्सा यानी क्रस्ट के दो हिस्से एकदूसरे के ऊपर चढ़ते-उतरते हैं. ये किसी भी दिशा में हो सकता है.
क्या होता है टनल सीस्मिक प्रेडिक्शन?
टनल सीस्मिक प्रेडिक्शन (TSP) यानी कोई भी सुरंग बनाने से पहले वहां पर आने वाली भूकंपीय गतिविधियों और उसके असर की स्टडी की जाती है. यह भी देखा जाता है कि सुरंग किस स्तर का भूकंप सह पाएगा. प्रो. राजेंद्रन ने कहा कि सिल्क्यार सुरंग को बनाते समय टीएसपी का ध्यान नहीं दिया गया. टीएसपी जांच के समय यह देखा जाता है कि जब सुरंग का 100 मीटर हिस्सा बन गया. तो उसके आगे की स्थिति क्या होगी. वह कितना मजबूत होगा. स्थिर रहेगा.
नेशनल सेफ्टी काउंसिल द्वारा बनाए गए नियमों के तहत कोई भी सुरंग बनाने से पहले इन चीजों का ध्यान दिया जाना चाहिए...
1. एस्केप रूट का नहीं होना... सिल्क्यारा-बड़कोट सुरंग में सबसे बड़ी खामी ये थी कि इसमें कोई एस्केप रूट नहीं बनाया गया था. इसे बनाने वाली कंपनी ने सेफ्टी एग्जिट रूट नहीं बनाया. नियम ये है कि जो भी सुरंग 3 किलोमीटर से ज्यादा लंबाई की हो, उसमें एस्केप रूट बनाना जरूरी होता है. ताकि किसी हादसे के समय उसमें मौजूद लोग सुरक्षित निकल सकें. साइट पर जांच करने पर पता चला कि सुरंग के लिए एस्केप रूट बनाने की योजना थी, लेकिन बनाया नहीं गया.
ऐसे एस्केप रूट के जरिए सुरंग में किसी भी तरह के हादसे से लोगों को बचाया जा सकता है. सुरंग के नक्शे को देखने से पता लगता है कि 400 मीटर की कॉन्क्रीट फॉल्स फ्लोर तैयार करके एस्केप रूट बनाना था. जिसमें पाइप की रूफिंग होनी थी. लेकिन ऐसी कोई फ्लोरिंग या रूट इस पूरे सुरंग में नजर नहीं आ रहा है.
2. ट्रेंच केज का इस्तेमाल नहीं ... सुरंग की जांच करने पर पता चलता है कि वहां पर कोई ट्रेंच केज या सेफ ट्यूब जैसी चीज नहीं है. जिसके जरिए मजदूर हादसे की स्थिति में सुरक्षित बाहर निकल सकें. सुरंग के धंसने की स्थिति में ट्रेंच केज मजदूरों की जान बचाने के लिए सबसे जरूरी तरीका साबित हो सकते थे. सुरंग के डिजाइन में भी इस चीज का जिक्र नहीं है.
इससे पहले मजदूरों ने NHIDCL के अधिकारियों पर सुरक्षा मानकों की अनदेखी का आरोप लगाया था. विरोध किया था. हाल ही में जो वीडियो आए हैं, उन्हें देख कर लगता है कि अब रेस्क्यू करने वाले लोग ट्रेंच केज का इस्तेमाल करके ही मजदूरों को बचाने का प्रयास कर रहे थे.
3. सही SOP को फॉलो नहीं किया... सुरंग के खनन में जो स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) होता है, उसे लेकर दुविधा नजर आई. सुरंग को बनाने के लिए जो गाइडलाइंस हैं, उनमें रैपिड इवेक्यूएशन की व्यवस्था नहीं है. हालांकि अधिकारियों का कहना है कि सिर्फ रेलवे के पास ही यह व्यवस्था है कि सुरंग में छोटी एस्केप सुरंगें बनाई जाएं. जिनमें सीढ़ियां हों. ताकि आपदा में आसानी से बचाव हो सके. दो लेन वाली सुरंग को लेकर SOP में दुविधा दिखाई पड़ी.
