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दुनिया भर की सैटेलाइट्स को खतरा... अमेरिका से अफ्रीका तक कमजोर हो रही मैग्नेटिक फील्ड

NASA के वैज्ञानिक इस समय चिंता में हैं. क्योंकि दक्षिण अमेरिका से लेकर अफ्रीका तक धरती का चुंबकीय क्षेत्र कमजोर हो रहा है. इस कमजोरी की वजह से विमानों से संपर्क करना मुश्किल हो सकता है. या फिर सैटेलाइट्स को नुकसान पहुंच सकता है. मोबाइल नेटवर्क और टीवी प्रसारण में बाधा आ सकती है.

ये लाल रंगीन घेरा ही वो इलाका है जहां पर चुंबकीय शक्ति कमजोर हो रही है. (फोटोः NASA) ये लाल रंगीन घेरा ही वो इलाका है जहां पर चुंबकीय शक्ति कमजोर हो रही है. (फोटोः NASA)
aajtak.in
  • न्यूयॉर्क,
  • 24 मार्च 2023,
  • अपडेटेड 3:50 PM IST

पृथ्वी के अंदर इस समय भयानक बदलाव हो रहे हैं. जिसकी वजह से नासा (NASA) के वैज्ञानिक परेशान हैं. असल में हमारे ग्रह के एक बड़े हिस्से में चुंबकीय शक्ति कमजोर हो रही है. अभी ये इतनी कमजोर है कि इसके ऊपर से अगर कोई प्लेन निकले या सैटेलाइट तो उनसे संपर्क टूट सकता है. धरती की निचली कक्षा में घूम रहे सैटेलाइट्स में शॉर्ट सर्किट हो सकता है. वो बेकार हो सकते हैं. 

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वजह ये है कि अगर मैग्नेटिक फील्ड कम होती है, तो सूरज से आने वाले उच्च-तीव्रता के प्रोटोन सैटेलाइट्स के लिए खतरा बन जाएंगे. वो सैटेलाइट्स के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को बिगाड़ देंगे. वो काम करना बंद कर देंगे. अभी चुंबकीय शक्ति के कम होने की वजह से कुछ सैटेलाइट्स में दिक्कतें आई हैं. लेकिन ये बड़े पैमाने पर असर कर सकता है. ज्यादा नुकसान भी हो सकता है. 

वैज्ञानिक इस कमजोर चुंबकीय शक्ति को साउथ अटलांटिक एनोमली बुलाते हैं. (फोटोः NASA)

जिस हिस्से में चुंबकीय शक्ति कमजोर हुई है, वो दक्षिणी अमेरिका से लेकर अफ्रीका तक फैला है. ये करीब 10 हजार किलोमीटर में फैला है. यानी इस इलाके के नीचे पृथ्वी के आउटर कोर तक चुंबकीय क्षेत्र की शक्ति कमजोर हुई है. आमतौर पर इसे 32 हजार नैनोटेस्ला होना चाहिए लेकिन 1970 से 2020 तक यह घटकर 24 हजार से 22 हजार नैनोटेस्ला पहुंच चुकी है.  

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200 साल में चुंबकीय शक्ति 9 फीसदी कम हुई 

वैज्ञानिकों ने बताया कि पिछले 200 साल में धरती की चुंबकीय शक्ति में 9 फीसदी की कमी आई है. लेकिन अफ्रीका से दक्षिण अमेरिका तक चुंबकीय शक्ति में काफी कमी दिख रही है. साइंटिस्ट इसे साउथ अटलांटिक एनोमली (South Atlantic Anomaly) कहते हैं.

क्या नुकसान होगा चुंबकीय शक्ति कम होने से

अब आप सोच रहे होंगे कि धरती की चुंबकीय शक्ति से हमें क्या मतलब. तो आपको बता दें कि धरती की चुंबकीय शक्ति की वजह से ही हम अंतरिक्ष से आने वाली रेडिएशन से बचे रहते हैं. इसी शक्ति के सहारे सभी प्रकार की संचार प्रणालियां जैसे सैटेलाइट, मोबाइल, चैनल आदि काम कर रही हैं.

धरती के कोर यानी केंद्र में घूमते हुए लोहे के समंदर की वजह से पैदा होती है मैग्नेटिक फील्ड. (फोटोः NASA)

कैसे पैदा होती है धरती की चुंबकीय शक्ति?

धरती की मैग्नेटिक फील्ड कैसे पैदा होती है. धरती के अंदर गर्म लोहे का बहता हुआ समंदर है. यह धरती की सतह से करीब 3000 किलोमीटर नीचे होता है. यह घूमता रहता है. इसके घूमने से धरती के अंदर से इलेक्ट्रिकल करंट बनता है जो ऊपर आते-आते इलेक्ट्रोमैंग्नेटिक फील्ड में बदल जाता है.

अफ्रीका से अमेरिका तक चुंबकीय सुरक्षा कमजोर

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धरती का मैग्नेटिक नॉर्थ पोल अपनी जगह बदल रहा है. यह पोल कनाडा से साइबेरिया की ओर जा रहा है. यह इसी गर्म पिघले हुए लोहे के घूमने की वजह से हो रहा है. अफ्रीका से दक्षिण अमेरिका तक के इलाके में जो मैग्नेटिक फील्ड की कमी आई है. उससे उस इलाके के ऊपर हमारी चुंबकीय सुरक्षा लेयर कमजोर हो गई है. यानी इस इलाके में अंतरिक्ष से आने वाली रेडिएशन का असर ज्यादा हो सकता है.

2.50 लाख साल में बदलती है चुंबकीय शक्ति

जर्मन रिसर्च सेंटर शोधकर्ता जर्गेन मात्ज्का ने बताया कि पिछले कुछ दशकों में अफ्रीका से दक्षिण अमेरिका तक के इलाके में चुंबकीय शक्ति तेजी से कम हो रही है. जर्गेन ने बताया कि अब सबसे बड़ा मुद्दा ये है कि हमें यह पता करना होगा कि धरती के केंद्र में हो रहे बदलावों से कितना बड़ा बदलाव आएगा. क्या इससे धरती पर कोई बड़ी आपदा आएगी. आमतौर पर धरती की चुंबकीय शक्ति 2.50 लाख साल में बदलती है. लेकिन अभी इसमें काफी साल बाकी है.

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