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कैसे और कब बनी अबॉर्शन की गोली, भारत में ऐसा क्या देखा कि साइंटिस्ट के दिमाग में आया ये आइडिया

आज अगर एक महिला चाहे कि वो प्रेगनेंट न हो या प्रेगनेंसी अबॉर्ट करना चाहे, तो उसके पास एक गोली खाकर, अपनी प्रेगनेंसी रोकने की सुविधा है. औरतों के जीवन को सरल बनाने वाली 'अबॉर्शन पिल्स' आखिर किसके दिमाग की उपज थी, इस गोली को बनानकर उसने क्या कुछ सहा और भारत से इसका क्या संबंध है, जानते हैं...

डॉ एटिने-एमिल बौलियू हैं एबॉर्शन पिल के जनक (Photo: AFP) डॉ एटिने-एमिल बौलियू हैं एबॉर्शन पिल के जनक (Photo: AFP)
पारुल चंद्रा
  • नई दिल्ली,
  • 21 जनवरी 2023,
  • अपडेटेड 4:25 PM IST

पिछले साल अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए गर्भपात का संवैधानिक अधिकार समाप्त कर दिया था. अमेरिका के कई राज्यों में गर्भपात पर बैन लग गया था. लेकिन कुछ राज्यों में ये बैन नहीं था. ऐसे में, FDA ने फार्मेसियों को 'मिफेप्रिस्टोन' (Mifepristone) दवा बेचने की इजाज़त दी है. यह दवा गर्भावस्था की संभावना को रोकती है. इसे गर्भावस्था के 10वें सप्ताह तक इस्तेमाल करने की मंजूरी दे दी गई है. 

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डॉ. एटिने-एमिल बौलियू (Dr. Étienne-Émile Baulieu) दशकों पहले एक ऐसी दवा का आइडिया लेकर आए थे, जिसे लेने के बाद प्रोगनेंसी को रोका जा सकता हो. डॉ. बाउली अब 96 साल के हैं. वे बताते हैं कि इस तरह की गोली को बनाने का विचार उनके मन में करीब 50 साल पहले आया था. वे मानते थे कि इस तरह की दवा से क्रांति हो सकती है. वे एक ऐसी गोली बनाने की बात कर रहे थे जो कि प्रेगनेंसी को अबॉर्ट कर सकती है. उन्हें लगता था कि इस तरह की दवा से महिलाओं का जीवन काफी हद तक बदल जाएगा. प्रेग्नेंसी से बचने के लिए महिलाओं को सर्जरी कराने की ज़रूरत नहीं होगी. वे अपनी मर्जी से अपना जीवन जी सकेंगी. जब चाहेंगी तभी प्रेग्नेंट होंगी.  

 (Photo: Getty)

डॉ. बौलियू को Father of the Abortion Pill कहा जाता है. उन्होंने 1990 में एक किताब लिखी थी. इसमें उन्होंने उम्मीद जताई थी कि 21वीं सदी तक, अबॉर्शन पिल (abortion pill) की मदद से गर्भपात की समस्या काफ़ी हद तक खत्म हो जाएगी. उन्हें लगता था कि 21वीं सदी तक गर्भपात एक बड़ा मुद्दा नहीं रह जाएगा. इस दवा की मदद से इस समस्या को काबू में कर लिया जाएगा.  

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अमेरिका में मिफेप्रिस्टोन को मंजूरी

हालांकि यह संभावना, खास तौर पर अमेरिका में हमेशा की तरह दूर की कौड़ी लगती रही है. साल 2000 में, अमेरिका में मिफेप्रिस्टोन (mifepristone) को मंजूरी मिलने के बाद से, गर्भपात एक विवादास्पद मुद्दा बन गया. इसके बाद पिछले साल अबॉर्शन बैन के फैसले ने इस मुद्दे पर देश को पहले से कहीं ज्यादा बांट दिया. 

फिर भी समय के साथ काफ़ी बदलाव हुए हैं. डॉ. बौलियू की कुछ उम्मीदें पूरी हुई हैं. आज अमेरिका में आधे से ज़्यादा गर्भपात के मामलों में मिफेप्रिस्टोन और अन्य दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है. और समय के साथ यह अनुपात बढ़ने की उम्मीद है. जिन राज्यों में गर्भपात पर प्रतिबंध लगाया गया था, वहां भी इन दवाओं का इस्तेमाल बढ़ा है. इस वजह से ये गोलियां कानूनी और राजनीतिक लड़ाई के केंद्र में आ गईं हैं. 

डॉ. बौलियू की लैब पेरिस के सदर्न रिम में हैं. उनका ऑफिस किसी पुराने असायलम जैसा दिखता है. डॉ. बौलियू का जीवन काफ़ी रोचक रहा है. द्वितीय विश्व युद्ध के समय हुई फ्रांसीसी क्रांति (French Revelution) के दौर में उन्होंने एक किशोर के रूप में क्रांतिकारियों तक बंदूकें पहुंचाई थी और फिर अपनी पहचान बदलकर एल्प्स (Alps) में शरण ली थी.

