
आकाशगंगा के बीच में कुछ ऐसे मॉलिक्यूलर बादल मिले हैं, जहां पर भारी मात्रा में ऐसे अतिसूक्ष्म कण पाए गए हैं, जो आरएनए (RNA) का निर्माण करते हैं. इस बादल में विभिन प्रकार के नाइट्राइल्स (Nitriles) मिले हैं. ये कण अकेले बेहद टॉक्सिक होते हैं. लेकिन जैसे ही उपयुक्त वातावरण में आते हैं, ये जीवन की उत्पत्ति के लिए कार्य करने लगते हैं. ये जीवन के निर्माता बन जाते हैं. ये जीवन की उत्पत्ति के लिए जरूरी माने जाते हैं.
वैज्ञानिकों को हमारी आकाशगंगा के केंद्र में ये आरएनए के पूर्वज मिले हैं. इससे वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वो ब्रह्मांड में मौजूद जीवन की उत्पत्ति को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे. वो ये समझ पाएंगे कि क्या हमारे पूर्वजों की उत्पत्ति के पीछे आकाशगंगा के केंद्र का कोई हाथ है क्या? कैसे इन अंतरिक्षीय बादलों से जीवन के कण हमारी धरती पर आए. कैसे इन कणों की वजह से जीवन की शुरुआत हुई.
स्पैनिश नेशनल रिसर्च काउंसिल और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी के एस्ट्रोबायोलॉजिस्ट विक्टर रिविला ने कहा कि अंतरिक्ष में बड़े सूक्ष्म स्तर पर लेकिन बड़े पैमाने पर रसायनिक प्रक्रियाएं होती हैं. ये कई तरह के नाइट्राइल्स में बदलकर आरएनए की पूरी दुनिया (RNA World) बनाती हैं. यहीं से पता चलता है कि ब्रह्मांड में जीवन की उत्पत्ति शायद यहीं से हुई हो और बाद में धरती पर आई हो.
अभी तक किसी भी वैज्ञानिक को सटीकता के साथ यह नहीं पता है कि जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई. इस नई जानकारी से कई राज खुल सकते हैं. अलग-अलग वजहें बताई जाती हैं जीवन की उत्पत्ति को लेकर- पहले ये कि आरएनए (RNA) पहले दुनिया में आया, शारीरिक रूप से विकसित हुआ, सेल्फ रेप्लिकेशन किया, इसके बाद खुद ही विभिन्न रूपों में बदलता चला गया. यह आरएनए वर्ल्ड हाइपोथिसिस (RNA World Hypothesis) है.
विक्टर ने कहा कि हम आकाशगंगा में मिले कणों को फिलहाल धरती के कणों से मिला कर यह नहीं जांच सकते कि इनमें कितनी और किस तरह की समानता है. लेकिन धरती पर मौजूद आरएनए से पहले इन्हीं नाइट्राइल्स को प्रीबायोटिक कण माना गया है. धरती पर इनका आना किसी उल्कापिंड, एस्टेरॉयड के जरिए हुआ होगा. ये उल्कापिंड आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद इन जैविक कणों के बादलों के बीच से होते हुए धरती से टकराया होगा.
इनमें से एक बादल को G+0.693-0.027 नाम दिया गया है. ऐसा माना जाता है कि इन बादलों की वजह से ही ग्रहों और तारों का निर्माण होता आया होगा. हालांकि अभी तक इनका कोई सबूत नही मिला है. विक्टर कहते हैं कि फिलहाल हम इन बादलों की जांच कर रहे हैं. जैसे-जैसे अन्य डेटा मिलते जाएंगे हम एनालिसिस करते हुए रिपोर्ट सबके सामने करते जाएंगे.