
बिना जबड़े वाली इस मछली का नाम है पैसिफिक लैम्प्रे (Pacific Lamprey). यह मछलियों के प्राचीन समूह अगनाथा (Agnatha) से आती है. यह समूह 45 करोड़ साल से धरती पर मौजूद है. इसने डायनासोरों का भी खून चूसा है. पेड़ों को भी सुखाया है. इसका वैज्ञानिक नाम एंटोसफेनस ट्राइडेंटस (Entosphenus tridentatus) है.
ये मछलियां आमतौर पर उत्तरी प्रशांत महासागर में पाई जाती हैं. आमतौर पर कैलिफोर्निया से अलास्का तक. इसके अलावा ये बेरिंग सागर में भी मिलती है. यानी रूस से लेकर जापान के तटों तक. जहां तक बात रही इनके खाने या पीने की तो ये सिर्फ तरल पदार्थ पीते हैं. प्रशांत महासागर की सैलमन, फ्लैटफिश, रॉकफिश और हेक का खून.
ये खास क्यों हैं? इसकी वजह ये है कि ये 45 करोड़ साल पुरानी मछलियों के प्राचीन समूह अगनाथा से आती हैं. इस समय दुनियाभर में इस मछली की 40 प्रजातियां मौजूद हैं. यह ईल मछली जैसी दिखती है. लेकिन इसके जबड़े नहीं होते. इन मछलियों ने धरती पर अब तक हुए चार बड़े सामूहिक विनाशों से खुद को बचाया है. जीवित हैं.
शरीर में नहीं होती हड्डियां, किसी का मांस नहीं खाती
लैम्प्रे मछलियां आमतौर पर बिना हड्डियों के होती हैं. इनके शरीर की सारी हड्डियां कार्टिलेज से बनी होती हैं. जबड़े के बजाय इनका मुंह खून चूसने के हिसाब से बना है. चारों तरफ छोटे-छोटे दांत हैं. इसके जरिए ये शिकार से चिपक जाते हैं. खून और शरीर के अन्य तरला पदार्थ पीते रहते हैं. ये मछलियां किसी भी जीव का मांस नहीं खाती हैं.
मादा देती है 2 लाख अंडे, 10 साल रेत में दबे रहते हैं लार्वा
मादा लैम्प्रे मछली एक बार में 2 लाख अंडे देती है. साफ पानी में तीन से चार हफ्तों में गर्भाधान का सारी प्रक्रिया पूरी हो जाती है. जैसे ही लार्वा अंडे से बाहर आता है, इन्हें पानी की तलहटी में कम से कम दस सालों के लिए दबा दिया जाता है. ये थोड़े बड़े होने के बाद पानी के निचले बहाव वाले इलाके में जाती हैं. ताकि वहां आसानी से खाना मिल सके.
वयस्क लैम्प्रे मछली 33 इंच लंबी होती है. यह सैकड़ों किलोमीटर तक तैर सकती हैं. खासतौर से खाने और प्रजनन के लिए सही जगह की तलाश में. कई पक्षी, स्तनधारी जीव और मछलियों का शिकार भी बनती हैं लैम्प्रे मछलियां. क्योंकि इनके शरीर में सैलमन मछलियों से पांच गुना ज्यादा मांस होता है.