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सम्मान भी मिले और कहा गया हिटलर का अवतार

अपने काम के लिए डॉ. बौलियू को कई वैज्ञानिक सम्मान प्राप्त हुए हैं. उन्हें लस्कर अवार्ड (Lasker Award) भी मिला है जिसे चिकित्सा में सबसे प्रतिष्ठित अमेरिकी पुरस्कार माना जाता है. हाल ही में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन (Emmanuel Macron, French president) ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान लीजन ऑफ ऑनर के ग्रैंड क्रॉस' (Grand Cross of the Legion of Honor) से भी सम्मानित किया. उनके प्रशंसकों ने नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) के लिए भी उनके नाम की सिफ़ारिश की है.  

 (Photo: Getty)

मिफेप्रिस्टोन को बनाने में उनकी भूमिका के लिए, अबॉर्शन राइट्स सपोर्टर्स (abortion rights supporters) यानी गर्भपात अधिकार समर्थकों ने जहां उन्हें दूरदर्शी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, वहीं अबॉर्शन का विरोध करने वाले उन्हें हिटलर का अवतार कहते हैं. हालांकि, मेडिकल डिग्री और बायोकैमिस्ट्री में पीएचडी डॉ. बाउलियू खुद को एक ऐसा डॉक्टर मानते हैं जो विज्ञान को मानता है. 

डॉ. बौलियू के पिता डॉ. लियोन ब्लम (Dr. Léon Blum) किडनी विशेषज्ञ थे. वे डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए इंसुलिन का उपयोग करने वाले पहले डॉक्टरों में शामिल थे. उनके बारे में कहा जाता है कि मिस्र में अपने हनीमून के दौरान उन्होंने वहां के राजा की डायबिटीज़ का इलाज किया था.

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एक अन्य महत्वपूर्ण खोज में डा. बौलियू ने एक हार्मोन (hormone), डिहाइड्रोएपियनड्रोस्टेरोन (dehydroepiandrosterone) यानी डीएचईए (DHEA) का पता लगाया था, जो एस्ट्रोजन (estrogen) और टेस्टोस्टेरोन (testosterone) बनाने में मदद करता है और जिससे एडर्नल या अधिवृक्क कैंसर (adrenal cancer) जैसी बीमारियों का पता चल सकता है.

बच्चा न चाहने वाली महिलाओं को डॉक्टर सबक सिखाते थे

डॉ. बौलियू के मेंटर थे मैसाचुसेट्स (Massachusetts) में वॉर्सेस्टर फाउंडेशन फॉर एक्सपेरिमेंटल बायोलॉजी (Worcester Foundation for Experimental Biology) के सह-निदेशक डॉ ग्रेगरी पिंकस (Dr. Gregory Pincus). उन्होंने डॉ. बौलियू को प्यूर्टो रिको (Puerto Rico) जाकर वहां चल रहे कॉंट्रासेप्टिव पिल (contraceptive pill) के क्लीनिकल ट्रायल (clinical trials) को देखने का सुझाव दिया. ये बात अबॉर्शन पिल के निर्माण में अहम कड़ी बनी. डॉ. बाउलियू ने बताया कि प्यूर्टो रिको में हो रहे ट्रायल महिलाओं के इलाज में अहम पड़ाव साबित होने वाले थे. 

पेरिस लौटकर डॉ. बौलियू एक दवा कंपनी रसेल-यूक्लाफ (Roussel-Uclaf) से जुड़े. कंपनी ने उन्हें कंपनी का हेड ऑफ रिसर्च बनने का ऑफर दिया था, लेकिन उन्होंने वहां पार्टटाइम कंसल्टेंट बनना चुना. क्योंकि ऐसा करके डॉ. बौलियू उस कंपनी की लैब और रिसर्च के लिए उनके अणुओं (molecules) का इस्तेमाल कर सकते थे, हालांकि वे कंपनी के किसी भी प्रॉडक्ट से पैसे नहीं कमा सकते थे. 

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अपनी मेडिकल रेसिडेंसी (medical residency) के दौरान डॉ. बौलियू को पता चला कि कुछ महिलाएं अबॉर्शन के लिए छड़ों का इस्तेमाल करती थीं. इससे मिसकैरिज़ हो जाता था और फिर वे अस्पताल जाती थीं. डॉ. बौलियू को हैरानी हुई जब उन्हें पता चला कि कुछ सर्जन्स ने अपने स्टाफ को ताकीद कर रखी थी कि वे इन महिलाओं को एनेस्थीसिया न दें. उन्होंने ये भी सुना था कि सर्जन ऐसी महिलाओं को सबक सिखाने के लिए ऐसा करते थे. 

