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लगातार हो रहा 'हिमालय पर हमला', चारधाम यात्रा को लेकर वैज्ञानिकों ने चेताया, बताया क्यों टूट रहे पहाड़

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि हम लगातार हिमालय पर हमला कर रहे हैं. जिसकी वजह से भूस्खलन की घटनाएं बढ़ गई हैं. सरकार बेतरतीब हिसाब से लोगों को यात्रा पर आने दे रही है. साथ ही बेहिसाब निर्माण हो रहा है. जिसकी वजह से उत्तराखंड के नाजुक पहाड़ दरक रहे हैं. धंस रहे हैं. गिर पड़ रहे हैं.

उत्तराखंड में इस समय चारधाम यात्रा चल रही है लेकिन भूस्खलन के मामले भी बढ़े हुए हैं. (सभी फोटोः PTI) उत्तराखंड में इस समय चारधाम यात्रा चल रही है लेकिन भूस्खलन के मामले भी बढ़े हुए हैं. (सभी फोटोः PTI)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 17 मई 2023,
  • अपडेटेड 11:20 PM IST

उत्तराखंड की चारधाम यात्रा के बीच यात्रियों के लिए हिमालय के नाजुक पहाड़ खतरा बने हुए हैं. लगातार हो रहे भूस्खलन, कस्बों का धंसना और बेतरतीब निर्माण और यात्रियों की बढ़ती संख्या का वजन उत्तराखंड के पहाड़ सह नहीं पाएंगे. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यही स्थिति रही तो लोगों के लिए खतरा बढ़ जाएगा. क्योंकि चारधाम यात्रा के रूट पर भूस्खलन की संख्या बढ़ रही है. 

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धंसते हुए जोशीमठ से ही बद्रीनाथ का रास्ता जाता है. जोशीमठ के घरों में पड़ी दरारों की वजह से वहां के लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं. पर्यावरणविदों की मानें तो सड़कों के चौड़ीकरण की योजना भी एक बड़ा खतरा पैदा कर रही है. इस तरह के निर्माण की वजह से जलवायु संबंधित आपदाएं ज्यादा आती हैं. 

पर्यावरणविद अतुल सती कहते हैं कि चारधाम यात्रा के लिए तय किए यात्रियों की संख्या पर से प्रतिबंध हटाना उत्तराखंड सरकार की गलती है. शुरुआत में हर दिन यमुनोत्री में सिर्फ 5500, गंगोत्री में 9000, बद्रीनाथ में 15 हजार और केदारनाथ में 18 हजार यात्रियों को जाने की अनुमति थी. लेकिन अब लगातार यात्रियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. 

सड़कों का चौड़ीकरण ही बड़ी दिक्कत 

यात्रियों को लाने वाली गाड़ियों की संख्या बढ़ रही है. इसकी वजह से इकोलॉजिकल और बायोलॉजिकल नुकसान हो रहा है. 4 मई को जोशीमठ के रास्ते में हेलांग के पास पहाड़ गिरा था. वहां पर सड़क को चौड़ा किया जा रहा था. जोशीमठ के बाद उत्तराखंड के कई अन्य इलाकों में जमीन धंसने का मामला सामने आया है. भूस्खलन की संख्या बढ़ गई है. 

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ज्यादा लोग यानी अधिक प्रदूषण-कचरा

जियोलॉजिस्ट सीपी राजेंद्रन कहते हैं कि ज्यादा संख्या में लोगों के आने का मतलब है अधिक मात्रा में कचरा आना. प्लास्टिक कचरा. घोड़े और गधों के मल का बढ़ना. ज्यादा लोगों के आने से इलाके के तापमान में बढ़ोतरी होती है. जिससे ग्लेशियर पिघलते हैं. पर्यावरण की क्षति होती है. हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों पर कई दुर्लभ जड़ी-बूटियां मौजूद हैं, जो खत्म होने की कगार पर आ चुकी हैं. इसकी वजह जलवायु परिवर्तन है. 

जरुरत से ज्यादा चौड़ी हो गई हैं सड़कें

विख्यात पर्यावरविद रवि चोपड़ा द्वारा साल 2019 में चारधाम यात्रा को लेकर एक रिपोर्ट दी गई थी. जिसमें कहा गया था कि चारधाम को जोड़ने वाली सड़क परियोजना असल में हिमालय पर हमला है. कमेटी ने सिफारिश की थी कि सड़कों की चौड़ाई 5.5 मीटर होनी चाहिए. लेकिन दिसंबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे 10 मीटर करने की अनुमति दे दी. 

पहाड़ काटने से हो रहे हैं कमजोर

पर्यावरण पर शोध करने वाले आईआईटी खड़गपुर के जियोलॉजी के प्रोफसर अभिजीत मुखर्जी कहते हैं कि हिमालय पर भूस्खलन की सबसे बड़ी वजह सड़कों का चौड़ीकरण है. सड़कों को बनाने के लिए पहाड़ों को ऊपर काटा जाता है. निचला हिस्सा कमजोर होता है तो ऊपर से पहाड़ टूटकर नीचे चले आते हैं. 

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बिगड़ रहा है पर्यावरण का संतुलन

अभिजीत ने बताया कि इसके अलावा उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्टस बन रहे हैं. बांधों और बराजों का बनाना अपने आप में एक मुसीबत है. बाद में मुसीबत लेकर आता भी है. क्योंकि इनसे प्राकृतिक हाइड्रोलॉजिक संतुलन बिगड़ता है. अतुल सती कहते हैं कि उत्तराखंड में इस बार लगातार भूस्खलन, पहाड़ों से पत्थरों के गिरने और टूटने की खबर आई है. जरूरी है कि सड़कों पर चल रहे लोगों की सुरक्षा का ध्यान रखा जाए. 

ऋषिकेश से जोशीमठ के बीच 309 भूस्खलन

इस साल एक स्टडी पब्लिश हुई. जिसमें बताया गया ऋषिकेश से जोशीमठ के 247 किलोमीटर लंबे रास्ते पर 309 बार भूस्खलन हुए. यानी हर एक किलोमीटर पर 1.25 भूस्खलन के मामले. पर्यावरण एक्सपर्ट कहते हैं कि पहाड़ों की कैरींग कैपेसिटी के अनुसार नियम कायदे बनाकर उनका सख्ती से पालन करना चाहिए. 

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