
आमतौर पर बिल्लियां पालने वालों को होने वाली ये पैरासिटिक बीमारी लंबे समय से वैज्ञानिकों को परेशान कर रही थी. परेशान इसलिए कि ये दुनिया के लगभग एक तिहाई लोगों में होती है. हालांकि राहत की बात ये है कि आधे से भी ज्यादा मामलों में इसका परजीवी टी गोंडिआई सुप्तावस्था में ब्रेन के भीतर रहता है. जैसे ही ये एक्टिव होता है, कई किस्म की समस्याएं घेर लेती हैं. खासकर गुस्सा और खतरा लेने की आदत बढ़ जाती है. यही कारण है कि इसे रेज डिसऑर्डर या क्रेजी कैट लेडी सिंड्रोम कहते हैं.
सबसे पहले तो ताजा स्टडी के बारे में जानते हैं, जो कम्युनिकेशन बायोलॉजी नाम की साइंस जर्नल में कुछ दिन पर पहले छपी. इसमें अमेरिका के यलोस्टोन नेशनल पार्क के 229 भेड़ियों का ब्लड सैंपल जांचा गया. ये वो भेड़िए थे, जिन्हें लंबे समय से लगातार देखा गया था और जिनकी हिस्ट्री वैज्ञानिक अच्छी तरह जानते थे. ये भेड़िए किसी न किसी तरह से संक्रमित बिल्ली के संपर्क में आए थे, या उनका मांस खाया था. कुछ समय बाद ही इनके व्यवहार में बदलाव दिखने लगा.
वैज्ञानिकों ने पाया कि आमतौर पर शांत या दल में पीछे लगने वाले भेड़िए एकाएक आक्रामक हो गए. वे दूसरों पर हमला करने लगे, और यहां तक कि अपने दल के नेता की तरह व्यवहार करने लगे. वैज्ञानिकों के लिए ये चौंकाने वाली बात नहीं थी क्योंकि परजीवी के होने से इस तरह के बदलावों पर पहले से ही बात हो रही थी.
खतरा लेते हुए जान की भी परवाह नहीं करते
ये भी देखा गया कि इंफेक्टेड भेड़ियों में गुस्सा होकर अपना समूह छोड़ने की आशंका भी सामान्य भेड़ियों से लगभग 11 गुना बढ़ जाती है. ये एक तरह का रिस्क लेने वाला ही व्यवहार है, जहां जंगलों में अक्सर दूसरे ताकतवर जानवरों के हमले का डर रहता है. हालांकि इसका दूसरा पहलू भी है. खतरा लेने की आदत के चलते संक्रमित भेड़ियों के जल्दी मारे जाने का डर भी बढ़ जाता है.
ठीक यही बात कुछ समय पहले ही लकड़बग्घों पर हुई स्टडी में दिखी, जब संक्रमित पशु डर छोड़कर ज्यादा ताकतवर जानवरों के इलाके में जाने लगते हैं. लकड़बग्घे भी रिस्क लेते हुए शेरों के इलाके में पहुंच गए और असमय मारे गए. चूहों पर हुए शोध में भी दिखा कि वे बिल्लियों से डरना बंद कर देते हैं और वक्त से पहले मारे जाते हैं. इंडियाना यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में टोक्सिकोलॉजी को लेकर लंबे समय से कई तरह की नई चीजें समझने की कोशिश हो रही है. साथ में वैज्ञानिक ये भी मान रहे हैं कि शायद इस परजीवी का खतरा इससे ज्यादा हो, जितना हम समझ पा रहे हैं.
कैट लवर्स भी हैं दायरे में
वैसे जान लें कि टॉक्सोप्लाजमोसिस का डर सिर्फ जंगली जानवरों को नहीं, बल्कि बिल्लियां पालने के शौकीनों को भी है. इसके परजीवी जिन्हें टी गोंडियाई कहा जाता है, मस्तिष्क के भीतर सुप्तावस्था में रहते हैं. कई लोगों में संक्रमण गंभीर होने पर यह सक्रिय हो जाते हैं और लोगों को ज्यादा गुस्सैल या रिस्क लेने वाला बना देते हैं. यही वजह है कि इसे रेज डिसऑर्डर भी कहा जाता है.
भारत में भी हैं ढेरों मरीज
यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की मानें तो अकेले भारत में ही लगभग 22 प्रतिशत लोगों को इस बीमारी का डर रहता है, जो बिल्लियां पालते हैं, और लगभग 1.43 प्रतिशत में इसका पैरासाइट एक्टिव होता है. अक्सर संक्रमित बिल्ली अपने मल के जरिए बीमारी फैलाती है. मजबूत इम्यून सिस्टम वाले लोगों तक इसके पैरासाइट पहुंचते तो हैं, लेकिन असर नहीं डाल पाते.
बड़े हैें खतरे
कुछ मामलों में टॉक्सोप्लाजमोसिस काफी खतरनाक हो सकता है, खासकर अगर संक्रमण गर्भवती महिला, नवजात शिशु या पहले से ही कोई गंभीर बीमारी झेल रहे शख्स तक जा पहुंचे. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन का ये तक दावा है कि अगर लंबे समय तक संक्रमित बिल्ली शिशु के आसपास रहे तो उनके मस्तिष्क विकास पर भी असर पड़ता है. गर्भवती में इंफेक्शन गंभीर हो तो भ्रूण अविकसित पैदा हो सकता है.
ये परजीवी सीधे सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर असर डालता है और मरीज में कई तरह के नकारात्मक बदलाव दिखने लगते हैं.
कुछ ऐसे हैं शुरुआती लक्षण
अगर किसी का इम्यून सिस्टम कमजोर है तो संक्रमण के तीनेक हफ्तों के भीतर ही पैरासाइट एक्टिव हो जाता है. इसके मरीज में बुखार, सर्दी-खांसी, सांस लेने में दिक्कत होने लगती है. जॉइंट पेन भी एक क्लासिक लक्षण है. हालांकि ये लक्षण मौसम बदलने पर होने वाली बीमारियों से मिलते-जुलते हैं, लेकिन पेट-लवर्स को इन लक्षणों को देखते ही अलर्ट हो जाना चाहिए. मरीज के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखे, वो बात-बात पर भड़कने लगे तो भी ध्यान देने की जरूरत है.