(Photo: AFP)

भारत की एक महिला ने किया प्रेरित 

1970 में, डॉ. बौलियू भारत के दौरे पर थे. कोलकाता के एक पुल पर भीख मांगती हुई एक महिला उनके पास आई. महिला की गोद में एक मृत बच्चा था और दूसरा बच्चा उसके साथ चल रहा था. वे इस दृश्य को कभी नहीं भूला सके. उन्होंने कहा कि इस घटना ने मुझे और मेहनत करने के लिए प्रेरित किया. इसके बाद वे अबॉर्शन की एक ऐसी दवा बनाने में जुट गए, जिसमें एक तरह से शरीर की जैविक सफ़ाई भी शामिल हो.       

हार्मोन प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) प्रेग्नेंसी के लिए ज़रूरी है, क्योंकि ये गर्भाशय को भ्रूण लेने और उसे संभालने के लिए तैयार करता है. उन्होंने सोचा कि क्या ये संभव है कि प्रोजेस्टेरोन को सेलुलर मैसेज देने से रोका जा सके? दरअसल वे एक एंटी-हार्मोन (anti-hormone) बनाना चाहते थे. 

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डॉ. बौलियू ने इस गोली के लिए सहे विरोध 

इस बीच वाशिंगटन (Washington) में,अबॉर्शन का विरोध करने वाले एक कैंपेन ने फ्रांसीसी दूतावास (French Embassy) को बड़ी संख्या में पत्र भेजे. इन पत्रों में लिखा गया था कि अगर फ्रांस ने अबॉर्शन की दवा को मंज़ूरी दी, तो फ्रांसीसी उत्पादों का बहिष्कार कर दिया जाएगा. सितंबर 1988 में, फ्रांसीसी अधिकारियों ने RU-486 (RU-486) को मंजूरी दी.

1980 के दशक की शुरुआत में डॉ. बौलियू को कुछ ऐसे पत्र मिले, जिसमें उन्हें धमकियां मिली और अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया. कनाडा (Canada) में उनके खिलाफ पोस्टर लगाए गए और सैन फ़्रांसिस्को (San Francisco) के पोस्टरों में उनकी तुलना नाज़ी मृत्यु शिविर (Nazi death camp) के डॉक्टर जोसेफ मेंगेले (Doctor Josef Mengele) से की गई. इतना ही नहीं, न्यू ऑरलियन्स (New Orleans) में तो उनके कार्यक्रम के ठीक पहले वेन्यू पर एक धमाका भी हुआ. 

लेकिन सब ऐसा नहीं सोचते थे...

उन्हें अमेरिका से कुछ ऐसे पत्र भी मिले, जिनमें उनकी तारीफ़ की गई थी और दवा को अमेरिका में उपलब्ध कराने की बात कही गई थी. इस बीच दवा कंपनी रसेल-यूक्लाफ (Roussel-Uclaf) में उनके साथ काम रहे कुछ लोगों ने महसूस किया कि डॉ. बाउलियू ने RU-486 के लिए पर्याप्त क्रेडिट साझा नहीं किया है. डॉ. बॉलियू के लस्कर पुरस्कार जीतने के कुछ ही समय बाद, रसायनशास्त्री डॉ. ट्यूश (Dr. Teutsch) को यह कहते पाया गया कि डा. बाउलियू ने गोली तो बनाई है लेकिन उसका कंपाउंड उन्होंने नहीं बनाया. 

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अमेरिका में फ्रांसीसी उत्पादों के बायकॉट के डर से कंपनी ने सालों तकअबॉर्शन पिल RU-486 के लिए मंज़ूरी नहीं ली. साल 1993 में, अबॉर्शन का समर्थन करने वाले एक संगठन ने न्यूयॉर्क के एक गोदाम में गोली बनाने के लिए एक गोपनीय प्रयोगशाला शुरू की. 1994 में, क्लिंटन प्रशासन ने इस दवा का समर्थन किया. इसके बाद दवा कंपनी रसेल-यूक्लाफ ने अमेरिकी के लिए इस दवा का अधिकार एक गैर-लाभकारी संगठन पॉप्यूलेशन काउंसिल (Population Council) को दे दिया.

फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (The Food and Drug Administration) ने 1996 में RU-486 को इस शर्त पर मंजूरी दी थी कि बड़ी दवा कंपनियां इसका निर्माण नहीं करेंगी. इस दवा के लिए पूर्व स्वीकृति साल 2000 में दी गई जब एक छोटी दवा कंपनी डेंको लेबोरेटरी (Danco Laboratories) इसे बनाने के लिए तैयार हुई.

तो इस तरह डॉ. बौलियू ने तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए एक ऐसी पिल बनाई जिसने महिलाओं की ज़िंदगी आसान कर दी. क्या डॉ. बौलियू को सच्चा फेमनिस्ट नहीं कहा जाना चाहिए? 

 

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