4. ह्यूम पाइप की कमी... मजदूरों ने बताया कि पिछले हादसे के बाद ह्यूम पाइप लगाई गई थी. लेकिन बाद में वह भी हटा दी गईं. जबकि उन्हें सुरंग पूरा होने तक लगे रहना था. ह्यूम पाइप कॉन्क्रीट की ट्यूब्स होती हैं, जो सुरंग बनने के समय उसके एक छोर से दूसरे छोर तक बिछाई जाती हैं, ताकि इमरजेंसी में उनके जरिए मजदूरों को निकाला जा सके. साथ ही इन पाइप्स के जरिए जहरीली गैस लीक को भी निकाला जाता है. क्योंकि अक्सर सुरंगों के खनन में इस तरह के गैस लीक की आशंका बनी रहती है.
हिमालय का भूगोल, विज्ञान को देता चुनौती
यह पूरी दुनिया को पता है कि हिमालय सबसे नए पहाड़ है. युवा है. नाजुक हैं. सबसे ज्यादा फॉल्ट्स यहीं हैं. सबसे ज्यादा भूकंप भी यहीं आते हैं. जबकि यूरोप के एल्प्स के पहाड़ हिमालय की तुलना में काफी ज्यादा पुराने हैं. अब सवाल ये उठता है कि ऐसे नाजुक पहाड़ों पर लगातार सड़कें, सुरंगें और बांध बनाना क्या उचित है? वैज्ञानिक कई बार इस बात पर जोर डाल चुके हैं कि हिमालय पर किसी भी तरह का अवैज्ञानिक निर्माण नुकसान पहुंचा सकता है.
इस साल के शुरूआत में ही जोशीमठ में भूधंसाव का मामला सामने आया था. इसके पहले केदारनाथ, लद्दाख, सिक्कम में ग्लेशियल लेक के फटने से आई बाढ़ और लैंडस्लाइड से लाखों लोगों की जान गई. ये नतीजा है बेतरतीब और बिना प्लानिंग के निर्माण किया जाना. सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई हाई पावर्ड कमेटी के सदस्य रिटायर्ड जस्टिस यूसी ध्यानी ने कहा कि यहां पर 7-8 मीटर चौड़ी पतली सुरंग का निर्माण होना चाहिए था. जिसे बढ़ाकर 12 मीटर किया गया. इसकी वजह से ज्यादा ब्लास्टिंग हुई. लोगों की जान खतरे में डाली गई.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
11 ट्रेड यूनियन्स और सेक्टोरल फेडरेशन ने सिल्क्यारा सुरंग के निर्माण में हुई विफलताओं पर नाराजगी जाहिर की है. यूनियन का कहना है कि कार्यक्षेत्र में किसी तरह का हादसा होने का मतलब है नियमों की अनदेखी की गई. इससे कर्मचारियों की जान आफत में रहती है. सिल्क्यारा में हुआ हादसा भी इसी अनदेखी का नतीजा है.
इंटरनेशनल टनल एक्सपर्ट अर्नॉल्ड डिक्स ने कहा कि एस्केप टनल की जरूरत फिलहाल नहीं थी. क्योंकि पूरी दुनिया में जब भी जहां भी सुरंग बनती है, हम ये मानकर चलते हैं कि ये गिरेगी नहीं. वो भी इस तरह से तो नहीं. यह अलग प्रकार का हादसा है. एस्केप टनल हमेशा बाद में बनाए जाते हैं. ताकि ऐसे हादसे हो तो लोग उससे बाहर निकल सके. निर्माण के समय एस्केप रूट या टनल नहीं बनाए जाते.
उत्तराखंड के जियोलॉजिस्ट एमपीएस बिष्ट कहते हैं कि इतने बड़े निर्माण के समय जियोटेक्निकल और जियोफिजिकल मैपिंग की जानी चाहिए. जहां इस तरह का खनन होना है, वहां के पत्थरों की जांच की जानी चाहिए. इसके बाद ही निर्माण होना चाहिए.