
ये बात प्रथम विश्व युद्ध के दौरान की है. तब रेडियम की खोज हुए करीब 19 साल बीत चुके थे. उस समय अमेरिका में हाथ में पहने जाने वाली घड़ियों के डायल्स को रेडियम से पेंट किए जाने की जैसे सनक-सी सवार थी. इसकी खास वजह थी रेडियम की चमक. दरअसल रेडियम अंधेरे में चमकता था. इस कारण जिन घड़ियों के डायल के नंबर रेडियम से पेंट किए जाते थे, उनमें रात में आसानी से समय देखा जा सकता था.
उधर, 4 अप्रैल 1917 को यूएस की सीनेट ने जर्मनी के खिलाफ युद्ध का ऐलान करने के समर्थन में मतदान किया और दो दिन बाद यानी 6 अप्रैल 1917 को अमेरिका ने प्रथम विश्व युद्ध में औपचारिक रूप से एंट्री कर दी. अमेरिका की फैक्ट्रियों में करीब 4000 लड़कियां घड़ी के डायल को पेंट करने का काम करती थीं. कई फैक्ट्रियों में सेना की घड़ियों पर भी वही चमकदार पेंट किया जाता था. प्रथम विश्व युद्ध में अमेरिका की एंट्री के बाद लड़कियां इस काम को और भी देशभक्ति के साथ करने लगीं.
बीबीसी के अनुसार, घड़ियों के डायल को पेंट करने के लिए जिस ब्रश का इस्तेमाल किया जाता था, वो ऊंट के बालों से बनता था. थोड़े ही इस्तेमाल के बाद खराब हो जाता था. इस कारण लड़कियों से उस ब्रश को होठों से ठीक करने के लिए कहा जाता था. इसे 'लिप पॉइंटिंग' कहा जाता था.
दिन भर रेडियम के साथ काम करने के कारण उसके कण लड़कियों के कपड़े, बालों और त्वचा पर भी लग जाते थे, जिससे वो रात में चमकते थे. ब्रिटैनिका के अनुसार कई लड़कियां अपने सबसे अच्छे कपड़े पहनकर काम करने आती थीं. ताकि रेडियम के कण उनपर गिरें और उनके कपड़े चमकें. इन चमकते कपड़ों के कारण डायल पेंट करने वाली लड़कियों को 'घोस्ट गर्ल्स' (Ghost Girls) कहा जाने लगा था.
इसी चमक की लालच में कुछ तो इन्हें अपने नाखूनों और दांत में भी लगा लेती थीं. लेकिन उन्हें कहा पता था कि इन सब की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी. रेडियम के घातक परिणाम सामने आने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. इसका पहला शिकार बनी अमेलिया मैगिया. अमेलिया न्यू जर्सी में रेडियम ल्यूमिनस मैटेरियल्स कॉर्पोरेशन में घड़ियों के डायल पेंट करने का काम करती थी. उसके दांतों में दर्द होना शुरू हुआ और फिर सारे दांत निकालने पड़े.
मवाद और अल्सर के बाद उसके मुंह में कोई रहस्यमयी रोग हो गया, जिससे उसका निचला जबड़ा तक काटना पड़ा. ये रोग धीरे-धीरे उसके शरीर में भी फैला और 12 सितम्बर 1922 को उसकी मौत हो गई. यहां तक कि डॉक्टर भी उसके मौत की वजह का पता नहीं लगा सके.
इसके बाद तो जैसे सिलसिला-सा शुरू हो गया. एक के बाद के कई लड़कियां गंभीर बीमारियों का शिकार होने लगीं. उनमें से कई के लक्षण अमेलिया जैसे ही थे. धीरे-धीरे इस मामले ने विवाद का रूप ले लिया. मामला बढ़ते देख कंपनी ने स्वतंत्र जांच के लिए एक कमीशन बनाया, जिसकी रिपोर्ट में ये पाया गया कि लड़कियों की मौत रेडियम एक्सपोजर के प्रभाव से हुई है. हालांकि कंपनी ने इसे मानने से इंकार कर दिया. दूसरा कमीशन बनाया गया. इस बार रिपोर्ट पहली बार के बिल्कुल उलट आई. इसमें सारा दोष लड़कियों के सिर मढ़ दिया गया.
1925 में एक पैथोलोजिस्ट ने ये साबित कर दिया कि पेंट करने वाली लड़कियों में रेडियम ने ज़हर भर दिया था. रेडियम इंडस्ट्री ने उस पैथोलोजिस्ट को बदनाम करने की कोशिश भी की. न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक सरकारी आंकड़ों में 1927 से पहले की 1600 महिलाओं का जिक्र है, जो रेडियम पेंट करती थीं. इनमें से 86 को कैंसर रेडियम की वजह से हुआ था. 1929 तक 23 और महिलाओं की मौत रेडियम की वजह से हो गई.
एक और रेडियम गर्ल मार्गरेट लूनी की मौत मात्र 24 साल की उम्र में हो गई थी. लूनी की मौत के करीब 50 साल बाद उनके परिवार ने Argonne National Laboratory को डेड बॉडी पर स्टडी करने की अनुमति दे दी. रिसर्च में लूनी की हड्डियां रेडियोएक्टिव पाई गईं.
1927 में जाकर अटॉर्नी रेमंड बेरी ने लड़कियों का केस लड़ने का फैसला किया और यूएस रेडियम कॉर्पोरेशन के खिलाफ केस फाइल किया गया. पांच महिलाएं इसमें पक्षकार बनीं. सब ने मेडिकल खर्च और हर्जाने के तौर पर ढाई लाख डॉलर की मांग की. हालांकि बाद में इन महिलाओं को मामूली-सा धन देकर कोर्ट के बाहर मामले का सेटलमेंट कर दिया गया. इसके बाद 1938 का साल आया जब एक ओर रेडियम गर्ल की तरफ से मुकदमा दायर किया गया. इस मुक़दमे में महिलाओं की जीत हुई. इस जीत ने हमेशा के लिए तय कर दिया कि यह जानलेवा है.
रेडियम की खोज 1898 में मैरी क्यूरी ने अपने पति पियरे क्यूरी के साथ मिलकर की थी. 1911 में उन्हें इसके लिए नोबेल प्राइज से भी सम्मानित किया गया. मैरी क्यूरी के मौत की वजह भी रेडियम ही बना. उन्हें अप्लास्टिक एनीमिया हो गया था. माना जाता है कि ये लंबे समय तक रेडिएशन के संपर्क में रहने से होता है.